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सावित्री (हिंदी रूपांतरण) PDF
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आदि पर्व

TheBook of Beginnings

पर्व 1 सर्ग 1

(Book1 Canto I)

प्रतीक उषा

(The Symbol Dawn)

....गतांक से आगे

 

Awake she endured the moments’ serried march

And looked on this green smiling dangerous world,

And heard the ignorant cry of living things.

Amid the trivial sounds, the unchanging scene

Her soul arose confronting Time and Fate.

जागते हुये उसने अपने ऊपर से काल की पलटन द्वारा लगातार किये गये मार्च को सहा और ऊपर से प्रलोभित करने वाले हरे भरे विहँसते लेकिन खतरनाक जगत की स्थिति को बेबस निहारती रही और प्राणियों के निरपराध विलाप को सुनती रही। इस अपरिवर्तनीय दृश्य और उन पुकारों के बीच जिन्हें कोई महत्व नहीं दिया जाता, सावित्री की आत्मा आखीरकार काल और भाग्य से लोहा लेने के लिये उठ खड़ी हुई।

Immobile in herself, she gathered force.

This was the day when Satyavan must die.

उसने निश्चल होकर इसके लिये अपनी आन्तरिक शक्ति को समेटा। यही वह दिन था जब पृथ्वी पर दिव्य प्रेम सत्यवान की मृत्यु अवश्यंभावी हो गई।

व्याख्या : जब पृथ्वी पर अचेतना के छोर से विकास फिर से शुरु हुआ अर्थात्ï आत्मा की यात्रा निश्चेतना से अति चेतना की ओर आरंभ हुई तो सुख के साथ दुख, प्रेम के साथ घृणा, उत्साह के साथ निराशा अमृतत्व के साथ मृत्यु और प्रकाश के साथ छाया भी चल पड़ी। दो विरोधी शक्तियों के बीच का द्वन्द्व ही सृष्टि जीवन की कहानी है जो विकास पथ के साथ साथ चलती है। निश्चेतना के भीतर ज्ञान की चिनगारी ज्यों ज्यों आगे को बढ़ती है निश्चेतना का खोल और अज्ञान धीरे धीरे परत दर परत उससे अलग होता जाता है। इसके लिये स्वरूप को भी बदलना आवश्यक हो जाता है।

अनेकों प्रकार के कष्ट और व्यथाओं के जरिये मृत्यु द्वारा आत्मा का उत्पीडऩ किया जाता है जिससे जीवन में अभीप्सा या भगवत्ता के लिये पुकार उठे। मृत्यु पीठ पर जो कोड़े बरसाती है उसी के कारण जीव में ज्ञान की प्यास बढ़ती है और वैयक्तिकता का अहं धीरे धीरे घुलता है। इस प्रकार मृत्यु का कार्य क्रूर होते हुये भी आत्मविकास के हित में है जिसे वह भगवान का आदेश मानकर करती तो है पर उससे उसे प्रसन्नता नहीं होती। धीरे धीरे मृत्यु इस क्रूरता को अपना अधिकार मानने लगती है। इस मान्यता के कारण वह सावित्री को भी संसारी जीवन में रुलाने के लिये सन्नद्ध हो जाती है। सावित्री भी इसे समझ जाती है और जान जाती है कि दिव्य प्रेम जिसे स्वर्ग से अपने साथ वह पृथ्वी पर पृथ्वी की अभीप्सा सत्यवान के लिये ले आई है उसकी मृत्यु द्वारा हत्या कर दी जायगी। अतयेव मृत्यु के इस परम्परागत अधिकार को समाप्त करने के लिये सावित्री मृत्यु की चुनौती को स्वीकार कर लेती है और संघर्ष के लिये तैयारी करने लगती है।

एक चेतावनी : प्रथम उषा के रूप में जो परमाशक्ति पृथ्वी पर कभी उतरी और जिसे किसी ने नहीं पहचाना और वह वापस लौट गई, वह वर्तमान में हुये अवतरण का प्रतीक भी है। यह शक्ति इसलिये वापस लौट गई क्योंकि उसे धारण करने की चेतना का विकास मानव जाति में नहीं हुआ था और उसने भौतिकता की दौड़ में इस प्रकाश की ओर से पीठ फेर ली थी।

उस समय की निम्न मानव चेतना का जिन शब्दों में दृष्टा कवि ने वर्णन किया है वह ठीक वर्तमान मानव की चेतना का ही सही सही चित्रण है। पृथ्वी की वर्तमान और उसकी मानसिक और क्षणिक उपलब्धियों की चमक ने अन्तर मानव को अन्धा कर दिया है। वह इन उपलब्धियों की दौड़ में अपनी आत्मा को निष्काषित कर दिया है जिससे अवतरण होते प्रचण्ड दिव्यानन्द को ग्रहण कर पाने के लिये तथाकथित बुद्धिवादी व्यक्ति के पास कोई जमीन ही नहीं बची है। सावित्री का प्रथम सर्ग ऐसे मानवी जगत के लिये कड़ी चेतावनी है कि यह Descent भी वापस हो सकता है। यह अलग बात है कि कोई दिव्यशक्ति या सावित्री का कोई प्रतिरूप फिर से जन्म लेकर उस प्रकाश को यहाँ कायम रखे और जगत में अभिव्यक्त करे।

'This was the day when satyawan must die' के साथ सावित्री का प्रथम सर्ग समाप्त होता है। इसके साथ ही सावित्री अपने असली रूप में आती है और मृत्यु से लोहा लेने के लिये सन्नद्ध होती है। सावित्री ने जो इतनी गहन साधना की उसका वर्णन सर्ग 2 में किया गया है। इस सर्ग का अन्त इस बात की आशा को अवश्य दर्शाता है कि सावित्री अपनी अकेली जुझारू साधना के द्वारा मनुष्य के भीतर बन्द दरवाजे को धक्का देकर खोल जाती है।

लेकिन प्रथम सर्ग पूरी मानव जाति के लिये यह कड़ी चेतावनी है कि यदि समय रहते मानव चेतना नहीं जागी तो पृथ्वी की उतनी बड़ी क्षति होगी जिसकी पूर्ति लगभग असंभव हो जायगी

 

 

........क्रमशः