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Divyanter e-Magazine August - Sept 2011 दिव्यांतर (ई पत्रिका) अगस्त - सितम्बर २०११

श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर (Shri S.N.Jauhar) Shri Aurobindo Ashram Delhi Branch

हमारी मासिक पत्रिका दिव्यांतर (ई पत्रिका) में पढिये श्री अरविन्द के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘सावित्री’ का हिन्दी गद्य में अनुवाद

श्रीअरविन्द योग

भारत की गौरवमयी प्राचीन संस्कृति में योगों की एक परम्परा रही है। योग का तात्पर्य है जीवन और संसार को भगवान से मिलाने की एक आध्यात्मिक प्रणाली और उसका दर्शन। भारतीय संस्कृति में भागवत जीवन को भौतिक जीवन से हमेशा ही श्रेष्ठ माना जाता रहा है इसलिये सांसारिक या भौतिक जीवन से आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश के लिये योग और साधना की अनेकों पद्धतियों का यहाँ पर विकास हुआ। श्रीअरविन्द योग एक विकसित, वैज्ञानिक और आधुनिकतम योग है जो जगत और जीवन की तत्कालीन अवस्थाओं के अनुरूप है।

श्रीअरविन्द ने जीवन की यथार्थता को बहुत नजदीक से देखा है और उन परिस्थितियों का अच्छी तरह परीक्षण किया है जिनसे होकर आज मनुष्य को अपने वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में गुजरना पड़ता है। इस परिपेक्ष्य में ही उन्होंने अपने पूर्ण योग का निरूपण किया है जो उनकी कठिन साधना और गहन चिन्तन का परिणाम है और इनका योग अपनी उपलब्धियों में आध्यात्मिक जगत में वही महत्वपूर्ण स्थान रखता है जो भौतिक जगत में आधुनिकतम खोजें।

अध्यात्म के इस देश में योग की सर्वाधिक प्रचलित पद्धतियां तक धीरे-धीरे लुप्त हो गई क्योंकि बदलते हुये जीवन के अनुरूप न उसमें परिवर्तन किया गया और न ही विकास। सृजनात्मक शक्ति के ह्रास होते ही कोई भी चीज मर जाती है। जीवन बदलता गया पर योग की प्रणालियां नहीं बदली तो योग जीवन से बिलकुल अलग हो गया जिसका परिणाम यह हुआ कि इस देश की संस्कृति से उसकी पूँजी भगवान भी अलग हो गया और आज स्थिति यह है कि योग और साधना का नाम लेते ही लोग या तो चौंक जाते हैं या उसे निरे ढोंग या आड़म्बर की बातें मानकर उपेक्षित कर देते हैं। योग के प्रति आज सामान्य धारणा है जीवन को खोकर ब्रह्म की मृग मरीचिका के लिये दौड़ लगाना। पहले वह भगवान को जीवन से जोड़ता था आज वह उसे जीवन से अलग करता है। सामान्य व्यक्ति की धारणा के अनुसार वह जीवन को ही समाप्त कर देता है।

श्रीअरविन्द अपने प्रत्येक क्षेत्र में क्रांतिकारी रहे हैं। योग और साधना के क्षेत्र में भी सचमुच ही उन्होंने उतनी ही बड़ी क्रांति की है जितनी साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में। अनुसंधान और संकल्प लेने के बाद व्यक्ति को क्रांतिकारी बनना आवश्यक हो जाता है क्योंकि प्रत्येक पुरानी चीज के स्थान पर नई चीज की स्थापना करने और सत्य का अनावरण करने के लिये उसे प्रत्येक पग पर पुरानी मान्यताओं के साथ जूझना पड़ता है, उन्हें जीतना पड़ता है। श्रीअरविन्द योग की प्रतिष्ठापना में भी यही कठिनाई है।

श्रीअरविन्द ने योग को जीवन के एक अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार किया है क्योंकि योग के अस्वीकार करने का अर्थ है स्वयं भगवत जीवन को अस्वीकार करना। और यदि जीवन से भगवान को निकाल दिया जाता है तो सचमुच में जीने लायक कोई चीज रहती नहीं। वह उद्देश्य विहीन हो जाता है और उसके विविध व्यक्तित्व अलग-अलग द्वीप बन जाते हैं और उनकी सम्बद्धता का सारा तारतम्य टूट जाता है। मनुष्य तब जीने के लिये जीता है खाने के लिये खाता है, लिखने के लिये लिखता है और सोचने के लिये सोचता है। वर्तमान जीवन की यही विडम्बना पूर्ण कहानी है।

योग इन बिखरे हुये व्यक्तित्वों को जोडक़र उन सोपानों को दिखा देता है जिसमें होकर एक एक पग धरते हुये मानव भगवान के दरवाजे को छू लेता है। अपने ही शिखर पर चढक़र तब मनुष्य देखता है कि भगवान उससे कभी अलग था ही नहीं। ये सीढिय़ाँ तो पहले से ही अनन्त को छू रही हैं और यह अनन्त उसका अपना ही शिर है। संसार से अलग जिन लोगों ने स्वर्ग की कल्पना की उन्होंने अपने शिर पर कभी हाथ नहीं रखा।

श्रीअरविन्द योग ने पृथ्वी और स्वर्ग के बीच की दूरी को इसी अर्थ में मिटा दिया है। मनुष्य का देवत्व ही उसका स्वर्ग या भगवान है और उसका पशुत्व ही पाताल या नरक है। उसके पैर पाताल में धँसे हैं शिर स्वर्ग की उपत्यका में सोमरस पी रहा है। उसका दृश्यमान शरीर वह मृत्युलोक की सडक़ है जिसमें से होकर वह हजार बार जन्म लेकर और मर मरकर उठता, बैठता, गिरता, पड़ता और मील के पत्थर गाड़ता हुआ आगे बढ़ता है। योग इस रथयात्रा का रथ है जिस पर बैठा हुआ अंतरात्मा का कोचवान यात्री को यह बताता चलता है कि रथ किस स्टेशन पर पहुँच रहा है, अन्तिम स्टेशन की दूरी अभी कितनी शेष है और उसे कम से कम समय में किस रास्ते से पार किया जा सकता है।

श्रीअवरिन्द ने पाताल के अंतिम छोर को ‘निश्चेतना’ कहा है और स्वर्ग के अन्तिम छोर को ‘अतिचेना’। दोनों स्टेशनों के बीच की सडक़ को विकास पथ का नाम दिया है। सारी प्रकृति इस विकास पथ में विजय के लिये अपनी पूरी अक्षौहिणी के साथ आगे बढ़ रही है। जीव, निर्जीव, चर, अचर, सूक्ष्म और स्थूल, चेतन और अचेतन सभी पथिक हैं। कोई इस पर धिसट रहा है, कोई पेट के बल सरक रहा है, कोई चारों पैर से चल रहा है तो कोई लाठी टेक रहा है, जो चीज चल रही है उसी का नाम है चेतना। इसी अर्थ में पत्थर, धातुयें, मिट्टी, वनस्पति जीव और जन्तु सभी अलग-अलग चेतना के ही रूप हैं। रास्ता इतना बीहड़ और टेढ़ा-मेढ़ा है तथा उतार-चढ़ाव इतना अधिक है कि पग-पग पर महाभारत की लड़ाई लडऩा पड़ती है। जो हारता है वह फिर लड़ता है और जो जीतता है वह आगे बढ़ता है, पर जो कोचवान लेकर रथ पर सरपट दौड़ता है वह अर्जुन है। वही सच्चा योगी है। जो दिशा हीन होकर तिनके की तरह प्रकृति को तरंगों के साथ डूबता उतराता, मरता जीता, थपेड़े खाता लौट पौट कर आगे बढ़ रहा है वह भी एक प्रकार का योगी है। पर वह प्रकृति के योग के एक तिनके के बराबर का हिस्सेदार है। वह भोगी योगी है क्योंकि वह केवल प्रकृति के द्वारा किये जाने वाले समष्टिगत योग का एक सदस्य है। और प्रकृति का परिवार छोटा नहीं है उसमें हर प्रकार के सदस्य हैं। वह किसी भी सदय को छोडक़र आगे नहीं बढ़ सकती। वस्तुत: वह हजारों वर्षों तक एक ही जगह पैर पीटती रहती है। अर्जुन और गैर अर्जुन के योग में बस यही अन्तर है।

श्रीअरविन्द योग एक प्राकृतिक योग है और वह प्राकृतिक इस अर्थ में है कि यह उस योग के अनुकूल है जो प्रकृति हर क्षण अपने चेतनात्मक विकास के लिये स्वयं कर रही है। श्रीअरविन्द ने प्रकृति का अध्ययन करके उसके विकास की प्रक्रिया को जानने का प्रयत्न किया। अपनी अनुभूति में उन्होंने देखा कि प्रकृति के निश्चेतन पदार्थ से लेकर अतिचेतन ब्रह्म तक चेतना का एक सतत् और अटूट क्रम है। संसार और ब्रह्म दोनों एक ही चेतना की विभिन्न अवस्थायें हैं, निश्चेतना के प्रदेश में यह चेतना जड़वत स्थूल है और ज्यों-ज्यों वह अति चेतना की ओर बढ़ती जाती है त्यों-त्यों यह नमनीय और सूक्ष होती जाती है। ब्रह्म इस चेतना की सूक्ष्मतम अवस्था है। मानव चेतना इन दोनों के बीच की अवस्था है।

निश्चेतन का तात्पर्य है ब्रह्म द्वारा अपने आपको भूल जाना या सुसुप्त हो जाना। सृष्टि के निर्माण के समय ब्रह्म ने अपने आपको विभिन्न परतों में सूक्ष्म से स्थूल की ओर फैला दिया और ज्यों ज्यों वह स्थूल होता गया त्यों-त्यों अपने आपको भूलता गया और अनगिनित खण्डों, टुकड़ों और अणु परमाणुओं में विभाजित होता गया और जैसा कि वेदों और उपनिषदों में कहा गया है वह अन्त में एक ऐसा ‘कल्पतरु’ जैसा दिखने लगा जिसकी जड़ें तो अतिचेतना में है पर पत्तियां निश्चेतना में, जिसमें मोटा तना एक ही है पर उसमें अनेक डालियां फूट निकलीं, एक डाली से अनेक अनेक शाखायें, एक एक शाखा से अनगिनित टहनियां और एक टहनी से अनन्त पत्तियां फूट निकली हों। पत्ती नहीं जानती कि उसका मूल तना कहाँ है पर उसक पीठ पर बना मेरूदण्ड का निशान यह बताता है कि उसमें जीवन का रस टहनी की ओर से आता है, टहनी केवल यह जानती है कि वह शाखा की ओर से आता है, पर उसके आगे वह भी नहीं जानती। डाली ही जानती है कि उसका तना कहाँ है और केवल तना ही अपनी जड़ों की गहराइयों को जानता है पर यदि पत्ती का जीवनरस एक मछली की तरह उलटी दिशा को चले तो वह एक दिन अपने मूल तने को छू सकता है। वह प्रवाह के स्त्रोत को पा सकता है। तब यह पत्ती का योग होगा। इसी प्रकार यदि इलेक्ट्रान यह देख ले कि उसे तीव्रता के साथ घूमने की शक्ति उसके किस केन्द्र से मिल रही है तो वह भी योग करेगा। अगर मछली जीवन के प्रवाह मूल स्त्रोत को ढूँढ सके तो वह भी उसका योगा होगा।

पर व्यक्तिगत रूप से न पत्ती योग कर सकती, न इलेक्ट्रान और न मछली, क्योंकि ये बेचारे केवल प्रकृति के प्रवाह में बहना और ऋतु में ही फूलना फलना जानते हैं। इस प्रवाह से अलग होने की न उनमें क्षमता है और न शक्ति। इनके लिये योग प्रकृति कर ही है जिसे अपने मार्ग को तय करने की जल्दी नहीं है। उसके पास अनन्त समय है। मनुष्य प्रकृति का सबसे विकसित प्राणी है। उसके अन्दर मन तक की चेतना के अतिरिक्त अन्तरात्मा इस अवस्था तक विकसित हो चुकी है कि वह चाहे तो प्रकृति से अलग अपना सचेतन योग कर सकता है और जो मार्ग प्रकृति के रास्ते हजारों और लाखों जन्मों के बाद तय होना था उसे वर्षों और महीनों में पूरा कर सकता है। वह अपना रथ दौड़ाकर प्रकृति को बहुत पीछे छोड़ सकता है।

इस प्रकार श्रीअरविन्द योग चेतना के विकास का योग है अर्थात् स्थूल चेतना से सूक्ष्म चेतना की ओर बढऩे का योग है। सारा विश्व जाने या अनजाने रूप में इस योग को कर रहा है। अन्य योगों में चेतना के विकास को स्वीकार नहीं किया गया है इसलिये संसार को माया या मिथ्या कहना पड़ा पर इस मायावाद और मिथ्यावाद के कारण जीवन के विषय में इतनी भ्रान्तियां पैदा हुईं कि लोगों ने मिथ्या संसार को तो जकड़ कर पकड़ लिया और ब्रह्मा को ही मिथ्या मानकर उसे त्याग दिया अब माया ही ब्रह्म हो गई है और ब्रह्म ही माया। श्रीअरविन्द योग में ही संसार की प्रत्येक चीज का चाहे वह जीव हो या निर्जीव, चेतना के विकास पथ पर अपना स्थान सुनिश्चित है और निम्न से निम्न और अभागवत से अभागवत् चीज को भी एक न एक दिन भगवान तक पहुँचने का प्रारब्ध पूर्व निर्दिष्ट है।

श्रीअरविन्द योग न सांसारिक जीवन की उपेक्षा करता और न शरीर की। उसके लिए शरीर और उसकी भौतिक आवश्यकतायें उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी आत्मा के विकास की इच्छा। भौतिक शरीर पूरे व्यक्तित्व का आधार है और आत्मिक विकास की नींव ही कमजोर होगी तो उस पर बना काम भी धराशायी हो जायगा। श्रीअरविन्द ने चेतना की सूक्ष्मता और स्थूलता के आधार पूरे व्यक्तित्व को सृष्टि के ही विभाजन के आधार पर चार भागों में बांटा है। शारीरिक, प्राणिक, मानसिक हैर आत्मिक। शरीर आधार है आत्मा उसका शिखर प्राण और मन चेतना की मध्यवर्ती अवस्थायें हैं। इन चारों के सन्तुलित विकास द्वारा ही पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है। व्यक्तित्व की किसी भी भाग की उपेक्षा का तात्पर्य होगा चेतना के स्वाभाविक क्रम को बिगाड़ देना और विकास पथ पर गड्ढा खोद लेना।

और योग यदि जीवन के लिये न हो तो भला उसकी उपयोगिता क्या ? योग जीवन को खोने के लिये नहीं बल्कि उसे सही रूप में पाने के लिए है। उसे अधिकाधिक आवश्यक और उपयोगी बनाने के लिये है। यह योग संसार को छोडक़र समाधि में लीन होने का भी योग नहीं है बल्कि समाधि के सुख को स्वयं जीवन में उतार लाने का योग है। जिस समाधि की चेतना में क्षण भर निवास करने में परमानन्द प्राप्त होता हो उसे यदि मनुष्य की जागृति अवस्था में, इस संसार की अनित्यता और कुरूपता में उतार लाया जाय तो भला सांसारिक जीवन कितना सरस हो जाय ? आज तक कभी इसके लिये प्रयत्न नहीं किया गया और आज तक आध्यात्मिक उपलब्धि का तात्पर्य था संसार और जीवन की इस कुरूपता से भाग कर ब्रह्म या किसी स्वर्ग में शरण लेना। समाधि का तात्पर्य है संसार में मर जाना और ब्रह्म में जीना। भला इससे संसार और ऐहिक जीवन को क्या मिला, भगवान चाहे कितनी भी आनन्द मय चेतना हो पर उससे संसार का क्या वास्ता ? निर्माण और मोक्ष की इच्छा लेकर जिन लोगों ने अभी तक साधना की उन्होंने सब कुछ अपने लिए किया और समाज को बहुत थोड़ा दिया। शरीर, प्राण और मन समाधि में नहीं जा सकते, केवल अन्तरात्मा अपने स्रोत में जाकर मिलती है और वहाँ निवास करती है। अतएव इनकी प्रकृति में कुछ अधिक परिवर्तन नहीं हो पाता। हजारों वर्षों से इसलिये संसार और सामूहिक जीवन कुत्ते की दुम की तरह ज्यों का त्यों टेढ़ा दिखाई पड़ता है। प्रकृति अपनी पैर पीट में कुछ अधिक आगे नहीं बढ़ी है।

श्रीअरविन्द योग सामुदायिक जीवन यानी जागतिक जीवन के विकास के लिये भी है और वैयक्तिक परिपूर्णता के लिए भी है। चेतना के विकास के शिखर में चढक़र श्रीअरविन्द ने ही यह देखा कि उसे नीचे उतारा भी जा सकता है। और यदि अतिचेतना का थोड़ा अंश भी शरीर, प्राण और मन के क्षेत्र में नीचे उतर जाये तो उनका दिव्य रूपान्तर तेजी के साथ प्रारम्भ हो जाता है और ज्यों ज्यों इस चेतना के नीचे अवरोहण होता जाता है त्यों त्यों प्रकृति की वासनाओं, अहंमन्यताओं, आवेगों और संवेगों का स्वाभाविक ढंग से रूपान्तर होता चलता है। इस त्रिगुणात्मक व्यक्तित्व के अन्दर का कचड़ा जितना अधिक साफ होता जाता है मन्दिर की दीवालें उतनी ऊँची उठती चली जाती हैं और एक दिन छत पड़ जाती है। तब अति चेतन भगवान उसमें आकर बस जाता है। फिर वही हल चलाता वही दूकान देखता है। इस नई खेती के दानों में यह किसान न कंकड़ मिलाता और न यह दूकानदार तौल में डांढ़ी मारता। उसके चारों ओर एक नये समाज का आकार बनने लगता है और धीरे-धीरे सामूहिक जीवन उतर जाता है। पृथ्वी में इसी प्रकार जगह जगह ओरोवील (उषानगरी) बसती है।

अभी तक के योगों में प्रकृति पर सारा अंकुश सात्विक मन द्वारा लगाया जाता था। चेतना के उत्थान के लिए मन के शासन में शरीर और प्राण का राज्य चलता था। अत्यन्त कड़े संयमों, अनुशासनों, यम और नियमों को रट रट कर याद कर लिया जाता था। इस रटे रटाये संयम का प्रदर्शन करने के लिये साइन बोर्डों को दरवाजे पर गाड़ लिया गया था पर परीक्षा के समय विश्वामित्र और नारद को भी शून्य मिल सकता था क्योंकि स्वयं मन कोई आध्यात्मिक चेतना नहीं है। इस प्राचीन परम्परा में ब्रह्मचर्य, यम और नियम की परिपूर्णता योग की प्रथम शर्त थी और इस शर्त को पूरा करने वाले इक्के-दुक्के ही मिले। आज की सिनेमा सभ्यता में इस शर्त द्वारा योग के अधिकार को निश्चित करने का तात्पर्य होगा योग को ही इस महान् संस्कृति के शब्द कोष से हटा देना। आज युग के अनुकूल एक वैज्ञानिक योग की आवश्यकता है। अतएव समर्पण योग के अतिरिक्त और कोई योग चल नहीं सकता।

श्रीअरविन्द योग मन के निर्देशन द्वारा साधना का समीकरण नहीं करता क्योंकि मन अपूर्ण है। उसने सत्य का दर्शन कभी नहीं किया। उसे आत्मा की झलक मिलती है पर युगों की प्यासी धरती पर जीवन की हरियाली उगाने के लिये केवल बादलों में चमकने वाली विद्युत काफी नहीं होती। उसके लिए तो आत्मा की मूसलाधार वर्षा चाहिये। यह वर्षा चैत्यपुरुष के जागरण से होती है। कोयले की अँगीठी में सूँ सूँ करके चाहे लुहार लोहे की छड़ भले ही टेढ़ी कर ले पर पूरे लौह पिंड को सांचे में ढालने के लिये भिलाई की धमन भट्ठी चाहिए। यह धमन भट्ठी चैत्य पुरुष को प्रज्जवलित करने से ही धधकती है। यहां बुद्धि नहीं अभीप्सा काम करती है। यही भट्ठी श्रीअरविन्द योग में वह मातृ शक्ति है जिसके बिना जीवन नये सांचे में नहीं ढाला जा सकता। चैत्य पुरुष वह अन्तरात्मा है जिसमें भगवान को प्राप्त करने की पुकार उठती है और पुकार जितनी ही तीव्र होती है ऊपर से मातृ शक्ति का उत्तर भी उतना ही प्रगाढ़ होता है। धरती जितनी ही तपही है वर्षा भी उतनी ही तेज होती है और यदि एक बार भी बाढ़ आ गई तो साल भर के कूड़े कर्कट गंगा जी में बह जाते हैं।

श्रीअरविन्द योग को पूर्ण योग भी कहा जाता है क्योंकि (1) वह पूर्ण ब्रह्म की उपलब्धि चाहता है। (2) वह सर्वांगीण जीवन की परिपूर्णता चाहता है। (3) यह वैयक्तिक और सामुदायिक दोनों की जीवन का दिव्यीकरण करना चाहता है।

पूर्ण ब्रह्म क्या है ? भला ब्रह्म कभी भी अपूर्ण होता है ? श्रीअरविन्द का पूर्ण ब्रह्म वेदों का सच्चिदानन्द है। ऋग्वेद का बाल सूर्य है जिसके चारों ओर ऊषा की आग धधक रही है वही धमन भट्ठी। सच्चिदानन्द के मूल में तीन डालियां हैं। सत्, चित्त और आनन्द सत् का तात्पर्य है प्रशान्त: निर्विकार निर्विशेष गीता का कूटस्थ ब्रह्म ज्ञान मार्ग का ‘शिव’। यही मोक्ष और निर्वाण है जहाँ सारी क्रियायें आकर मौन हो जाती हैं। चित का तात्पर्य है चैतन्य। यही सम्पूर्ण विश्व, उसकी समस्त क्रिया और समस्त रूपों को अपने गर्भ में धारण करता है। यही वह मातृ शक्ति है जो अपने तन्य से ब्रह्माण्डों का निर्माण करती है उनका पोषण और विकास करती है और इच्छा पर उन्हें समेट लेती है। यही शिव पर ताण्डव करने वाली महाकाली, यही भक्तों का विष्णु, गोपियों का कृष्ण है। आनन्द का तात्पर्य है वह ब्रह्मानन्द जो सत् और चित् के शाश्वत मिलन से उद्भूत होता है और जिसका एक बूँद पीकर भी मनुष्य धन्य हो जाता है।

योग की परम्पराओं में जिसने केवल प्रशान्त ब्रह्म को प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया उसे ज्ञानमार्गी या बेदान्ती कहा गया, जिसने केवल चैतन्य की उपासना की उसे तान्त्रिक शक्ति कहा गया और जिसने केवल आनन्द ब्रह्म की उपासना की उसे भक्त का नाम दिया गया। जो तीनों की एक साथ अनुभूति के लिए अभीप्सा करता है वह पूर्ण योगी है।

पूर्ण योग में केवल आध्यात्मिक उपलब्धि ही एक मात्र लक्ष्य नहीं है। श्रीअरविन्द ने व्यक्तित्व के चारों प्रदेशों (शरीर, प्राण, मन और आत्मा) को भागवत् शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ माना है। इनमें से कोई त्याज्य नहीं है और चारों का उद्देश्य सच्चिदानन्द की उपलब्धि है। पूर्ण योग इसी महत् उद्देश्य और सत्ता के चारों श्रंगों को उन्मुख करता है। यह उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है जब चारों व्यक्तियों के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करके चैत्य पुरुष की आग को प्रज्वलित रखा जाय।

पूर्ण योग संसार और जीवन का दिव्यीकरण चाहता है। योग केवल वैयक्तिक पूर्णत्व के लिये ही नहीं सामुदायिक जीवन की परिपूर्णता के लिये भी है। भगवान की भुजायें केवल ऊँचाई को ही नहीं छूतीं वे जगत का भी आलिंगन करती है अतएव जिसने भगवान को केवल स्वर्ग में देखा है उसने केवल आधा भगवान देखा है। पूर्ण दर्शन के लिये जगत के प्रत्येक कण में उसकी शाश्वतता को देखना पड़ता है। सामुदायिक जीवन उस एकत्व का सोपान है जिसकी अनन्तता में परमात्मा निवास करता है।