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सावित्री की अमृत-सरितायें

....गतांक से आगे

14. सन्दर्भ - पर्व 2 सर्ग 11     

अश्वपति परम सत्य की खोजी यात्रा में महत्तर मन के देवों के जगत में प्रवेश करता है। यहाँ के मानसिक विचार इस आध्यात्मिक लोक में देवों के रूप में व्यक्त होते हैं। ये देवता ऊपर के उस परम सत्य को जो नीचे आकर धरती में अपनी सृष्टि करना चाहता है, ये विचार-देवता मानसिक रूप देकर मानसिक निर्वाण में बदल देते हैं जिससे वह एक नीरव सत्तात्मक (Static) रूप ग्रहण कर लेता है और उसके भीतर की गतिमानता जो सृष्टि सर्जन के लिये आवश्यक है, समाप्त हो गई दिखती है। यही है दैवी विचार के देवताओं का खेल जो काल के परे के प्रकाश को काल के भीतर उतार कर उसके असली रूप को बिगाड़ कर उसे सीमित कर देते हैं। वे चाहते हैं कि चितशक्ति से निसृत यह सर्जनकारी शक्ति (महारानी) अपने कृत्रिम व सीमित रूप में मन की आधीनता में होकर बुध्दिवादियों की दासी बन जाय और उसका एक भाग निर्वाण की नीरवता में पंगु हो जाय। इस प्रकार फिर एक बार परमात्मा की सृष्टि योजना में अवरोध उत्पन्न हो जाता है जिसे देखकर भगवती माता ऊपर से मुस्कुराती है और उसे तोडऩे के लिये नीचे को झुकते हुये भारी शक्तिपात करती है-

Truth smiled upon the gracious golden game

Out of her hushed eternal spaces leaned

The great and boundless Goddess feigned to yield

The sunlit sweetness of her secrecies,

Incarnating her beauty in his clasp

She gave for a brief kiss her immortal lips

And drew to her bosom one glorified mortal head

She made earth her home for whom heaven was too small

In a human breast her occult presence lived,

He carved from his own self his figure of her,

She shaped her body to a mind's embrace.

Into thought's narrow limits she has come

Her greatness she has suffered to be pressed

Into the little cabin of the Idea.

The closed room of a lonely thinker's grasp

She has lowered her heights to the stature of our souls

And dazzled our lids with her celestial gaze.

अपनी कृपा के नीचे चलते उस सुनहले खेल को देखकर वास्तविक सत्य - चित शक्ति के ऊपर के अपने सत्य लोक से मुस्कुराती है और अपने शाश्वत महामौन के लोक से यह महान अनन्त की देवी अपनी गुप्त रहस्यमयता की ज्योतिर्मय मधुरता को प्रदान करने के लिये मानों नीचे को झुकती है।

यह परमाशक्ति अपने सौन्दर्य को पृथ्वी में अवतरित करते हुये मानों मनुष्य के आलिंगन में आकर थोड़ी देर के लिये उसे अपने अमर ओंठों का चुम्बन देती है और साधना द्वारा गौरवान्वित मानवी मस्तक को अपनी छाती से लगा लेती है। वह परमाशक्ति, जिसके आवास के लिये, स्वर्ग बहुत छोटा पड़ता है, पृथ्वी को अवतरण द्वारा अपना आवास बना लेती है। तब एक मानवीय छाती में परमाशक्ति की उपस्थिति का बोध होने लगता है और मनुष्य अपनी ही अभीप्सा के अनुसार इस उपस्थिति को आकार दे देता है और वह भी अपना रूप उसकी मनोकामना के अनुसार ऐसा बना लेती है जिसके पे्रम में वह डूबकर उसके साथ एक हो सके। विचारों के संकीर्ण ढाँचे के भीतर भगवती शक्ति प्रवेश कर जाती है और कष्ट सहते हुये भी अपनी महानता को ठूस ठूस कर उस छोटे से ढांचे में आने के लायक बना लेती है जो सृष्टि की दैवी योजना का नदना सा भाग होता है। यह ढांचा एकाकी बिचारक की ग्रहणशीलता वाला छोटा सा कक्ष होता है। परम भागवत शक्ति अपने आपको देने के लिये अपनी अनन्त उँचाई को हमारी मानवी आत्माओं के छोटे आकारों के अनुसार छोटा कर लेती है और हमारे मन के ऊपर लगे अवरोधी ढक्कनों को खोल देने के लिये उन्हें अपनी स्वर्गीय दृष्टि की जगमगाहट से चकाचौंध कर देती है।

Commentary : यहाँ योगी ने महत्तर मन की चेतना में होने वाले दिव्यावतरण का वर्णन किया है। यह एक अलौकिक अनुभूति है। जब भागवत शक्ति का मन के क्षेत्र में अवतरण होता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं सच्चिदानन्द धरती पर उतर आया है। यह अनुभूति तब होती है जब सहस्रार पर धरा अभीप्सा का दीपक जल उठता है। भगवान का यह हमला उसकी भुजाओं में आने और आलिंगन का भोग करने जैसा होता है।

साधक भगवान के जिस रूप के दर्शन की अभीप्सा करता है उसके लिये वह वही रूप धारण कर लेता है, वह उसी भाषा में बोलता है जिसे वह समझता है और जिस भाषा में वह उसे सुनना चाहता है। भगवान्ď तो अनन्त है, उसका रूप भी अनन्त है, वह अरूप भी है लेकिन अपने भक्त के लिये वह उसकी पहुँच के अनुसार अपने को छोटा कर लेता है और उसका मनचाहा स्वरूप भी धारण कर लेता है। उसके मन के ऊपर जो अवरोधी ढक्कन लगा हुआ है उसे यह दिव्य अवतरण ही खोल पाता है।

........क्रमश:

 

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