Ma Mandir Sri Aurobindogram

Ma mandir Sri Aurobindo Ashram Rewa

 

....गतांक से आगे

 

दिल्ली के राष्ट्रवादियों की प्रमुख धारा में

युवा स्वयं-सेवक के रूप में सक्रियता

 

शर्मा: अच्छा, आप दिल्ली किस वर्ष में आए?

जौहर: सन् 1921 में मैं दिल्ली आया। और तब से मैं यहीं हूँ।

शर्मा: सन् 1921-22 में दिल्ली में जो राजनीतिक वातावरण था क्या आपको उसकी याद है?

जौहर: मेरे विचार में सन् 1921 में सबसे पहला आन्दोलन स्वयं-सेवक आन्दोलन था। मेरी उम्र उस समय मात्रा 17 या 18 वर्ष की थी। उस आन्दोलन में मैं एक डाकिए की तरह काम करता था जो एक स्थान से दूसरे स्थान को संदेश पहुँचाता है। इसके अलावा संगठन में जहाँ जैसी जरूरत पड़े, काम करता था। यह स्वयं-सेवक आन्दोलन प्रारंभ में मेरे जैसे 13 या 14 युवकों का समूह था। उन्हीं में से एक उन सबका नेता होता था। पहले नेता श्री आसफ अली थे। इन स्वयं-सेवकों की एक निश्चित पोशाक होती थी, जो खाकी रंग की होती थी। इसी से वे पहचाने जाते थे। स्वयं-सेवकों ने चाँदनी चौक में ‘मार्च’ (जुलूस) किया पर मुझे उस समय कोई नहीं जानता था।

निश्चय ही, मैं इतना छोटा था कि मुझे स्वयं सेवकों के जुलूस में चलने से ज्यादा रुचिकर कुछ नहीं लगता था, मैं प्रारंभ से अंत तक जुलूस में मौजूद रहता था। फिर सप्ताह, दस दिन या एक पखवारा में, जब भी सम्भव होता था आन्दोलन के लिए स्वयं-सेवकों का ‘मार्च’ होता था। इसके एक संचालक डॉ. सुखदेव थे। इनके अतिरिक्त कई और भी संचालक थे पर मैं किसी को नहीं जानता था क्योंकि मुझे इसमें आये हुए अभी पहला ही वर्ष था। लेकिन मैं सभी की सेवा करता था। कपड़ा खरीदने, दर्जी को देने, तैयार पोशाकों को स्वयं-सेवकों तक पहुँचाने आदि के कार्य में भी सहयोग करता था। मुझे याद है एक मुहम्मद किदरिस नाम का दर्जी था जो किसी तंग गली में ये पोशाकें सिलता था। इसलिए मैं उसके पास कपड़ा पहुँचाता था फिर तैयार पोशाकें कांग्रेस के कार्यालय में डॉ. सुखदेव के पास पहुँचाता था।

जहाँ तक मुझे याद है हमसे अगले बैच (जत्थे) के नेता सरदार नानक सिंह थे। इसी तरह और कई समूह निकले। फिर हर एक जत्थे के लिए एक अलग नेता ढूँढना मुश्किल होता गया।

उन दिनों मेरे पास बिल्कुल पैसा नहीं होता था। नई सड़क पर ‘टाइपिंग’ और ‘शार्टहैंड’ की एक संस्था थी जिसके मालिक गनपत राम थे। बल्कि गनपत राम और राधा रमन भागीदार थे। उनके दो व्यवसाय थेµएक वे सारे देश में घड़ी के पार्ट्स की थोक बिक्री करते थे। दूसरे टाइपिंग और शार्ट हैंड की संस्था चलाते थे।

इसलिए मैं उन लोगों के पास गया और उनसे कहा ‘‘मैं ‘टाइपराइटिंग’ (टंकण) सीखना चाहता हूँ’’ उन्होंने 2 रुपया प्रति माह शुल्क माँगा जो मैं नहीं दे सकता था। मैंने गनपत राम जी से कहा ‘‘आप जो सेवा चाहें मैं कर सकता हूँ, पर पैसे नहीं दे सकता’’ वह मान गए। और मैं उनके घर के ही नीचे गली में एक छोटे से बरामदे में रहने लगा और उनके सेवक का कार्य करने लगा। मैं उनके घर के लिए बाजार से सब्जी लाता था, दूसरा सामान लाता था और उनके 6-8 माह के बच्चे को सँभालता था। मुझे मुफ्त टंकण सिखाने के एवज में उनकी पत्नी मुझसे बहुत काम कराती थीं। उनकी पत्नी ईसाई थीं। एक दिन जब मैं टंकण का अभ्यास कर रहा था उनके भागीदार राधा रमन वहाँ से गुजरे। उन्होंने विदेशी कपड़ा मलमल के वस्त्रा पहन रखे थे। उनका वस्त्रा मेरी मेज में अटक गया और फट गया। मेरे मुँह से एक दम निकल गया ‘‘अगर आप खादी के वस्त्रा पहने होते तो वे नहीं फटते’’ उन्होंने मुझे चाँटा मारा क्योंकि मेरी बात शायद उन्हें गाली सी लगी। डॉ. सुखदेव का इन लोगों के साथ बहुत मित्रावत् व्यवहार था। स्वयं-सेवकों के अगले जत्थे के लिए नेता नहीं मिल रहा था शायद मेरे मन में गुस्सा या बदले की भावना थी और मैंने डॉ. सुखदेव से कहा ‘‘आप राधा रमन से नेता बनने के लिए क्यों नहीं कहते?’’ डॉ. सुखदेव ने राधारमन से पूछा तो वह नेता बनने को तैयार हो गए। अगले दिन स्वयं-सेवकों का मार्च था इसलिए पूरी रात पोशाकें तैयार कराने में बीत गई। राधा रमन उस समय दरियागंज के किसी थियेटर में बैठे शो देख रहे थे।

इसलिए हम वहाँ गए, उन्हें बाहर बुलाया और उनका नाप लेकर सुबह तक उनकी पोशाक तैयार कराई। उन्हें स्वयं-सेवकों के दल का नेता बनाकर भेजा गया। इस दल में जो भी लोग थे सभी को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई और उन्हें ‘मियांवाली जेल’ भेजा गया।

शर्मा: क्या आप हमें बताएँगे कि स्वयं-सेवकों की वर्दी क्या थी?

जौहर: जी हाँ, खाकी कमीज, खाकी पतलून और खाकी गाँधी टोपी, यही वर्दी थी।

शर्मा: नीकर नहीं?

जौहर: नहीं, नीकर नहीं।

शर्मा: और जूते?

जौहर: हाँ, जूते तो होते ही थे।

शर्मा: कपड़ों के लिए पैसे कौन देता था?

जौहर: यह मुझे नहीं मालूम। यह सब कार्य गुप्त रूप से होता था। मैं तो एक स्थान से दूसरे स्थान संदेश, पत्रा और कपडे़ लेकर जाता था, यह काफी मुश्किल काम था। किसी और के लिए यह करना आसान नहीं होता पर मैं तो दिन रात लगा रहता था क्योंकि जैसा मैंने पहले भी आपसे कहा कि मेरे अन्दर कुछ कर दिखाने की एक आग थी।

शर्मा: क्या स्वयं-सेवकों के संगठन को गुप्त रखा जाता था?

जौहर: जी हाँ, पूरी तरह से गुप्त रूप से कार्य होता था। अंग्रेज सरकार और पुलिस को ज्ञात नहीं होता था कि दूसरे दिन कौन स्वयं-सेवक होगा, कौन उनका नेता होगा और कौन संचालक होगा। यह सब गुप्त रखा जाता था। सब कार्य गुप्त रूप से होते थे। वरना, सरकार और पुलिस न तो वर्दियाँ तैयार होने देती और न ही जुलूस निकालने देती। मुझे आन्दोलन की गोपनीयता की बारीकियाँ मालूम नहीं थीं। मेरा सम्पर्क तो मात्रा डॉ. सुखदेव से रहता था और उन्हीं के निर्देशानुसार मैं काम भी करता था।

शर्मा: सरदार नानक सिंह और डॉ. सुख देव की राष्ट्रीय आन्दोलन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही पर बहुत कम लोग उनके विषय में जानते हैं। उनके बारे में क्या आप और अधिक जानकारी दे सकते हैं?

     जौहर: डॉ. सुखदेव गुरुकुल कांगड़ी से पढ़े हुए कट्टर आर्य समाजी होने के साथ-साथ कट्टर राष्ट्रवादी भी थे। उन्होंने जीवनभर कांग्रेस के लिए काम किया। वह स्वामी श्रद्धानन्द के दामाद थे। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया था। वे विधुर थे, डॉक्टर थे। उन्होंने बरबाला गाँव में एक अस्पताल बनवाया था जिसमें वह गरीबों का मुफ्त इलाज भी करते थे और मुफ्त दवाइयाँ भी देते थे। कांग्रेस में वह किसी पद या प्रतिष्ठा के लिए नहीं वरन् पूर्ण त्याग की भावना से काम करते थे। कांग्रेस में उनका बहुत सम्मान था। सरदार नानक सिंह एक व्यवसायी थे। वे विदेशी रबर के कालीन तथा रबर का अन्य सामान बेचने वाली कम्पनी ‘ई. ओस्बोर्न एण्ड कम्पनी’ के मालिक थे। वे हर प्रकार से बहुत सज्जन और ईमानदार व्यक्ति थे। उनका कार्यालय हौज काजी में था। आन्दोलन के सम्बन्ध में मुझे कई बार उनके कार्यालय जाना पड़ता था। उनके जेल जाने से उनका 50,000/-रुपये का व्यापार जो उन्होंने पिछले तीन चार वर्षों में अथक परिश्रम से अपने दम पर किया था, नष्ट हो गया। जब वे गिरफ्तार हो रहे थे तो उन्होंने अपने पिता सरदार वाधवा सिंह µ जो कि पी.डब्ल्यू. डी. के विभाग में लेखाकार थे, से अपनी अनुपस्थिति में व्यवसाय की देखभाल करने को कहा। लेकिन साथ ही सरदार नानक सिंह ने मुझसे कहा ‘‘मेरे पिता का चरित्रा ठीक नहीं है, वे बहुत बेईमान हैं। मेरी अनुपस्थिति में व्यवसाय नष्ट हो जाएगा। लेकिन मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मुझे तो कांग्रेस के आंदोलन में भाग लेना ही है।’’ यह बात सच थी। उन्हें एक वर्ष का कठोर कारावास हुआ और मियाँवाली जेल भेज दिया गया। जब वे वापिस लौटे तो उनके व्यवसाय में कुछ भी नहीं बचा था। उन्होंने फिर से लाला दीवान चन्द, सेठ रघुमल और केशव देव शास्त्री के साथ व्यवसाय शुरू किया। सरदार नानक सिंह जी की खातिर इन तीनों ने साथ मिलकर एक फर्म, ‘दिल्ली आइरन सिण्डीकेट’ नाम से शुरू की और उन्हें, बिना पूँजी लगाए क्रियाशील भागीदार के साथ-साथ कम्पनी का प्रबंध-निदेशक (Managing Director) बनाया।

दिल्ली में मेरे पास आजीविका का कोई साधन नहीं था। खैर इसके पीछे भी एक लम्बी कहानी है। मेरे पिता ने एक बार अलवर से मेरे नाम 10/= रुपये का मनीआर्डर भेजा था जो मैंने वापस कर दिया। जब उन्होंने मेरे कॉलेज छोड़ने पर अत्यंत खेद जताया था तो मैं उनसे कोई पैसा कैसे ले सकता था। पूरे दो वर्ष तक दिल्ली में मेंने एक आना प्रति दिन की आय पर समय काटा। यह एक आना मैं एक घंटे में कमाता था। जब मैं दिल्ली आया था तो मैंने डॉ. युद्धवीर सिंह की पत्नी से 2/- रुपये उधार लिए थे और सदर बाजार से उसकी स्टेशनरी खरीदी। उन दिनों 2/-रुपये में काफी स्टेशनरी आ जाती थी। चर्खे वाला में एक व्यवसायिक हाई स्कूल था। मध्यावकाश के समय मैं स्कूल के बाहर बैठ जाता था और एक घंटे में एक आना के करीब कमा लेता था। इसी कमाई पर मैंने पूरे दो वर्ष का समय बिताया। इस बीच मैंने टंकण भी सीख लिया था।

श्रद्धानंद बाजार, जिसे उन दिनों बर्न बेस्टन रोड कहा जाता था - में नौकरी दिलाने वाली एक संस्था थी। मैं वहाँ गया और उनसे पूछा कि क्या मुझे कोई काम मिल सकता है। उन्होंने कहा ‘‘आप 2/-रुपये जमा करके अपना नाम हमारे यहाँ रजिस्टर करा दीजिए। उसके बाद पहले माह के वेतन में से भी आधा वेतन हमें देना होगा’’ मैंने कहा ‘‘मैं आधा वेतन अवश्य दूँगा लेकिन अभी मेरे पास 2/-रुपये नहीं हैं।’’ वहाँ का मैंनेजर सहृदय था। मेरी छोटी उम्र को देखते हुए वह मान गया कि दो रुपये भी वह मेरे वेतन से ही ले लेगा। और मुझे नई सड़क पर ‘शोलापुर मिल’ की एक दूकान में टंकण का काम मिल गया। मैंने ऐजेन्सी को अपना आधा वेतन और 2/-रुपये रजिस्ट्रेशन फीस, दे दिया। मैंने दूकान के मालिक से यह तय कर लिया कि मैं पूरा दिन नहीं वरन मात्रा चार घंटे ही काम करूँगा क्योंकि मुझे कांग्रेस और आर्य कुमार सभा के लिए भी कार्य करना था। वह सहमत हो गया और मुझे 25/-रुपये प्रति माह वेतन दिया। वहाँ मैंने एक वर्ष से ऊपर काम किया। मैं चार घंटे में दूकान का सारा पत्रा-व्यवहार का कार्य पूरा कर देता था। इसके अलावा भी वह कोई काम बताते तो मैं कर देता था। वे मेरे काम से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने दीवाली पर मुझे 10/-रुपये का पुरस्कार दिया, जो उन दिनों निश्चय ही किसी को नहीं दिया जाता था।

इस बीच मेरे पिता आए और आर्य समाज के माध्यम से मुझे खोज निकाला। मैं शोलापुर मिल की दूकान में चार घंटे प्रतिदिन कार्य कर रहा था और गनपत राम के घर में रहकर उनके नौकर का भी काम कर रहा था। खाना स्वयं पकाता था। इससे पहले तो मात्रा एक आना प्रतिदिन की आय पर जीता था। उन दिनों एक आना में गेहूँ का आटा काफी आ जाता था क्योंकि उसका भाव एक रुपये में बीस सेर का था। गली के बरामदे में जहाँ मैं रहता था मेरी चारपाई के साथ ही गनपत राम की गाय भी बाँधी जाती थी और चारपाई के नीचे ही मैंने एक अंगीठी रखी हुई थी। कभी-कभी जब मैं सोया हुआ होता था, बीच रात में गाय मेरे ऊपर ही गोबर कर देती थी।

सुबह उठकर मैं पूरे दिन के खाने के लिए खूब सारी रोटियाँ बना लेता था और पास ही हलवाई की दूकान से स्किम्ड दूध का बना हुआ दही ले आता था। ‘सप्रैटा’ दूध का यह दही 2 पैसे का एक सेर मिलता था, और मैं चूँकि नियमित ग्राहक था इसलिए एक पैसा देकर चार दिन तक मुझे काफी मात्रा में दही मिल जाता था। यह दही इतना स्वादिष्ट होता था कि जरा सा नमक डालकर रोटी के साथ खाने में मुझे बहुत आनन्द आता था। जब मुझे 25/- रुपया मासिक वेतन मिलने लगा तब निश्चय ही मैं अधिक खर्च कर सकता था। लेकिन फिर भी मैं गनपत राम के घर पर ही रहता रहा और अपना खाना स्वयं पकाता रहा।

मेरे पिता आए और मुझे लाला दीवान चन्द के पास ले गए। लाला दीवान चंद हमारे ही जिले के थे और हमारे गाँव के पास ही उनका घर था। वह सेना के कोयला और नमक आपूर्ति के ठेकेदार थे साथ ही आर्य समाज के भी स्तम्भ थे, दिल्ली आर्य समाज में वह बहुत शक्तिशाली माने जाते थे। वह अभी युवा थे, मात्रा 26 वर्ष की आयु थी। जामा मस्जिद के पीछे उनका अपना घर था जिसका नाम ‘दीवान भवन’ था। वहीं उनका कार्यालय भी था। यद्यपि वह मेरे पिता को नहीं जानते थे फिर भी वह मुझे उनके पास ले गए।

मेरे पिता ने उनसे कहा ‘‘लाला जी, हम भी झेलम जिले से हैं। यह मेरा बेटा है, आवारा है, यहाँ यह खाली हाथ आ गया और अब घर वापस नहीं जाना चाहता। यह टंकण जानता है। इसे अगर आपकी संस्था में काम मिल जाए तो मुझे कुछ संतुष्टि रहेगी कि कम से कम वह सुरक्षित स्थान पर है।’’ लाला दीवान चन्द मुझे अपने यहाँ टंकण लिपिक के पद पर 50/-रुपये प्रतिमाह वेतन पर रखने को तैयार हो गए। वह बहुत सहृदय थे। उन दिनों टाइपिस्ट का वेतन इतना नहीं होता था पर मेरे पिता की आँसुओं से भरी आँखों और विनती से द्रवित होकर वह मान गए।

मैं दीवान भवन में आ गया। दिन के समय मैं अपना बिस्तर समेट कर कार्यालय की मेज के नीचे रख देता था और रात को मेज के ऊपर बिस्तर फैलाकर सो जाता था। दिन के समय मैं टाइपिस्ट का कार्य करता था और सुबह और शाम कांग्रेस व आर्य कुमार सभा का काम करता था। अब मैं नई सड़क और चावड़ी बाजार के चौराहे पर एक ढाबे में खाना खाने लगा था। ढाबे का नाम एक पेड़ के नाम पर था ‘बड़ शाह बुल्लाह’। ढाबे का मालिक सरदार केसर सिंह था। कभी-कभी लाला दीवान चन्द की पत्नी मुझे बचा-खुचा खाना या और भी कुछ खाने को दे देती थीं।

एक रात में 1000 प्रतियाँ टाइप कीं

लगभग एक वर्ष पश्चात्, संयोग से सरदार नानक सिंह भी हमारे कार्यालय में आ गए और उन्हें एक 6’×6’ का कमरा दे दिया गया। उनके लेटरहेड पर बहुत सुंदर ढंग से ‘दिल्ली आइरन सिण्डीकेट’ छपा हुआ था। उन्होंने एक दिन मुझे बुलाया और पूछा ‘‘क्या तुम मेरे लिए 5 से 10 परिपत्रा प्रति दिन टाइप कर सकते हो जो मुझे सभी ठेकेदारों को भेजने हैं?’’ मैंने उनसे पूछा ‘‘आपको कुल कितने परिपत्रा चाहिए?’’ उन्होंने कहा ‘‘तुम यह क्यों पूछ रहे हो? मुझे 500 या हो सकता है 1000 की भी जरूरत हो लेकिन यह आवश्यक नहीं है। जब भी तुम्हें फुर्सत हो तुम टाइप कर लेना।’’

मैं दिल्ली आइरन सिण्डीकेट का कर्मचारी तो नहीं था। शायद इसीलिए वह मुझसे इस प्रकार निवेदन कर रहे थे। इसलिए मैंने कहा ‘‘ठीक है।’’

लाला दीवान चन्द प्रतिदिन प्रातः चार बजे घुड़सवारी के लिए जाते थे। अगली सुबह जब वह आए तो उन्होंने देखा कि बत्ती जली हुई है और टाइपिंग की आवाज आ रही है। उन्हें आश्चर्य हुआ ‘कौन टाइप कर रहा है।’ लेकिन उन दिनों मैं आर्य कुमार सभा का सचिव था इसलिए उन्होंने दरवाजा खोलकर अन्दर आने की हिम्मत नहीं की और चुपचाप चले गए।

जब अगले दिन प्रातः 10 बजे सरदार नानक सिंह आए तो उन्हें मेज पर 1000 प्रतियाँ रखी हुई मिलीं। उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने मुझे बुलाया और गुस्से से पूछा, ‘‘तुमने ये कहाँ से टाइप कराईं?’’ मैंने कहा ‘‘ये मैंने ही टाइप की हैं।’’ वह बोले, ‘‘यह कैसे सम्भव है? इस दुनिया में कोई भी एक रात में 1000 प्रतियाँ टाइप नहीं कर सकता। कल शाम ही तो यह काम तुम्हें दिया था।’’ उन्होंने सब उठाकर ध्यान से देखा और पाया कि सब एक ही मशीन पर टाइप हुए हैं। उन्होंने फिर मुझसे कहा ‘‘तुम मुझे सच सच बताओ।’’ मैंने कहा, ‘‘मैं आपको और क्या सच बताऊँ? पूरी रात मैं टाइप करता रहाµसब मैंने ही की हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘यह आश्चर्य जनक है।’’ उन्होंने वे 1000 प्रतियाँ उठाईं और लाला दीवानचन्द के पास गए और उन्हें सब कुछ बताया। उन्होंने भी कहा, ‘हाँ मैं सुबह 4 बजे जब घुड़सवारी के लिए निकला तब तक भी वह टाइप कर रहा था, यह बिल्कुल सच है।’’ इससे सारे कार्यालय में हलचल सी मच गई और सभी लोग मेरे परिश्रमी होने के कारण मेरा बहुत आदर करने लगे। लेकिन यह तो मेरी जीवनचर्या थी। मेरे सामने जो भी कार्य होता है मैं पूरी लगन और निष्ठा से करता हूँ। पूरे शहर में कहीं भी अगर आग लग जाए तो मैं सबसे पहले उसमें कूदूँगा और आग बुझाने की कोशिश करूँगा। मेरी हमेशा यही भावना रहती थी। मैं नहीं जानता कि ऐसा क्यों था पर ऐसा था।

                                      ........क्रमश:

 

....continued from previous issue

In Nationalist Mainstream in Delhi

Active as a young Volunteer

 

Sharma: Well, in which year did you come to Delhi?

Jauhar: I came to Delhi in 1921. Since then I am here.

Sharma: Do you recall the political atmosphere in Delhi in 1921-1922?

Jauhar: I think the first movement that was started in 1921 was the volunteer movement. I was too young, 17 or 18.  I was “The Courier” for that movement, taking messages from one place to another, and organising wherever some organisational work was required, and all that was going on. The volunteer movement started with the first batch of a few persons like me, 13 or 14. And one man had to be the leader of that movement. The first leader was Asaf Ali. And all those people had to be in dresses, uniforms. And they were in khaki dress—as volunteers in the movement. They marched through Chandni Chowk. And no one knew me. 

Of course, as I was so young, nothing was more interesting to me than going with the procession of the volunteers throughout, from wherever it would start and wherever it would end. Then every week or ten days or fifteen days they would, whenever they were able to, organise a ‘March’ for the movement. One of the organisers was Dr Sukhdev. There were some other organisers whom I did not know because that was only my first year here and I was so young. But I helped them in every manner—in buying cloth, taking the cloth to the tailor, getting the dresses made, delivering them to a certain place to make them available to the volunteers. I remember there was one tailor by the name of Mahammed Qidris, who used to stitch in a narrow lane somewhere. So I had to deliver the cloth to him, get the dresses made, and deliver them at the Congress office to Dr Sukh Dev. 

The leader of the next batch was, as far as I remember, Sardar Nanak Singh. Like that a few batches went off.  Then it became so difficult to find a leader for the batch who would lead the movement.

In those days I had no money, absolutely. There was a Typewriting and Shorthand Institute at Nai Sarak and its owner was Ganpat Ram. Ganpat Ram and Radha Raman (not the one who was recently a Member of Parliament) were partners. They were having two types of business. One was that they used to sell watch-parts, in wholesale, throughout the country and the other was the Typewriting and Shorthand Institute.

So I went to those people and told them: “I want to learn typewriting.” They asked for a fee of two rupees per month, which I could not pay. I asked Ganpat Ram: “If I could be of any service?...I can give you some service if you like but I cannot pay the money.”  So he agreed. And I stayed in a lane in a small verandah below his house and I was working as a servant to him. A servant to him—to bring  vegetables and other things from the market and also to carry his six-month or one-year-old child. His wife used to take a lot of work against giving me ‘free teaching of typewriting’. He was married to a Christian. One day when I was sitting and practising typewriting, his partner, Radha Raman passed by. He was wearing foreign cloth called mulmul. It struck against my table and was torn.  And I told him spontaneously, “If you were wearing Khadi it wouldn’t have been torn.” He slapped me and maybe there fell some sort of curse on him. Dr Sukh Dev was very friendly with these people. When they were not getting any leader for the next batch of the volunteer procession, maybe out of some vengeance in my heart or anger, I asked Dr Sukh Dev, “Why not ask Radha Raman to become the leader?” When Dr Sukh Dev asked him, Radha Raman agreed to become the leader. The next day the volunteer batch had to go and the whole night we had to work to get the uniforms ready. Radha Raman was at that time sitting in a theatrical company in Darya Ganj watching some show.

So we went there, called him out, got his measurements, and the uniform was got ready by the next morning. He was made the leader of a batch of volunteers and was sent off.  All these people—those who were in that batch—were sentenced to one-year rigorous imprisonment and sent to Mianwali Jail.

Sharma: Mr Jauhar, could you tell us what was the uniform of the volunteers?

Jauhar: It was a khaki shirt, a pair of khaki pants and a khaki Gandhi cap.

Sharma: Not shorts?

Jauhar: No, not shorts.

Sharma: And shoes?

Jauhar: Shoes, of course.

Sharma: Who paid for the cloth?

Jauhar: Well, that I do not know. It was all underground work. I used to go from place to place carrying messages, letters, cloth, etc. which, of course, was quite a task.  It was not very easy for the others to do that. But I always did it day and night because, as I have said, there was a ‘Fire’ in me.

Sharma: Was there some secrecy about the volunteer organisation?

Jauhar: Yes, there was absolute secrecy about it. The British Government and the police did not know, who will come the next day, who will be the volunteer, who will be the leader, who will be conducting the volunteer movement at that time? It was all a secret. Everything was done secretly. Otherwise the British Government and the police would never allow the dresses to be made and the volunteers to carry on the March. I do not know the details of that secrecy. I don’t know much. I was only in touch with Dr Sukh Dev, with whom I did all these works.

Sharma: Sardar Nanak Singh and Dr Sukh Dev played a very important part in the movement but very little is known about them. Could you give us some details about them?

Jauhar: Dr Sukh Dev was a staunch Arya Samaji from Gurukul Kangri and he was a staunch nationalist also. All his life he worked for the Congress. He was the son-in-law of Swami Shraddhanand by out-of-caste marriage.  He was a widower doctor, practising in village Barwala where he had built a hospital, treating the poor free of charge, giving free medicines.  He was in the Congress not for any position or anything like that but with the spirit of complete sacrifice. He was regarded very highly in Congress circles.Sardar Nanak Singh was a businessman. He ran a firm called E. Osborne & Company, dealing in foreign rubber carpets and some rubber materials like that. He was a very sincere and honest person in every respect. His office was at Hauz Kazi. On account of the movement I used to go to his office. After his arrest, he completely lost his business worth about Rs.50,000/- which he had built on his own in three or four years. When he was going to be arrested he asked his father Sardar Wadhwa Singh, an accountant in the P.W.D., to look after his business in his absence. But at the same time Sardar Nanak Singh told me: “My father has a very bad character—a most dishonest person. Surely my business will be ruined in my absence. But I don’t care for that. I must be in the Congress movement.” This came absolutely true. He was sentenced to one-year R.I. and sent to Mianwali Jail. When he returned, there was absolutely nothing left of his business. Then he had to start again with Lala Diwan Chand, Seth Raghumal and Dr Keshav Dev Shastri. Only for the sake of Sardar Nanak Singh, these three joined and started a firm, Delhi Iron Syndicate, and he was made the Managing Director as a working partner without investing any money. 

I had no means of livelihood in Delhi. Well, there is a long story behind it. My father once sent me Rs. 10/- by money order from Alwar but I refused to take it. After he had told me that he was so sorry about my leaving college, how could I accept any money from him? At least for two years, I was living in Delhi only on one anna a day, which I used to earn in an hour! I had borrowed two rupees from Dr Yudhvir Singh’s wife when I came to Delhi and purchased some stationery from Sadar Bazar. Quite a lot of stationery could be purchased for just Rs. 2/-, in those days. There was a Commercial High School in Charkhewalan. During the recess, I used to sit outside the school and earn one anna or so a day and was living on that for about two years! By that time I learnt typewriting also.

There was a Service Securing Agency in Shraddhanand Bazar—in those days it was called Burn Bastion Road. I went there and enquired from them if they could secure an appointment for me. They said: “You have to register your name, pay Rs.2/-, and then you will have to pay half of your first month’s salary.” I said: “I will pay half month’s salary, but I cannot pay Rs.2/- now.” As I was young, the manager was very sympathetic and agreed that he would take Rs.2/- also after the appointment was secured. Then I got a job as a typist in Sholapur Mill shop at Nai Sarak. Along with the half of my first month’s salary I paid the registration fee of Rs.2/- to the agency. But I had made an arrangement with the owner of the shop that I would only work for four hours a day because I had to work for the Congress and the Arya Kumar Sabha and won’t be able to work for the whole day. He agreed to it and paid me Rs.25/- per month. I was working there for over a year or so. I used to finish all their correspondence work within those four hours. Even I would do whatever else they liked me to do. They appreciated my work so much that on Diwali day, they gave me a prize of Rs. 10/- which, of course, in those days was not given to anyone.

In the meantime, my father came and searched me out through the Arya Samaj. I was still working in the Sholapur Mill shop, four hours a day. I resided at Ganpat Ram’s house and was doing a servant’s duty. I used to cook myself. Earlier I had lived on one anna which I used to earn daily. One could get quite a lot of wheat flour for one anna—it was about 20 seers for Rs.1/- in those days. In the verandah, at the narrow lane, Ganpat Ram had a cow and along with it I had my cot! And below the cot I had kept an angithi. Sometimes when I would be sleeping, in the middle of the night I would find that the cow had defecated over me!

What I used to do in the morning was that I would prepare quite a number of chapattis for the whole day and get curd of skimmed milk from a nearby halwai shop. The curd was out of the separated milk, only 2 pice a seer, and being a regular customer I used to pay one pice and could get quite a good quantity for four days. This curd was so delicious—adding just a little salt to it, I used to enjoy that food very much. When I got Rs. 25/- as salary, then, of course, I could afford much.  But still I kept preparing my food myself and living at Ganpat Ram’s house only.

My father came and took me to Lala Diwan Chand, who belonged to our district, to a place quite near  our village. He was a military contractor for ‘coal and salt’ and was also a pillar of Arya Samaj, a very powerful Arya Samaji in Delhi.  He was quite young, about twenty-six years old. He had his own house called ‘Diwan Bhawan’ behind the Jama Masjid. There he had his office. My father took me to him although he did not know my father.

My father told him: “Lalaji, we are also from Jhelum district. This is my son, a vagabond, here he has come without anything and he does not want to go back. He knows typewriting; and if he can be given any employment in your organisation then I will have some sort of satisfaction that at least he is in a safe place.”  Lala Diwan Chand agreed to give me the post of a typist on Rs.50/- per month. He was very considerate. In those days a typist was not given much salary but he did that as my father, with tears in his eyes, had persuaded him and appealed to him so much.

Then I shifted to Diwan Bhawan. During daytime I used to put my bedding under my table in the office and in the evening I would take out my bedding and sleep on the table. During the day I would work as a typist and in the early mornings and evenings I would work for the Congress and the Arya Kumar Sabha.  Then I took my food in one of the dhabas at the crossing of Nai Sarak and Chawri Bazar. The dhaba was called after some tree’s name, ‘Bar Shah Bullah’. And the dhabawalla was Sardar Kesar Singh. Sometimes Lala Diwan Chand’s wife used to give me some left-over food or something like that.

Types 1,000 Copies in One Night!

After a year or so, it was a coincidence that Sardar Nanak Singh shifted to our office and was given a room hardly 6’ x 6’. He got his letterheads beautifully printed—“Delhi Iron Syndicate”. He called me one day and asked me: “Can you type five to ten circulars every day for me to be sent out to all the contractors?” I asked him: “How many circulars do you need?”  He said: “Why do you ask that? I need about 500 or even 1,000. But it is not essential. You type, whenever you are free.” 

Of course, I was not an employee of the Delhi Iron Syndicate. Probably that was the reason why he was requesting me in that way. So I said, “All right.”

After the office was closed at 5 o’clock that evening, I started typing at night, and made 1,000 copies and placed them on his table!

Lala Diwan Chand used to go every day on horseback for a ride—early in the morning at 4 o’clock. So when he came, he saw that the light was on and he heard the sound of typewriter as I was typing. He was surprised. “Who is typing at this time?” In those days, as I was the Secretary of the Arya Kumar Sabha, he did not have the courage to come and open the door and ask me what I was typing. He went away.

When Sardar Nanak Singh came at 10 a.m. the next day, he found 1,000 copies lying on his table. He was very surprised. He called me angrily and said: “From where did you get these typed?” I said: “I typed them myself.” He said: “How is it possible? No person on this earth could type 1,000 copies—I gave it to you only last evening.” He looked through and through and found that they had been typed only on one machine. He said: “You tell me the truth.” I said: “What truth can I tell you? The whole night I was typing and I have typed them.” He said: “It is very strange.” He took those 1,000 copies and went to Lala Diwan Chand and told him about it. And he also said: “Yes. When I went for a horse ride at 4 o’clock in the morning, I saw him typing. It is true.”  So it created a great sensation in the whole office and naturally all people had a great regard and respect for my hard work. But it was a character of my life. Whatever it is, I would do every work like that with ‘fire and fury’. In the whole city, if there would be any fire and I could see some smoke, probably I would be the first person to rush there and help in extinguishing the fire. That was the spirit in me. I cannot explain why it was, but it was there.

 

 

                                                          Continued………..

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