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श्रीअरविन्द का जीवन एवं योग

 

डा. आलोक पाण्डेय

 

भारत ऋषि-मुनियों-अवतारों की कर्मभूमि है। यहाँ विविध धर्मों की नदियों का संगम है औेर यहीं से वेदान्त-तंत्र-योग एवं दर्षन की अनेक धाराएँ निकल कर सारे विश्व को अध्यात्म-ज्ञान से सींचती रही हैं। इसी महान परम्परा के शिखर पर श्रीअरविन्द का पावन नाम आता है, जिन्होंने योग की एक बिल्कुल नई धारा को जन्म दिया है। या यूं कहें कि उन्होंने सनातन सत्य की पुरातन से पुरातन धारा को एक नवीनतम, सुन्दर एवं स्वर्णिम भविष्य से जोड़ दिया है।
श्रीअरविन्द का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। वह समय भारत के लिये एक मध्य-रात्रि के समान था। भारत बाहर से पराधीनता के पाश में जकड़ा हुआ था, और आंतरिक रूप में भी वह अपना गौरव और आत्मबल भूलकर अनेक कुंठाओं से ग्रस्त था।
ऋषियों और अवतारों के जीवन के बारे में कुछ भी कहना कठिन होता है। उनके जीवन का कर्म दिव्य प्रेरणा से प्रवाहित होता है जो मानव समझ की सीमा के कहीं ऊपर से आती है। फिर भी उनके अन्दर चल रहे महा-अग्नि के यज्ञ का ताप और प्रकाश शरीर के आवरण को भेदकर बाहर छलक ही पड़ता है। श्रीअरविन्द का बाहरी जीवन भी एक परम तपस्वी का जीवन रहा है।
उन्हें 7 वर्ष की आयु में ही उनके पिता ने शिक्षा हेतु इंग्लैण्ड भेज दिया था। वे अपने चहेते पुत्र को भारतीय संस्कृति से दूर रखना चाहते थे। यह उनके लिये आर्थिक रूप से वहन करना कठिन था और इसी कारण कई बार लम्बे-लम्बे समय तक श्रीअरविन्द को घोर आर्थिक अभाव का सामना करना पड़ा। परन्तु इस कारण उनका हृदय कभी भी अपने पिता की ओर से मैला नहीं हुआ। जहॉँ एक ओर वे अपार मेधा-बुद्धि-कौशल के स्वामी थे, वहीं दूसरी ओर एक विशाल हृदय के धनी भी। हीरा तो हीरा होता है और सर्वत्र चमकता है। श्रीअरविन्द भी इंग्लैण्ड में अपने बुद्धि, चरित्र एवं स्वभाव के कारण सभी की प्रशसा का केन्द्र बने। अंग्रेजी, फ्रेंच, ग्रीक, लैटिन इत्यादि अनेक भाशाओं में सरलता से महारत प्राप्त करने के साथ ही उन्होंने इंग्लैण्ड की सर्वोच्च परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, और अपने पिता की इच्छा का सम्मान करने हेतु सर्वमान्य आई॰सी॰एस॰ की कठिन परीक्षा में भी उत्तीर्ण हुए। परन्तु राष्ट्रवादी भावना के कारण उस सम्मान को ठुकराकर उन्होंने एक असाधारण त्याग-वृति की झलक भी दिखलाई। उनके अनुसार सच्चे सन्यासी की पहचान बाहरी वस्त्र एवं वेश-भूषा से नहीं बल्कि आंतरिक रूप में कामना एवं अहंकार के त्याग से होती है।

इंग्लैण्ड में शिक्षा प्राप्त कर 1893 में वे भारत लौटे। यह वही वर्ष था जब स्वामी विवेकानंद भारत के शाश्वत प्रकाश की छटा लेकर अमरीका जा रहे थे। दूसरी ओर भौतिकवाद में घिरी पाष्चात्य सभ्यता के अंधकार से निकलकर श्रीअरविन्द भारत लौट रहे थे-सनातन सत्य के उस सूर्य को जगाने जो भारत के साथ-साथ सारे विश्व को प्रकाश से भर दे। उनके भारत लौटने पर जन्मभूमि ने उनका स्वागत किया-एक विशाल षांति का अनुभव उन्हें हुआ जैसे ही भारत की भूमि पर उनके चरण पड़े।
भारत में आकर पहले उन्होंने बड़ौदा में महाराजा के सचिव एवं बाद में एक प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। साथ ही वेद, उपनिषद्, इत्यादि के अध्ययन द्वारा भारत की संस्कृति एवं अध्यात्म से सम्बंध भी स्थापित किया। इस समय भी उनके आस-पास के लोग उनके ज्ञान, त्याग एवं संयम से बहुत प्रभावित हुए, जिनमें से एक भारतीय विद्या भवन के संस्थापक श्री के॰एम॰ मुषी भी थे। इंग्लैण्ड में अपनी अद्भुत् मेधा का परिचय देने वाले श्रीअरविन्द एक साधारण धोती पहनकर जमीन पर चटाई बिछाकर ब्रह्मचारी की तरह जीवन व्यतीत करते थे। अपने वेतन को वे हर महीने लाकर एक थाली में रख देते। जिस कर्मचारी को जितनी आवष्यकता होती उसमें से वह उतना ले लेता।
इस समत्व-स्थिति का सबसे असाधारण परिचय श्रीअरविन्द ने बड़ौदा की सुविधाएं सहज ही त्याग कर देशसेवा हेतु कलकत्ता आकर दिया। बड़ौदा में आंतरिक तैयारी तो उन्होंने कर ही ली थी। न सिर्फ वेद एवं उपनिशद् का ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया था बल्कि वे अनेक विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभूतियों का साक्षात् अनुभव कर चुके थे। जहाँ एक ओर काष्मीर में टहलते हुए उन्हें एक अपार महाषून्य का अनुभव हुआ, वहीं योगी लेले महाराज के निर्देश पर मात्र तीन दिनों में निर्वाण जैसी दुर्लभ सिद्धि भी सहजता से प्राप्त कर ली। इसके पूर्व प्राणायाम इत्यादि योग की अन्य प्रणालियों पर चलकर प्राप्त होने वाली सिद्धियों को वे आत्मसात् कर ही चुके थे। फलतः वे आगे चलकर योग-समन्वय की रचना कर सके जिसमें सभी योग-प्रणालियों का आध्यात्मिक निचोड़ है। 

श्रीअरविन्द का सारा योग ही जीवन के दिव्य रूपांतरण से सम्बन्ध रखता है। तभी तो उच्चतम आध्यात्मिक सिद्धियों के बाद भी वे स्वतंत्रता संग्राम के घोर युद्ध में एक सक्रिय नेता के रूप में कार्य करते रहे। वे बाल गंगाधर तिलक एवं बिपिन पाल के साथ ‘गरम दल’ के मुख्य संचालक रहे थे। जहाँ एक ओर वे अपनी लेखनी द्वारा भारत की दासत्वपूर्ण मानसिकता को झकझोर कर पूर्ण स्वराज की अदम्य इच्छा से परिचय करवा रहे थे, वहीं दूसरी ओर भारत की सोई अंतरात्मा को अपनी खोई गरिमा की याद दिलाकर जगा रहे थे। स्वाभाविक था कि उन्हें ब्रिटिश सरकार का कोप-भाजन बनना पड़ा। अतः 1907 में उन्हें एक वर्ष के लिये जेल में रहना पड़ा। परन्तु यहाँ भी उनके समत्व का पलड़ा ही भारी रहा। 

इस अति-दुर्लभ वासुदेवः सर्वम् इति अनुभूति की एक झलक श्रीअरविन्द जेल से आने के बाद अपने प्रख्यात उत्तरपाड़ा भाषण में देते हैं। उन्हीं के शब्दों में " मैंने उस जेल की ओर दृष्टि डाली जो मुझे और लोगों से अलग किये हुए था। मैंने देखा कि अब मैं उसकी ऊँची दीवारों के अन्दर बन्द नहीं हूँ , मुझे घेरे हुए थे वासुदेव। मैं अपनी कालकोठरी के सामने पेड़ की शाखाओं के नीचे टहल रहा था, परंतु वहाँ पेड़ न था, मुझे प्रतीत हुआ कि वह वासुदेव है; मैंने देखा कि स्वयं श्रीकृष्ण खड़े हैं और मेरे ऊपर अपनी छाया किये हुए हैं। मैंने अपनी कालकोठरी के सींखचों की ओर देखा, उस जाली की ओर देखा, जो दरवाजे का काम कर रही थी, वहाँ भी वासुदेव दिखायी दिये। स्वयं नारायण संतरी बनकर पहरा दे रहे थे। जब मैं उन मोटे कंबलों पर लेटा जो मुझे पलंग की जगह मिले थे तो यह अनुभव किया कि मेरे सखा और प्रेमी श्रीकृष्ण मुझे अपनी बाहुओं में लिये हुए हैं। मुझे जो उन्होंने गहरी दृष्टि दी थी उसका यह पहला प्रयोग था। मैंने जेल के कैदियों-चोरों, हत्यारों और बदमाषों-को देखा और वासुदेव दिखायी पड़े, उन अँधेरे में पड़ी आत्माओं और बुरी तरह काम में लाये गये शरीरों में मुझे नारायण मिले। साथ ही इस योगयुक्त अवस्था में आया एक संदेश, " मैंने तुम्हें एक काम सौंपा है और वह है इस मानव जाति के उत्थान में सहायता देना।" 

बाहरी एवं आंतरिक, दोनों प्रकार के जीवन में श्रीअरविन्द उपलब्धियों के चरम शिखर पर पहुँच चुके थे। परंतु उनका अवतरण तो एक अति महान कार्य के लिये हुआ था। वे तो भगीरथ की तरह पूरी पृथ्वी की प्यास बुझाने और उसके उद्धार हेतु स्वर्ग से दिव्य गंगा उतार लाने का व्रत लेकर आए थे। स्वतंत्रता संग्राम के समय अपनी पत्नी मृणालिनी देवी को लिखे एक मार्मिक पत्र में श्रीअरविन्द ने कहा था, मुझे मालूम है कि मेरे अंदर वह भागवत शक्ति है जो मनुष्यमात्र को पतन से बचाकर ऊपर उठा सकती है। 

इसी महत्कार्य के लिये एक आंतरिक आदेश का अनुसरण करते हुए श्रीअरविन्द 4 अप्रैल 1910 को पांडिचेरी पहुँचे, जहाँ बाद में सहज रूप से श्रीअरविन्द आश्रम का जन्म हुआ। इस अद्भुत कार्य में सहयोग देने 1914 में फ्रांस से माताजी का आगमन हुआ, जो भागवत कृपा एवं परमशक्ति का मूर्तिमान स्वरूप हैं। वे पांडिचेरी आने के पहले ही फ्रांस एवं अल्जीरिया में योग एवं गुह्य विद्या की विशिष्ट साधनाओं द्वारा अनुभूतियों के उच्च स्तरों को प्राप्त कर चुकी थीं। फ्रांस में 21 फरवरी 1878 में जन्मी माताजी का जीवन भी बहुमुखी एवं असाधारण घटनाओं, आध्यात्मिक साक्षात्कारों एवं अनुभवों से परिपूर्ण था। दोनों की ही साधना किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के लिये नहीं बल्कि मानव जाति एवं पृथ्वी के उद्धार हेतु थी। दोनों के हृदय में एक नए विश्व की रचना करने का महान स्वप्न था। उनके जीवन का मुख्य केन्द्र एक ही था: उस परम अतिमानसिक शक्ति का अवतरण जो मनुष्य को क्षुद्रता, दरिद्रता, क्लेष, पीड़ा, मृत्यु-भय इत्यादि से मुक्त कर उसके लिये एक दिव्य जीवन का संगठन कर सके। 24 अप्रैल 1920 को माताजी सदा के लिये पांडिचेरी आ र्गइं। और तब शुरू हुआ महायज्ञ का वह अभियान जिसकी मनुष्य अभी कल्पना भी नहीं कर सकता, परंतु जिसके प्रसाद से कालांतर में पृथ्वी पर एक देव-जाति प्रगट होगी जो विश्व-व्यवस्था का दिव्य आधार पर नव-निर्माण करेगी। जैसे पशु विकसित होकर मनुष्य बना वैसे ही मनुष्य विकसित होकर एक दिव्य शरीर धारण करेगा और मिथ्यात्व-मृत्यु-वेदना-अंधकार से पीड़ित धरती पर सत्य-अमरत्व-आनन्द-प्रकाश का साम्राज्य स्थापित होगा। 

पांडिचेरी में की गई श्रीअरविन्द की शेष तपस्या मनुष्य के रूपांतरण के इसी संकल्प की सिद्धि के लिये थी। इस महायात्रा का अनुमान भी लगाना कठिन है। श्रीअरविन्द के इस विश्व-यज्ञ में अनेक पुण्यात्माएँ जुड़ती रही हैं, और आज भी उनकी पुकार पर वैसे ही खिंची आ रही हैं जैसे श्रीकृष्ण की बाँसुरी पर गोप-गोपियाँ एवं गौएँ मंत्र-मुग्ध बँधी चली आती थीं। 24 नवम्बर 1926 को एक विषेश सिद्धि के उपरांत आश्रम संचालन का भार माताजी को सौंपकर श्रीअरविन्द अतिमानस को धरती पर उतार लाने की घोर तपस्या में तल्लीन हो गए। साथ ही उनकी इस तपस्या में विघ्न डालने के लिये सक्रिय हो र्गइं वे असुर शक्तियाँ जिनका वेदों में कहीं-कहीं वर्णन मिलता है। 

इन्हीं असुर शक्तियों का एक यंत्र था हिटलर। वह चाहता था सारे विश्व में आसुरी सभ्यता का साम्राज्य। लोगो को भ्रमित करना, मिथ्यात्व का प्रसारण, मनुष्यों को, यहाँ तक कि शिशुओं को, तरह-तरह की यातनाएँ देना उसकी दिनचर्या थी। झूठ उसका भोजन था। विश्व-समुदाय उसके झूठ-फरेब और अपार सैन्य-बल की चपेट में फँसता जा रहा था। यहाँ तक कि भारत के कई बड़े नेता जैसे गाँधीजी एवं सुभाष बोस भी इस भ्रम में पड़ गए थे कि हिटलर अंग्रेजी सभ्यता का विनाश करके भारत की सहायता कर रहा है। पर सच इसके बिल्कुल विपरीत था। वह तो इंग्लैण्ड के साथ-साथ भारत को भी हड़पना चाहता था। उसके खतरनाक मंसूबे एवं काली करतूतें तो मृत्योपरांत पता चलीं। परंतु श्रीअरविन्द ने एक दृष्टि में ही उस मुखौटे के पीछे छिपे असुर को ताड़ लिया था। इसीलिये उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध को माताजी का युद्ध कहा। वे जानते थे कि हिटलर की विजय का अर्थ था मानव सभ्यता का विनाश। अतः उन्होंने एवं माताजी ने अपने आध्यात्मिक बल द्वारा हिटलर के विजय अभियान को रोक कर अंततः उसकी पराजय सुनिष्चित की। 

कुरुक्षेत्र में बिना शस्त्र उठाए श्रीकृष्ण ने युद्ध लड़ा था। इसी प्रकार पांडिचेरी के एक कक्ष से श्रीअरविन्द ने द्वितीय विश्व-युद्ध की धारा मोड़ डाली थी। आसुरी शक्तियों के प्रहार उनपर भी हुए जिनमें से एक में उन्हें सफलता भी हुई जब श्रीअरविन्द की टाँग में चोट पहुँची। 

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव डालने एवं रणनीतियाँ निर्धारित करने का काम तो वे पांडिचेरी आने के पहले ही कर चुके थे। सक्रिय राजनीति के बाहरी दाँव-पेचों से स्वयं को अलग कर लेने के बाद भी गुह्य रूप से उनका वरद हस्त भारत को प्राप्त था। 1933 में उनके एक शिष्य ने पूछा कि क्या वे भारत की स्वतंत्रता के लिये आंतरिक रूप से कार्य कर रहे हैं? श्रीअरविन्द ने उस समय चौंका देने वाला उत्तर दिया, वह {स्वतंत्रता} तो निश्चित है। मेरी चिंता का विषय है भारत उस स्वतंत्रता का क्या करेगा। बोलशेविज़्म, गुंडा-राज; परिस्थिति गंभीर है।’’ आज कितना सटीक लगता है उनका यह 67 वर्ष से भी पूर्व दिया गया उत्तर! 

सच तो यह है कि श्रीअरविन्द ने भारत के पुनरुत्थान का जो स्वप्न देखा है वह मात्र आर्थिक या राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है। यह तो मात्र जीवन की प्रथम आवष्यकता है, अंतिम नहीं। उनकी दृष्टि में भारत का उत्थान पूरे विश्व के लिये आवष्यक है क्योंकि भारत की अंतरात्मा के पास ही वह कुंजी है जो विश्व की सभी समस्याओं का हल ढूँढ़ सकती है। भारत के अंतर में वह ज्ञान है जो सारी मानवता का कल्याण कर सकता है। शायद इसीलिये आज भारत विश्व की सारी समस्याओं का केन्द्र बना हुआ है। नाना प्रकार की कठिनाइयाँ भारत में डेरा डाले हैं क्योंकि भारत के पास ही वह शक्ति है जो इन सभी कठिनाइयों से मुक्ति दिला सकती है। अभी वह शक्ति प्रायः निष्क्रिय है। भारतीय मानसिकता अभी भी पाश्चात्य प्रभाव एवं बाहरी चमक-दमक के असर से निस्तेज, हतप्रभ बैठी है। आवश्कयता है उसे अपनी अंतरात्मा को टटोलने की एवं अपनी सोई शक्ति जगाने की। और जिस दिन भारत की अंतरात्मा संवेदनषील एवं कर्मठ युवकों में जागेगी उसी दिन से अंधकार पूर्व दिशा मे उगते सूरज के सामने विलीन होता जाएगा। इस अंतरात्मा को जगाने और उषा के नव-प्रकाश का मानव चेतना की रात्रि में आवाहन करने का दिव्य कार्य है अवतार श्रीअरविन्द का। 

गीता कहती है कि अवतार का जन्म एवं कर्म दोनों ही दिव्य होते हैं। श्रीअरविन्द के साथ हम देखते हैं कि उनकी मृत्यु भी दिव्य है। संसार को जीवन देने वाले को मृत्यु की काली छाया वरण करनी होती है। विश्व को अमृत का वरदान देने वाले शिव को हलाहल पीना पड़ता है। श्रीअरविन्द भी विश्व युद्ध से निकलने वाली विशाग्नि पीते रहे। मनुष्यता के अंदर छिपी दुष्प्रवृतियों का विष वे अपने अंदर खींचते रहे ताकि उतरने वाली नई उषा का मार्ग खुल सके। फलस्वरूप 5 दिसम्बर 1950 की रात्रि को जब कुछ मुट्ठी भर लोगों के अतिरिक्त षेश संसार बेखबर सो रहा था तब श्रीअरविन्द ने अपने आंतरिक निष्चय द्वारा देह-त्याग दिया। यह अंतिम आहुति थी। इस महा-आहुति से यज्ञ की ज्वाला इतनी ऊपर उठी कि वह अतिमानसिक सत्य जिसे श्रीअरविन्द पृथ्वी एवं मनुष्य के उद्धार के लिये खींच लाना चाह रहे थे पहली बार किसी भौतिक देह में उतरकर काफी देर टिका रहा। 111 घंटों तक श्रीअरविन्द की देह एक स्वर्णिम आभा के आवरण में लिपटी रही। हजारों लोग दिन-रात चार दिनों तक उनके अंतिम दर्षन हेतु कतार बाँधे आते-जाते रहे, परंतु पांडिचेरी की गर्मी में भी शरीर में मृत्यु के बाद आने वाले लक्षण तब तक नहीं आए। यह भौतिक देह की मृत्यु के दंष पर पहली विजय थी। बाद में 9 दिसम्बर को श्रीअरविन्द के षरीर को समाधि दी गई। माताजी ने दो दिन बाद अपने वक्तव्य में कहा, ‘’प्रभु, तुमने आज सुबह मुझे आश्वासन दिया है कि तुम हमारे साथ तब तक रहोगे जब तक तुम्हारा कार्य पूरा नहीं हो जाता, तुमने आश्वासन दिया है कि तुम पूर्ण रूप से यहाँ तब तक रहोगे एवं पृथ्वी का वातावरण तब तक नहीं छोड़ोगे जबतक पृथ्वी रूपांतरित नहीं हो जाती। वर दो कि हम तुम्हारी इस अद्भुत उपस्थिति के योग्य हो सकें और अब से हमारा सब कुछ इस एक संकल्प पर केंद्रित हो जाए कि हम और अधिक पूर्ण रूप से तुम्हारे अतुलनीय कार्य की सम्पन्नता हेतु समर्पित होंगे माताजी ने वह अतुलनीय कार्य बाद में सम्पन्न भी किया। 29 फरवरी 1956 को आश्रम के प्लेग्राउंड में ध्यान के समय एक अभूतपूर्व आंतरिक घटना विश्व-स्तर पर घटी, जिसका पूरा असर अभी मनुष्य की समझ के बाहर है। माताजी के महा-संकल्प के प्रभाव एवं श्रीअरविन्द द्वारा किये गए महा-यज्ञ के फलस्वरूप मन-बुद्धि के स्तरों से कहीं ऊपर स्थित अतिमानस सत्य के द्वार खुल गए। पृथ्वी पर अतिमानस ज्योति, शक्ति और चेतना की अजस्त्र किरणें उतरने लगीं, जो निरन्तर एक नई रचना करने में लगी हैं। 1960 के उपरान्त विश्व की सारी गति बदल गई है। सर्वत्र एक उथल-पुथल हो रही है। सृष्टि के नियम बदल रहे हैं। परम्परागत सीमाएँ टूट रही हैं। पुराने मूल्य खंड-खंड हो रहे हैं। सत्य और मिथ्यात्व के बीच चल रहा संग्राम खुल कर सामने आ रहा है। हृदय-हृदय में समानता की, स्वतंत्रता की, सामंजस्य की, षांति की प्यास जग रही है। विज्ञान अंतरिक्ष का आखिरी छोर टटोल रहा है और विश्व सिमटकर एक गाँव के समान हो गया है। एक ओर मनुष्य अपने अंदर हो रहे मंथन से उत्पन्न विश और अमृत को परख रहा है, वहीं दूसरी ओर वह विश्व-मानव, विश्व-समुदाय, विश्व-राष्ट्र, इत्यादि का स्वप्न देखने लगा है। धर्म का विकृत रूप, अंधविश्वास एवं कुरीतियाँ, धीरे-धीरे खंडित हो रहे हैं, और धर्म का उज्ज्वल पक्ष योग-अध्यात्म इत्यादि के रूप में विश्व-प्रसिद्ध, सर्वमान्य एक घरेलू शब्द बन गया है। यह सब तथा और बहुत-कुछ अतिमानस सत्य के प्रभाव का मात्र पहला चरण है। 

यह महाशक्ति मिथ्यात्व के सभी गढ़ विध्वंस करते हुए अज्ञान एवं अंधकार को जड़ से निर्मूल कर देगी। यह अधखिली मनुष्यता को एक दिव्य अतिमानसिक जाति में विकसित करेगी, जिसका आधार होगा-विराट सत्य, अपार सौंदर्य, दिव्य प्रेम, एकत्व एवं आनन्द। परंतु यह कार्य षीघ्र एवं कम से कम विध्वंस से सम्पन्न हो इसके लिये आवष्यकता है मनुष्य के सहयोग की। इस नए सतयुग के निर्माण में मानव के सहयोग का नाम ही है श्रीअरविन्द का पूर्ण योग। अपनी इस योग-यात्रा का वर्णन वे तपस्या के प्रसाद रूप में अपनी ज्योतिर्मय लेखनी द्वारा रचित अनेक ग्रंथों में देते हैं, जिनमें प्रमुख हैं वेद रहस्य, गीता निबंध, योग-समन्वय, दिव्य जीवन, मानव-चक्र, माता एवं अभूतपूर्व वेद-काव्य सावित्री। 

श्रीअरविन्द का पूर्ण जीवन ही योगमय है। जैसा उन्होंने कहा है, ‘’सारा जीवन ही योग है।’’ परन्तु यह योग मनुष्य के बिना जाने सारी सृष्टि में प्रकृति कर रही है। प्रकृति में निरन्तर चल रहे इस गुह्य योग के कारण सूर्य, चन्द्रमा, तारे अपने स्थान एवं नियम पर दृढ़ हैं। इसी योग के कारण समय अनुसार रचना, विकास एवं प्रलय होते हैं। इसी सनातन योग के प्रताप से मिट्टी का ढेला कीट-पतंग बनता है, फिर पक्षी बनकर हवा में उड़ता है या पशु बनकर जंगल में विचरता है। और इसी योग से प्रगट होती है इसी मिट्टी से रचे पशु-देह में सोचने की शक्ति, बोलने की शक्ति, समझने की शक्ति। परंतु अभी भी यह योग अधूरा है। मन की शक्ति के आगे भी बहुत कुछ है जो अभी पृथ्वी पर प्रगट होना है। और इसको प्रगट करने का कार्य श्रीअरविन्द-श्रीमाँ का है। 

यह योग जीवन से भागकर किसी गुफा या जंगल में आँखें मूँदकर या कोई विषेश तंत्र-मंत्र से की जाने वाली साधना नहीं है। यह तो जीवन के दिव्य-रूपांतरण का योग है। और इसकी पूरी सिद्धि जीवन के सभी क्षेत्रों ज्ञान, विज्ञान, कला, शिक्षा, समाज, व्यवस्था, इत्यादि में होनी है। अर्थात् यह योग नए सिरे एवं नई तरह से जीवन जीने की कला है। अभी हम आधा जीवन भी नहीं जीते क्योंकि हमारे जीवन की, ज्ञान की, प्रेम की, शक्ति की सीमा हमारा अहं है। पूर्ण जीवन जीने के लिये हमें जीवन की गतिविधियों को नहीं बल्कि जीवन के आधार को बदलना होगा। अहं के देवता की जगह भगवान को केन्द्र में बिठाना होगा, भगवान के लिये जीना होगा, सब कुछ, सभी कर्म भगवान का दिया हुआ कर्म मानकर उनके हेतु करना होगा। स्वार्थ की जगह भगवान के लिये कर्म करना ही योग है। इस योग के लिए किसी बाहरी गुण-सम्पन्नता की आवष्यकता नहीं। इस योग की माँग आंतरिक है। और इसमें हमारी एकमात्र सहायक, सखा, बंधु, माता-पिता, एवं स्वामी श्रीमाँ हैं। वे ही इस योग की गुप्त अथवा प्रत्यक्ष संचालक हैं। उन्हीं के कृपा-प्रसाद से सफल होती है इस कठिन योग की दूरगामी यात्रा। उन्हीं के प्रताप से हमारी कामना-वासना एवं अहंकार से ग्रस्त मनुष्यता धीरे-धीरे दिव्यता की ओर मुड़कर रूपांतरित होने लगती है। आवष्यकता है हमारी ओर से उनके प्रति आत्म-निवेदन की, इस नए सत्य की स्वीकृति की, भगवती माँ के प्रति श्रद्धा-भाव से सर्वांगीण समर्पण की, पृथ्वी पर दिव्य साम्राज्य की स्थापना हेतु अभीप्सा की और साथ ही शका-संदेह, कामना-वासना, आलस-प्रमाद रूपी अहं-पाषों के त्याग की ताकि हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व शुद्ध, निर्मल बनकर भगवान का सचेतन यंत्र बन सके। 

श्रीअरविन्द-श्रीमाँ सक्रिय रूप से इस रूपांतरण योग को उसके निर्धारित लक्ष्य की ओर ले जा रहे हैं। माताजी ने श्रीअरविन्द के देह-त्याग के उपरान्त कहा था, हमें बाहरी रूपों से भ्रमित नहीं होना चाहिये। श्रीअरविन्द हमें छोड़ कर नहीं गए हैं। श्रीअरविन्द यहीं हैं; वैसे ही जीवित और सदा की भाँति उपस्थित हैं और यह हमारे ऊपर है कि हम उनका कार्य पूरी सत्यनिष्ठा, उत्सुकता एवं आवष्यक एकाग्रता द्वारा सिद्ध होने देते हैं। यही बात श्रीमाँ के 17 नवम्बर 1973 को देह-त्याग के उपरांत भी लागू होती है। वे यहीं हैं, हमारे मध्य, हमारे हृदय में, हमारी पृथ्वी पर। उनके कार्य की पूर्ण सफलता उसी प्रकार निष्चित है जितना अगली भोर के सूरज का निकलना। हमारी सभी अच्छी-बुरी, शुभ-अशुभ परिस्थितियाँ हमें कभी उज्ज्वल, कभी दुर्गम मार्ग से उस सुनियोजित परम सत्य के उद्घाटन की ओर ले जा रही हैं। उसका दिव्य रूपांतरण सहज हो सके इसके लिये चाहिये मनुष्य के हृदय में अभीप्सा की अग्नि, उसके रोम-रोम से दिव्य स्पर्ष के लिये उठने वाली पुकार; उसके जीवन में दिव्यता की माँग; ऊपर से उतरते सत्य की स्वीकृति एवं उसके शरीर-रूपी आधार में त्याग एवं समर्पण द्वारा उत्पन्न क्षमता जो दिव्य शक्ति को वहन कर सके। वह शक्ति जो हमारे आधार में उतरकर रूपांतरण का दिव्य कार्य सम्पन्न करती है वह है परमा माँ। 

परमा माँ और कोई नही, श्रीअरविन्द की ही शक्ति हैं। श्रीअरविन्द के ही शब्दों में, ‘’केवल श्रीमाँ की ही शक्ति, कोई मानवीय प्रयास और तपस्या नहीं, वह आवरण हटा सकती है एवं पात्र को तैयार कर सकती है तथा इस अंधकार, असत्य, मृत्यु और क्लेश के जगत में ला सकती है सत्य, प्रकाश, दिव्य जीवन और अमृतत्व का आनन्द।’’

 

ॐ आनन्दमयि चैतन्यमयि सत्यमयि परमे।
ॐ नमो भगवते श्रीअरविन्दाय।

 

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