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Divyanter e-Magazine August - Sept 2011 दिव्यांतर (ई पत्रिका) अगस्त - सितम्बर २०११

श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर (Shri S.N.Jauhar) Shri Aurobindo Ashram Delhi Branch

हमारी मासिक पत्रिका दिव्यांतर (ई पत्रिका) में पढिये श्री अरविन्द के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘सावित्री’ का हिन्दी गद्य में अनुवाद

सावित्री योजना

सावित्री में ३ खण्ड हैं। प्रथम खण्ड आदि पर्व में ३ पर्व हैं जिसमें सृष्टि के पुनर्जन्म, उसकी समस्या और अश्वपति की साधना का विस्तार से वर्णन है। साथ ही भगवती माता का पर्व है। खण्ड दो में सावित्री के जन्म का पर्व, प्रेम पर्व, भाग्य पर्व, योग पर्व और मृत्यु पर्व सम्मिलित किये गये हैं। खण्ड तीन में चार पर्व हैं शाश्वत रात का पर्व, दोहरी द्वाभा का पर्व, शाश्वत्‌ दिवस का पर्व और उपसंहार। इन सबको मिलाकर ही पूर्ण योग की योजना बनती है। इस योजना का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है


पर्व १ सर्ग १
प्रतीक उषा


इस सर्ग में जागतिक जीवन की मूल समस्या का उल्लेख किया गया है। मूल समस्या यह है कि दिव्य जगत का जब निश्चेतन शून्य में विलोपन हो गया तो वहाँ से वह धीरे धीरे विकास के माध्यम से पुनः ऊपर की दिव्यता को प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है। विकास के इस क्षेत्र का नाम ही सृष्टि है जो धरती पर कायम है। धरती उस प्रेम की अभीप्सा करती है जिसे वह खो चुकी है। इस अभीप्सा का नाम सत्यवान है। चिदाकाश जहाँ से दिव्य जगत का निश्चेतन शून्य में पतन हुआ था, पृथ्वी में उतर कर नीचे से उठती अभीप्सा से मिलना चाहता है और अपनी शति को नीचे उतारता है। इस उतरने वाली शति का नाम ही सावित्री है। सावित्री प्रत्येक बार शति अवतरण के रूप में अपने उस सत्यवान से मिलकर याह रचाती है जो आरोहण के द्वारा उसी दिव्यता से मिलना चाहता है। पृथ्वी पर दोनों के मिलने से दिव्यलोक का आनन्द प्रेम के रूप में सृष्टि का दिव्यीकरण कर देगा। यही दैवी योजना है। मृत्यु इस योजना में बाधक है। मृत्यु निश्चेतना का प्रतिनिधि है और सृष्टि पर अपने अधिकार को कायम रखना चाहता है। सत्यवान मृत्यु के पाले को छोड़कर सावित्री के पाले में जाना चाहता है इसलिये उसे वह मार डालता है जिससे दिव्य प्रेम का अन्त हो जाय। यह प्रक्रिया बारबार दोहराई जाती है। पर भगवान्‌ का उद्देश्य तो सृष्टि को स्वर्ग जैसा दिव्य बनाना है इसलिये सृष्टि के आदिकाल से प्रेम व मृत्यु के बीच पृथ्वी पर संघर्ष् चलता आ रहा है और सनातन सावित्री और सनातन सत्यवान इस समस्या को आदिकाल से सुलझाने का प्रयास करते आ रहे हैं। यह समस्या तभी हल होगी जब सावित्री की प्रेमशति इतनी सबल हो जाय कि वह मृत्यु को अपनी आग से जलाकर उसे रूपान्तरित कर दे। कविदृष्टा के अनुसार वर्तमान ही वह दैव मुहूर्त है जब यह उद्देश्यपूर्ण हो सकता है। इसे कथानक के रूप में व्यत किया गया है।


पर्व १ सर्ग २
समस्या
(The Issue)

इस सर्ग में जागतिक जीवन की मूल समस्या का उल्लेख किया गया है। मूल समस्या यह है कि दिव्य जगत का जब निश्चेतन शून्य में विलोपन हो गया तो वहाँ से वह धीरे धीरे विकास के माध्यम से पुनः ऊपर की दिव्यता को प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है। विकास के इस क्षेत्र का नाम ही सृष्टि है जो धरती पर कायम है। धरती उस प्रेम की अभीप्सा करती है जिसे वह खो चुकी है। इस अभीप्सा का नाम सत्यवान है। चिदाकाश जहाँ से दिव्य जगत का निश्चेतन शून्य में पतन हुआ था, पृथ्वी में उतर कर नीचे से उठती अभीप्सा से मिलना चाहता है और अपनी शति को नीचे उतारता है। इस उतरने वाली शति का नाम ही सावित्री है। सावित्री प्रत्येक बार शति अवतरण के रूप में अपने उस सत्यवान से मिलकर याह रचाती है जो आरोहण के द्वारा उसी दिव्यता से मिलना चाहता है। पृथ्वी पर दोनों के मिलने से दिव्यलोक का आनन्द प्रेम के रूप में सृष्टि का दिव्यीकरण कर देगा। यही दैवी योजना है। मृत्यु इस योजना में बाधक है। मृत्यु निश्चेतना का प्रतिनिधि है और सृष्टि पर अपने अधिकार को कायम रखना चाहता है। सत्यवान मृत्यु के पाले को छोड़कर सावित्री के पाले में जाना चाहता है इसलिये उसे वह मार डालता है जिससे दिव्य प्रेम का अन्त हो जाय। यह प्रक्रिया बारबार दोहराई जाती है। पर भगवान्‌ का उद्देश्य तो सृष्टि को स्वर्ग जैसा दिव्य बनाना है इसलिये सृष्टि के आदिकाल से प्रेम व मृत्यु के बीच पृथ्वी पर संघर्ष् चलता आ रहा है और सनातन सावित्री और सनातन सत्यवान इस समस्या को आदिकाल से सुलझाने का प्रयास करते आ रहे हैं। यह समस्या तभी हल होगी जब सावित्री की प्रेमशति इतनी सबल हो जाय कि वह मृत्यु को अपनी आग से जलाकर उसे रूपान्तरित कर दे। कविदृष्टा के अनुसार वर्तमान ही वह दैव मुहूर्त है जब यह उद्देश्यपूर्ण हो सकता है। इसे कथानक के रूप में व्यत किया गया है।


पर्व १ सर्ग ३
अश्वपति का योग

अश्वपति मानव जाति का प्रतिनिधि बनकर पृथ्वी की ओर से साधना करने के लिये चेतना के उच्चतम शिखरों से आया। पृथ्वी की चेतना को ऊपर से अवतरित होने वाली शति के प्रति ग्रहणशील बनाने के लिये वह कठिन साधना करता है और आरोहण तथा अवरोहण की अनुभूति कर इन शतियों की प्रक्रिया को समझता है और अपनी आत्मा को त्रिगुणात्मक जगत के बंधन से मुत करता है। आत्मा की मुति के द्वारा वह दिव्यलोकों तथा निश्चेतना के अधोलोकों दोनों की यात्रा करके वहाँ की चेतना और रहस्यों को समझता है और यह जानने का प्रयास करता है कि सृष्टि की समस्याओं का हेतु और उनका समाधान या है।


पर्व १ सर्ग ४
रहस्यमय ज्ञान

यह सर्ग सावित्री का बहुत ही महत्वपूर्ण सर्ग है। यह त्रिगुणात्मक जीवन के रूपान्तर की कुंजी है जिसमें सत्य चेतना के पृथ्वी पर अवतरण करने के रहस्य को उद्‌घाटित किया गया है। इस सर्ग में बताया गया है कि अतिमानस शति के अवतरण से ही त्रिगुणात्मक जीवन का रूपान्तर संभव है। इस शति को अवतरण कराने के लिये कठिन साधना की आवश्यकता है। इस सत्यचेतना को पृथ्वी चेतना में उतारने के लिये भगवान्‌ उपयुत पात्र का चुनाव करती है। इस अवतरण की आनन्द विभोर करने वाली अनुभूतियों का वर्णन करते हुये यह आश्वासन भी दिया गया है कि भगवती माता की कृपा से इस अवतरण की संभावना बन रही है। इस शति के अवतरण से ही सृष्टि का उध्दार संभव है। यही शति विकास की बाधाओं को तोड़ सकती है। यही मानव प्रकृति का रूपान्तर कर सकती है इसलिये जैसे भी हो मनुष्य को इसके लिये अभीप्सा करनी चाहिए और ग्रहणशील बनना चाहिये।


पर्व १ सर्ग ५
अश्वपति का योग, परम आत्मा की स्वतंत्रता
और उसकी महत्ता का योग

यह सर्ग, सर्ग ३ का ही विस्तार और अधिक उँचाई तक जाने का योग है। सर्ग ३ में आत्मा को मन, प्राण व शरीर की त्रयी से मुत कराने के योग का वर्णन है। इस सर्ग में उसे सत्‌, चित व आनन्द के सर्वोच्च त्रिलोकों में स्वतंत्र विचरण कराने का योग है। अश्वपति उन लोकों का दर्शन व संभावनाओं का अध्ययन करता है जहाँ से सत्य चेतना (Supramental Truth) का अवतरण पृथ्वी की चेतना में कराया जा सकता है। वह स्वयं इस दिव्य अवतरण में सराबोर होकर उसकी शति, प्रकाश और आनन्द को नीचे उतारने की अभीप्सा करता है। वह सच्चिदानन्द के भी ऊपर अज्ञेय के महाशून्य की उँचाई तक पहुँचता है और वहाँ से आरोहण और अवरोहण की शतियों का अध्ययन करता है। इन शतियों के अलावा भी अन्य अगणित शतियों का ज्ञान प्राप्त करता है जो सारे विश्व में कार्यरत हैं। उस एकत्व के जगत में, जहाँ विभाजन नहीं है, उस कुंजी को वह ढूँढता है जहाँ से संसारी जीवन के संघर्षें का अन्त किया जा सके।


पर्व २ सर्ग १ - यात्रा पर्व
जगतों के सोपान

पर्व २ अश्वपति की यात्रा का पर्व है जिसका पूरे १५ सर्गों में विस्तार किया गया है। यह पर्व १ के सर्ग ३ व ५ का ही विस्तार है। पर्व १ सर्ग ३ में जो साधना अश्वपति द्वारा की गई है वह उसकी व्यतिगत साधना है। पर्व १ सर्ग ५ तथा पूरे पर्व २ में उसके द्वारा जो साधना की गई है वह भी है तो व्यतिगत लेकिन उसने यह साधना मानव जाति के प्रतिनिधि के रूप में किया है। सृष्टि और चेतना के विभिन्न लोकों की अनुभूतियों का इस पर्व में उल्लेख है। सृष्टि की ओर से सृष्टि के उध्दार के लिये उसके योग का वर्णन भगवती माता के पर्व ३ में किया गया है। इसी पर्व में नयी सृष्टि के निर्माण की अभीप्सा भी की गई है।
पर्व २ सर्ग १ में अश्वपति अनुभूति में देखता है कि सारा विश्व एक असीमित गति है जो असीम अन्तरिक्ष के भीतर अनवरत्‌ रूप से गतिमान है, चेतना के अनेकों लोक हैं जिनकी बुनावट आदिरथ जैसी है। वे एक के बाद एक स्थित हैं पर उनके आधार और शिखर आँखों के लिये अदृश्य हैं। इनके आधार नीचे निश्चेतना तक फैले हैं जबकि शिखर सर्वोच्च स्वर्गों तक अदृश्य हैं। वे चेतना के दोनों गोलार्ध्दों में स्थित हैं इसलिये साधक अपनी साधना में लगातार ऊपर को ही नहीं चढ़ता बल्कि उनकी जड़ों तक नीचे पाताल में भी पहुँचता है और आगे के लोक को जानने के लिये पुनः ऊपर की ओर यात्रा करता है मानो एक पहाड़ के बाद दूसरे पहाड़ में चढ़कर उतर रहा हो और उतर कर पुनः चढ़ रहा हो। साधक की सहायता के लिये प्रत्येक लोक की चढ़ाई के लिये ऊपर से शति का अवरोहण होता है लेकिन निम्न शतियाँ उसके पथ में बाधा भी खड़ी करती हैं।


पर्व २ सर्ग २
सूक्ष्म जड़द्रव्य का लोक

यह लोक पृथ्वी लोक के सबसे निकट है और अश्वपति सबसे पहले इसी जगत में प्रवेश करता है। यह लोक अत्यन्त अलौकिक व पृथ्वी लोक का स्रोत और आधार है। पृथ्वी में प्रकट होने वाली प्रत्येक चीज का रूप पहले इसी सूक्ष्म भौतिक लोक में बनता है। यह बहुत सुन्दर है और अतिमानस लोक की ही बानगी (Sample) है। यह लोक पृथ्वी के लिये सुरक्षा कवच का भी काम करता है योंकि ऊपर से आने वाली दुष्प्रभावी शतियाँ यहाँ छन जाती हैं। यहाँ की कुरूपता भी वहाँ बहुत सुन्दर और यहाँ के दुष्ट लोग भी वहाँ सज्जन दिखते हैं। यहाँ पृथ्वी में चीजें इसलिये उल्टी हो जाती हैं योंकि उन पर निश्चेतना का प्रभाव पड़ता है। यहाँ चीजें सूक्ष्म शरीर में होने से मरती नहीं। पृथ्वी में जो बाह्य शरीर आत्मा का खोल होता है वह जड़ होने के कारण ही मरता है। अश्वपति ने देखा कि सूक्ष्म भौतिक और भौतिक के बीच अगर सेतु बनाया जा सके तो संसार की समस्यायें हल की जा सकती हैं।


पर्व २ सर्ग ३
प्राण का उत्सर्ग और पतन

इस सर्ग में सृष्टि के कष्ट और पीड़ा के कारणों का अश्वपति ने पता लगाया। उसने देखा कि प्राणमय लोक इतना विशाल है कि उसके आदि व अन्त का पता नहीं लगता। वह भटकाव का लोक है जिसके उद्देश्य का पता नहीं लगता। इसका ऊपरी भाग सूक्ष्म प्राण (प्राणमय लोक) से मिलता है जहाँ सारी चीजें देवतुल्य और भगवती माता की शति से अनुप्राणित हैं लेकिन इसकी जड़ें पाताल के नर्क में स्थित हैं। अश्वपति ने इस विरोधाभास का पता लगाने को नीचे उतरा। उसे मालूम हुआ कि दिव्यलोक की चित शति का ही पतित रूप प्राणशति है। जब चित शति निश्चेतना के शून्य में प्रलय के समय डूब गई तो उसकी शति अचेत हो गई। जब उस शति ने धीरेधीरे जागना शुरु किया और पुनः सृष्टि का निर्माण होने लगा तो इस प्रारंभिक शति का नाम ही प्राण हुआ। यह प्राणशति अपने दिव्य स्वरूप को पाने के लिये चारों ओर हाथपैर मारती है। उसमें उसी आनन्द और दिव्यता को पाने के लिये ललक होती है जिससे अनेकों प्रकार की इच्छायें पैदा हुईं। उन इच्छाओं की पूर्ति के लिये वह हर चीज पर मुँह मारती है पर कभी तृप्त नहीं होती। मनुष्य इन इच्छाओं के पीछे भागता है पर कभी सन्तुष्ट नहीं हो पाता। इन इच्छाओं के कारण ही संघर्ष् और अनगिनित समस्यायें पैदा होती हैं। ये इच्छायें इसलिये निम्न और अपराधी प्रवृति की होती हैं योंकि निश्चेतना नहीं चाहती कि प्राणशति उसके नियंत्रण से बाहर निकल जाय। फलस्वरूप प्राण में ईर्ष्या, द्वेष्, संघर्ष्, प्रतिशोध व अपराध की प्रवृति पैदा हो गई।

सावित्री हिंदी रूपान्तर के कुछ अंश

सावित्री

IT WAS the hour before the Gods awake.
Across the path of the divine Event
The huge foreboding mind of Night, alone
In her unlit temple of eternity,
Lay stretched immobile upon Silence’ marge.
अर्थ- नये सृष्टि विकास क्रम की प्रारंभिक अवस्था में विकास को गति देने वाले देवगणों के जागरण की बेला अभी नहीं आई थी। नये प्रकाश को लाने वाली दिव्य उषा के पथ पर अपनी शाश्वतता के अँधेरे मन्दिर में महारात्रि का विशाल इन्कारी मन महामौन के किनारे अचल अटल अकेला ही पसरा पड़ा था।


Almost one felt, opaque, impenetrable,
In the sombre symbol of her eyeless muse
The abysm of the unbodied Infinite;
A fathomless zero occupied the world.
A power of fallen boundless self awake
Between the first and the last Nothingness,
Recalling the tenebrous womb from which it came,
Turned from the insoluble mystery of birth
And the tardy process of mortality
And longed to reach its end in vacant Nought.

महारात्रि की दृष्टि विहीन अंधी समाधि में उसकी प्रतीक खिन्नता लगभग अभेद्य और अपारदर्शी प्रतीत होती थी। एक अरूप अनन्तता की पातालवत अथाह शून्यता संसार को निगल रही थी।
अब महारात्रि का यह मन जो असीम आत्मा के पतन की ही एक शक्ति था, प्रथम और अन्तिम शून्य (ऊपर के अतिचेतन शून्य और नीचे के निश्चेतन शून्य) के बीच जागा और उस अंधे गर्भाशय का स्मरण किया जहाँ से वह निकला था। उसने जन्म मरण की कभी हल न होने वाली रहस्यात्मक पहेली को याद करके जीवन की इस धीमी और उबाऊ प्रक्रिया से एक बार फिर गुजरने से इन्कार किया अर्थात्‌ पृथ्वीपर के सृष्टि जीवन को फिर से धारण करने से मना किया (रहस्य इसलिये किबार बार जन्म लेने और मरने के पीछे प्रकृति का कौन सा उद्देश्य छिपा है यह समझ से परे है) व फिर से सृष्टि जीवन में प्रवेश करने के बजाय अपने को महाशून्य में मिटा देने को अधिक श्रेयस्कर माना।


A few shall see what none yet understands;
God shall grow up while the wise men talk and sleep;
For man shall not know the coming till its hour
And belief shall be not till the work is done.

आज जिस सत्य को कोई नहीं समझ पा रहा है उसे थोड़े से जिज्ञासु लोग अपनी (आन्तरिक) आंखों से देख सकेंगे। (ये संभवत: वही बीज होंगे जिन्हें Descent हो रहा होगा) इस दिव्य सत्य के अवतरण से इस धराधाम में भगवत्ता धीरे धीरे अभीप्सुओं के भीतर विकसित होगी लेकिन तथाकथित विद्वान लोग बहस में गप्पें हांकते और सोते रहेंगे। उन्हें इस दिव्यता का आभास तक नहीं होगा (क्योंकि बुद्धि का अहं इस भागवत् चेतना को स्वीकार नहीं करता) सामान्य लोग इस सत्य के अवतरण की घड़ी तक इसका अनुभव नहीं करेंगे और उन्हें इस दैवी कृपा के अवतरण पर तब तक विश्वास नहीं होगा जब तक पृथ्वी की चेतना में भगवान का कार्य (अर्थातृ रूपान्तर का कार्य) पूरा नहीं हो जाता।


“O strong forerunner, I have heard thy cry.
One shall descend and break the iron Law,
Change Nature’s doom by the lone spirit’s power.
A limitless Mind that can contain the world,
A sweet and violent heart of ardent calms
Moved by the passions of the gods shall come.

‘‘ओ नयी सृष्टि के योध्दा अग्र धावक, मैंने तेरी पुकार सुन ली है (मैं वचन देती हूँ कि) एक शक्ति पृथ्वी पर उतरेगी और नियति के कठोर नियम (मृत्यु और पीड़ा आदि) को तोड़ेगी, प्रकृति द्वारा ढाये जाने वाले महाविनाश के दृश्य को वह अपनी अकेली आत्मिक शक्ति से बदल देगी। एक ऐसे असीम मन के साथ आयेगी जो सारे जगत को अपने भीतर समा लेगा। देव तुल्य भावावेग से उत्प्रेरित एक अति मधुर, अटल प्रचण्ड शान्ति, हृदय के तीव्र उन्मेष के साथ पृथ्वी पर अवश्य अवतार लेगी।


All mights and greatnesses shall join in her;
Beauty shall walk celestial on the earth,
Delight shall sleep in the cloud-net of her hair,
And in her body as on his homing tree
Immortal Love shall beat his glorious wings.

सारी प्रबल दैवी शक्तियाँ और महानतायें उसके व्यक्तित्व का अंग बनेगी, एक स्वर्गीय लावण्य साकार होकर पृथ्वी पर चलेगा, बादलों जैसी घटाओं से बुने उसके सुन्दर बालों पर परमानन्द विश्राम करेगा और बसेरा देने वाले वृक्ष की तरह उसकी काया पर अमर प्रेम का पंछी अपना पंख चलायेगा।


A music of griefless things shall weave her charm;
The harps of the Perfect shall attune her voice,
The streams of Heaven shall murmur in her laugh,
Her lips shall be the honeycombs of God,
Her limbs his golden jars of ecstasy,
Her breasts the rapture-flowers of Paradise.

दुख विहीन सन्तुष्टि का संगीत उसकी मोहकता में वृध्दि करेगा। परिपूर्णा की वीणा उसकी वाणी को स्वर देगी। उसकी हँसी में स्वर्गीय जलधारा के प्रवाह की गुंजन सुनाई देगी। उसके सुन्दर ओंठ भगवत्ता के मधुमय छत्ते जैसे होंगे और उसके अंग भगवती के आनन्दातिरेकी स्वर्णिम पात्र तथा उरोज स्वर्ग की रोमांचक प्रफुल्लता के पुष्प जैसे होंगे।


She shall bear Wisdom in her voiceless bosom,
Strength shall be with her like a conqueror’s sword
And from her eyes the Eternal’s bliss shall gaze.

उसकी मौन छाती ज्ञानवत्ता की वाहक होगी और शक्ति तो उसमें एक विजेता की तलवार जैसी होगी। उसके चक्षुओं से शाश्वत् का आनन्द निहारेगा।


A seed shall be sown in Death’s tremendous hour,
A branch of heaven transplant to human soil;
Nature shall overleap her mortal step;
Fate shall be changed by an unchanging will.”

मृत्यु की घनघोर घड़ी में एक बीज बो दिया जायगा और स्वर्ग की एक सुन्दर डाली का मानव-माटी (शरीर) में रोपण कर दिया जायगा। प्रकृति अपने मरणशील कदम के ऊपर से छलांग लगा जायगी अर्थात् उसका विकास द्रुत गति से बढ़ जायगा। एक अपरिवर्तनीय इच्छा शक्ति द्वारा पृथ्वी के भाग्य को बदल दिया जायगा।’’


This world was not built with random bricks of Chance,
A blind god is not destiny’s architect;
A conscious power has drawn the plan of life,
There is a meaning in each curve and line.
It is an architecture high and grand
By many named and nameless masons built
In which unseeing hands obey the Unseen,
And of its master-builders she is one.

यह संसार संयोग की बिखरी ईंटों को जोडक़र नहीं बनाया गया है न ही कोई अन्धा देव हमारे प्रारब्ध का शिल्पी है। एक सचेतन शक्ति ने जीवन की योजना का मानचित्र खींचा है जिसकी प्रत्येक रेखा व चाप का कोई न कोई अर्थ है। जीवन एक ऐसा शिल्प है जो बहुत ऊँचा और महान है। इस मानचित्र के अनुसार कितने ही जाने और अनजाने कारीगरों ने इसका निर्माण किया है जिसमें अज्ञात शिल्पकार परमात्मा की आज्ञा का कितनों ही अज्ञात शक्तियों ने पालन करते हुये काम किया है और ऐसी इमारत के सर्वोच्च निर्माताओं में एक सावित्री भी है।


If thou and I are true, the world is true;
Although thou hide thyself behind thy works,
To be is not a senseless paradox;
Since God has made earth, earth must make in her God;
What hides within her breast she must reveal.

अगर तू और मैं सत्य हैं तो संसार भी सत्य है यद्यपि तू अपने आपको अपने कार्यों के पीछे छिपा लेता है तो भी तेरा होना अर्थात् अस्तित्वपूर्ण होना कोई निरर्थक विपरीतता नहीं है। (मैं प्रकट हूँ और तू अप्रकट रूप में अस्तित्वपूर्ण है। ये दोनों चीजें विरोधी तो हैं पर इस विरोध के पीछे एक अर्थ है।) अर्थ यह है कि चूँकि ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया इसलिये सृष्टि को अपने भीतर ईश्वर का निर्माण करना ही चाहिये। जो चीज उसके हृदय में छिपी है उसको उसे प्रकट करना ही चाहिये।


I claim thee for the world that thou hast made.
If man lives bound by his humanity,
If he is tied for ever to his pain,
Let a greater being then arise from man,
The superhuman with the Eternal mate
And the Immortal shine through earthly forms.

ओ ज्योतिर्मय देव! मैं तुझ पर दावा करती हूँ क्योंकि तूने संसार का निर्माण किया है। अगर मनुष्य ऊपरी मानवता में बध्द है, अगर वह हमेशा के लिये अपनी पीड़ा से बँधा है तो ऐसा कर, कि मनुष्य से श्रेष्ठतर सत्ता (अतिमानव) मनुष्य के भीतर पैदा हो जाय और यह अतिमानव शाश्वत् का ही जीवनसाथी बन जाय तथा यह अमरसत्ता मनुष्य के संसारी स्वरूपों के भीतर से चमके।


But when the hour of the Divine draws near
The Mighty Mother shall take birth in Time
And God be born into the human clay
In forms made ready by your human lives.

जब भागवत् घड़ी समीप आयेगी तो शक्तिमयी माता सृष्टि में अवतार लेगी और भगवान् मानव माटी के भीतर उन लोगों के भीतर जन्म लेगा जिन्हें तुम जन्म-जन्मान्तरों से इसके लिये तैय्यार करती आई हो। तब सर्वोच्च सत्य मानव जाति को प्रदान किया जायेगा।


He who would save the world must share its pain.
If he knows not grief, how shall he find grief’s cure?
If far he walks above mortality’s head,
How shall the mortal reach that too high path?
If one of theirs they see scale heaven’s peaks,
Men then can hope to learn that titan climb.
God must be born on earth and be as man
That man being human may grow even as God.

जो संसार का उध्दार करेगा उसे उसके कष्ट का भागीदार बनना ही पड़ेगा क्योंकि अगर वह कष्ट को स्वयं भोग कर उसकी पीड़ा को नहीं समझेगा तो भला वह उस कष्ट के निवारण का उपाय कैसे ढूँढ पायेगा ? अगर वह नश्वरता की चोटी से दूर ऊपर ही ऊपर चलेगा तो मनुष्य उस अति उँचाई वाले मार्ग तक भला कैसे पहुँच पायेगा ? पर यदि लोग अपने में से ही किसी व्यक्ति को स्वर्ग के शिखर पर चढ़ते देखेंगे तो अन्य लोग भी उस उत्तुंग उँचाई तक चढऩे के प्रयास की आशा करेंगे। सच तो यह है कि भगवान को पृथ्वी पर जन्म लेना और मनुष्य बनकर अनिवार्य रूप से यहाँ जीवन बिताना होगा जिससे अपनी मानवी प्रकृति में जीने वाला मनुष्य भी उसका अनुकरण करते हुये भगवान के रूप में विकसित हो सके।


He who would save the world must be one with the world,
All suffering things contain in his heart’s space
And bear the grief and joy of all that lives.

वह जो इस संसार को बचायेगा उसे इस संसारी जीवन के साथ एक होना पड़ेगा और यहाँ के सारे कष्टों को उसे अपने हृदय में स्थान देना होगा तथा सारे जीवधारियों के सुख-दुख को भोगना पड़ेगा।


नोट: मूल हिंदी रूपांतर सिर्फ हन्दी मे है. यहाँ पर पाठकों की सुविधा के लिये सावित्री से अंग्रजी पंक्तिया जोड़ दी गई हैं.