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सम्पादकीय

 

A Call for Collaboration

 

None of the present achievements of humanity, however great they are, can be for us an ideal to follow. Our purpose is quite different and if our chances of success are small just now, we are sure that we are working to prepare the future. We are endeavering for something which belongs to the future. The inspiration is from above, the guiding force is from above, the creative power is from above at work for the descent of the new realisation. 
The task is no doubt, a formidable one but we received the command to accomplish it and we are upon earth for that purpose alone.

– The Mother.

 

 

श्रीअरविन्द योग का उद्देश्य न तो कोई धर्म या सम्प्रदाय खड़ा करना, न देश-विदेशों में लाखों की संख्या में शिष्यों की मण्डली जुटाना, न ही सरकारों को गिराने या बनाने के लिये कोई भीड़ इकठ्ठा करना और न ही मीडिया में अपनी छवि को चमकाना है। ये सारे पुराने सिक्के चलन से बाहर हो चुके हैं। चेतना के पन्नों में इन बुझे हुये मानचित्रों को देखकर नई सर्जना की आँखें हँसेगी और आश्चर्य करेंगी।

 

सत्य न तो मन की ऐसी बाजारों में कभी उतरता न ही असत्य कभी तर्क की बेंचों में भागता। दिव्य जीवनकी रचना मौन की शक्ति में होती है। उसके लिये नई भूमि और छाया विहीन मुठी भर धूप चाहिए। नई माटी में ही कल की सुबह का बीज बोया जायगा। धर्म और राजनीति के वासी टकसाल इस माटी में अब नहीं उगेंगे। साम्प्रदायिकताओं, मान्यताओं और युगों से चली आ रही लंगीमार जीवन की सारी प्रतिस्पर्धाओं और छत्रपों का उपसंहार, बस अब कुछ साथियों की ही बात रह गई है। हमारा आदर्श मरते अतीत की लाशों को टीकने के बजाय नये युग के ललाट में ही चदन लगाता है। और नये जीवन की भित्ति न तो पश्चिम की वहिर्मुखता पर खड़ी होगी न ही पूर्व की शून्यवादी अन्तर्मुखता पर। नई मानवता की रचना नये सत्य के दिव्यावतरण को पकड़ पाने की क्षमता पर आधारित होगी। यही क्षमता हमारे अगले दिन का पाठ है जिसके विद्यार्थियों की पहचान अभी बाकी है।

 

पूर्व अंक के सम्पादकीय में उन प्रत्याशियों की खोज के लिये प्रयास किया गया है जो केवल भागवत कार्य के लिये ही जन्मे हैं। निश्चित ही इन्हें अपने चैत्य के अनुदेश के अनुसार अपने कर्मभूमि की तलाश करनी है लेकिन व्यक्तिगत कर्म साधना को उन्हें सामुदायिक साधना के साथ भी जोडऩा होगा क्योंकि श्रीअरविन्द योग में व्यक्ति तथा समुदाय के बीच आत्मिक सामंजस्य को बनाये रखना अतिमानस सत्य की अनिवार्यता है। लेकिन समुदाय का अर्थ भीड़ नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीअरविन्द की चेतावनी प्रत्येक के हृदय में ध्वनित और प्रतिध्वनित होनी चाहिये -

'मेरे योग जैसे कार्य के लिये आन्दोलन चलाने का अर्थ होगा किसी मतावलम्बी, किसी सम्प्रदाय या इसी प्रकार के किसी अन्य निकृष्ट व निरर्थक चीज की स्थापना करना। इसका अर्थ यह होगा कि सैकड़ों और हजारों निकम्मे लोग उसमें शामिल हो जायँगे और उसे नष्ट कर देंगे। ..... इस कार्य के लिये मैं केवल उन्हें ले रहा हूँ जो इसके लिये चुने गये हैं। 
     इस कथन की पुष्टि करते हुये माता जी कहती हैं -

'The effort of transformation limited to a small number becomes something for more precious and for more powerful for the realisation. It is as if a choice has been made of those who will be the pioneers of the New creation.'

 

श्रीअरविन्द ने सावित्री में एक प्रकार से भविष्यवाणी करते हुये हमें आश्वस्त किया है -

Some shall be made the glory's receptacle The Vehicle of the Eternal's luminous power They are the high forerunners the heads of time The great deliverers of earth bound mind The high transfigurers, of human clay The first born of the supernal race.

 

इन अगधावकों की पहचान कैसे हो, इस सम्बन्ध में माँ और श्रीअरविन्द दोनों का मत बहुत स्पष्ट है -
'It is when one feels the descent that one can really be the true instrument for the birth and action of divine love in the world.'

यह divine love अर्थात् प्रेमानन्द ही जगत और जीवन का आधार है। प्रेमानन्द ही सृष्टिगत चेतना के मूल में क्रियाशील है। दिव्यावतरण अर्थात् दिव्य चेतना का Descent प्रेमानन्द की ही ऊपर से वर्षा है जो वर्तमान मानवी चेतना को अतिमानवी चेतना तक ऊपर उठायेगा। इसीलिये श्रीअरविन्द योग का मुख्य उद्देश्य इसी प्रेमानन्द को धरती पर उतार लाने का रहा है। अब जब कि वह पृथ्वी में उतर रहा है, उसे अपनी अभिव्यक्ति के लिये उन पात्रों की आवश्यकता है जिनमें उसके 'Birth and Action' अर्थात् उस आनन्द में जन्मने और कर्म में परिणित करने की पात्रता हो। बहुत सारी आत्मायें इस कार्य के लिये जन्मी हैं लेकिन पूरी पृथ्वी में वे यहाँ-वहाँ बिखरी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। मन द्वारा संचालित वर्तमान अधोगामी मानव सृष्टि उन्हें न तो पहचान देती न चैन से जीने दे रही है। इन बिखरी आत्माओं के द्वारा अहंविहीन समुदाय की रचना कैसे की जाय; यह एक ज्वलन्त प्रश्न है। इस सम्बन्ध में श्रीअरविन्द ने Live Divine में बहुत पहले यह संकेत दिया था-

 

'आन्तरिक परिवर्तन एक समुदाय का रूप तभी धारण करना शुरु करेगा जब अतिमानवी व्यक्ति ऐसे ही दूसरे अतिमानवी व्यक्तियों की खोज कर लेंगे जिनके आन्तरिक जीवन समान हों और जिनके साथ एक छोटा सा समुदाय बनाना संभव हो। यह समुदाय अपने आप में स्वावलम्बी होगा अथवा एक अलग प्रकार की वसाहट या जाति होगी जिनके आन्तरिक जीवन का अपना ही विधान होगा।

 

अभी अतिमानव की कल्पना तो शायद कल्पना ही है पर जिन्हें दिव्यानन्द की अनुभूति हो रही है उनके बीच सम्वाद की एक कड़ी को कायम करना वर्तमान की सबसे बड़ी मांग है जिसे पूरा करने की दिशा में 'दिव्यान्तर प्रयासरत है। फीहाल हमने इस समुदाय को 'मां मन्दिर परिवार नाम देने का सुझाव दिया है। अन्य नामों के प्रस्ताव आमंत्रित हैं। 
सम्वाद निर्माण की पहली कड़ी के रूप में मां मन्दिर उन आत्माओं से नाम आमंत्रित करता है जिन्हें दिव्यशक्ति का Descent हो रहा है।

 

यह तो स्पष्ट ही है कि विज्ञानमय जीवन की संरचना के लिये न तो परम्परागत आश्रम व्यवस्थायें अनुकूल हैं न स्वार्थों पर आधारित वर्तमान सामाजिक, धार्मिक व नैतिक संगठनों के संघर्षरत स्वरूप ही। इन संगठनों व आश्रम व्यवस्थाओं के सम्बन्ध में श्रीअरविन्द कहते हैं कि ये सभी भौतिक जीवन की यथार्थता के द्वारा समान हितों, समान सभ्यता, समान संस्कृति, समान रहन-सहन, सामाजिक नियम व रीतिरिवाज, सामूहिक, मानसिक, आर्थिक सम्बन्धों, समान आदर्शों और सामूहिक अहं के बन्धनों में बँधे होते हैं। लोक एक साथ इसलिये रहते हैं क्योंकि उनकी आवश्यकतायें इसके लिये बाध्य करती हैं।

 

ऐसा सामूहिक संगठन विज्ञानमय (अतिमानवीय) सामुदायिक जीवन नहीं हो सकता। मां मन्दिर जिस आत्मीय परिवार के संरचना की अभीप्सा करता है उसका आधार एकरूपता के बजाय एकता में अनेकता की कल्पना है। ओरोनील को मां से दुनिया के सामने एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है जो अभी अपनी शैशवावस्था में है। मातृमन्दिर के चारों ओर यह अपने अन्तर्राष्ट्रीय आयाम के क्षितिज के भीतर संसार की विविध संस्कृतियों, जीवन पध्दतियों, भाषाओं, कलाकृतियों, शिल्पों, राष्ट्रीयताओं, आस्थाओं व रूप रंगों को अपने अद्वितीय संगम में समेट रहा है। यही मनुष्य को मनुष्य के साथ आत्मिक बाहु-पाशों में आलिंगित करेगा। यह प्रारंभ क्या हम सभी को यह प्रेरणा नहीं देता कि अन्तर्राष्ट्रीय न सही, राष्ट्रीय या कम से कम क्षेत्रीय स्तर पर ही कुछ ऐसे परिवारों का निर्माण प्रारंभ करें जिनमें श्रीअरविन्द और श्रीमां की साधनाओं और महाबलिदानों द्वारा प्राप्त प्रेमानन्द की कुछ बूँदों का हम पारस्परिक आदान प्रदान कर सकें।

 

All life a song of many meeting lives
This knowledge was made a cosmic seed
This seed was cased in the safety of the light
And from the throbbing of that single Heart
A new and marvellous creation rose.

– Savitri.

 

आज एक ऐसे मातृपरिवार के निर्माण की आवश्यकता अपरिहार्य हो गई है जहां आंकड़ों के वाजीगरी का दंभ और तस्वीर खिंचाऊ ललक अनुपस्थित हो और प्रशासन करने के अहं की दुर्गन्ध न आती हो।

- केदारनाथ 
०१-०८-२०११