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पुष्पांजलि

 

डा0 के0 एन0 वर्मा

 

आत्मा प्रत्याशी है
स्वर्ग के अभियान का
शाश्वत की भूमि में
मनस तो ज्वाला है;
तुम्हारी कर्मशाला
पद चिन्ह है विधाता का
तुम्हारा हर क्षण तो
भगवत्ता का प्याला है

तुम्हारी स्पृहा ने
प्रकाश को छेड़ा है।
अनित्य को तुमने तो
नित्य से जोड़ा है।

प्राण के स्पन्दन दो
प्रणम्य अरविन्द।
वसुधा के वन्दन लो
श्रीअरविन्द।।

 

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शरीर तो शरीर
कभी व्यक्ति नहीं होता
स्वरूप तो छलावा
अस्तित्व नहीं होता
आश्चर्यों का अग्निल
यह अंश विद्यमान यहाँ
सौन्दर्य का शिल्पी
यह ज्ञान नहीं होता।

तभी क्षीण नौका
भवसागर में आयी है
तभी यह अमरता आ
धूल में समायी है।

वसुधा पतवार दो
नाविक अरविन्द
वसुधा के वन्दन लो
श्रीअरविन्द।।

 

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अनन्त के स्वरूपों के
शिल्पी अपरिचित हो
अपने रहस्यों के
स्वयं दीक्षार्थी हो
जीवन से जीवन में
मानक से मानक में
शाश्वत को छूने के
गहन पथ पंथी हो।

तभी अन्तरिक्ष
नन्हे बीज में आया है
अहं के कोलाहल में
मौन उतर आया है

मौन के प्रवक्ता
देवर्षि अरविन्द
वसुधा के वन्दन लो
श्रीअरविन्द।।

 

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जगन्माता का मुखड़ा
धरती के कीर्तन में
विम्बित अनुगुंजित
इसी मानवी वदन में।
तुम्हारी यह सत्ता
तादात्म्य की अवस्था है
चेतन का संगम बनो
सत्ता एकत्व में।

तभी तो ममता को
छाती मिल पायी है
सत्य के अवतरण को
सीढ़ी मिल पाई है।

सत् चेतन अवतार हो
कालिकी अरविन्द
वसुधा के वन्दन लो
श्रीअरविन्द।।

 

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