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Ma Mandir Sri Aurobindogram

Ma mandir Sri Aurobindo Ashram Rewa

माँ मन्दिर श्रीअरविन्दग्राम

 

भारत के ठीक हृदय स्थल पर मध्यप्रदेश में रीवा के पास विन्ध्याचल की तराई में एक छोटा सा गाँव है जिसका पुराना नाम महसुवा था। श्रीमाँ ने बाद में इसका नाम श्रीअरविन्द ग्राम कर दिया है जो उसका आध्यात्मिक नाम है। कुछ वर्षों से माँ मन्दिर की स्थापना के बाद से यह गाँव पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। माँ मन्दिर की स्थापना यहाँ कैसे हुई यह एक रहस्य है जिसे संक्षेप में बताना आवश्यक है। यहाँ 4-5 ऐसी घटनायें हुईं जिन पर बाहर के लोग शायद ही विश्वास कर पायेंगे लेकिन माँ मन्दिर की स्थापना के पीछे इन घटनाओं की बड़ी भूमिका है।

पहली घटना अप्रैल 1958 की है। गाँव के किनारे दक्षिणी भाग में गाँव के मवेशियों को खड़ा करने के लिये एक जंगली मैदान था। उस स्थान पर रात को अनुभूति में ‘क’ ने एक मन्दिर बना देखा जिसमें श्रीअरविन्द ने लगभग एक दर्जन शिष्यों के साथ प्रवेश किया। मन्दिर के उसी सत्संग भवन में, जहाँ आज भी सत्संग होता है, ठीक उसी स्थान पर जहाँ आज उनकी व माता जी की तस्वीरें विराजमान हैं, श्रीअरविन्द बैठ गये। उन्होंने प्रत्येक के मुह से सावित्री की पंक्तियों का जबानी पाठ सुना। दृश्य इतना सुहावना था कि मन्दिर में आनन्द का सागर उमड़ पड़ा। ‘क’ को भी इस पाठ में हिस्सा मिला। जब वे वहाँ से विदा होने लगे तो भूमि में जवारे जैसे छोटे छोटे पौधों की ओर, जो क्यारियों में लगे थे, सबका ध्यान आकर्षित किया और अपने हाथ से उन हरे सुन्दर पौधों की क्यारी को ‘क’ के हाथ में रख दिया जिससे एक नाम उभर आया। उन्होंने बताया यही ‘क’ का असली परिचय है जिसे पाकर कोई भी मंत्र मुग्ध हो सकता था। हथेली पर रखी यह नर्सरी आज भी माँ मन्दिर के किसी दैवी उद्देश्य की ओर हम सबका ध्यान आकर्षित करती है।

दूसरी घटना फरवरी 1960 की है। धरती पर अतिमानस की यह प्रथम वर्षगांठ थी - यह बात हम किसी को मालूम नहीं थी। ठीक उसी स्थान के बगल में जहाँ 1958 में मन्दिर दिखा था, गाँव के प्राइमरी स्कूल का भवन खड़ा था। दि. 5.2.1960 की शाम को उस स्कूल में अचानक आग लग गई। हल्ला होते ही गाँव के लोग पानी की बाल्टियाँ और सीढ़ी ले कर दौड़े और किसी प्रकार आग पर काबू पा लिया। पर यह क्या, स्कूल की आग बुझते ही दो फर्लांग की दूरी पर बनें क व त के खपरैल के मकानों में आग लग गई। गाँव के लोग जब तक उसे बुझा पाते कि, दूसरे मकान में आग लग जाती। रात तक किसी प्रकार वह शान्त हुई लेकिन सूर्योदय होते ही मकानों के बाहर भीतर सर्वत्र आग लगने का सिलसिला फिर शुरू हुआ। प्रत्येक आध घण्टे में कहीं न कहीं आग लग जाती और सैकड़ों लोग जो वहाँ इकट्ठे हो गये थे, उसे बुझा देते थे। तब तक हम लोगों का सम्बन्ध माता जी से जुड़ चुका था इसलिये प्रत्येक कमरे में माता जी के कलेण्डर लगा दिये गये। आग लगने और बुझाने का यह सिलसिला लगातार सात दिनों तक इसी प्रकार चलता रहा। पुलीस का घर के चारों ओर पहरा लगा रहता लेकिन आग लगने के रहस्य का कोई पता नहीं चल पाया। हम लोग प्रतिदिन चार पांच S.O.S. टेलीग्राम माँ के पास भेजते रहे। पता चला कि श्रीमाँ के प्रधान सचिव श्री नलिनी कान्त गुप्त ने इन तारों को माँ के पास ले जाकर पढ़ा। माँ ने अपने भीतर झांका और बताया - ‘There is one person in that family who is serving as the medium of Asuric forces. Locate him and isolate him immediately.’ यह कहकर उन्होंने हस्तक्षेप किया और सन्देश मिलते ही दि. 13.2.1960 को आग लगनी बन्द हो गई। पुलीस, ओझा, तांत्रिक और अधिकारी सभी भौंचक्के रह गये।

तीसरी घटना 1965-66 के भयंकर अकाल की है। इन दो वर्षों में रीवा संभाग में अवर्षण के कारण भयंकर अकाल पड़ा था। लोगों को घास तक की रोटियाँ खानी पड़ी थीं। हजारों जानवर और पक्षी भूख प्यास से तड़प तड़प कर मरे थे। क व त ने, जिनके तार श्रीमाँ से जुड़े थे, अपने खेत में बने कुयें को रात दिन पत्थर तोड़ कर इतना गहरा किया कि छः से आठ फीट तक कुयें में नीचे पानी आ गया। फिर गेहूँ के एक एक दाने जमीन में गाड़ कर उसकी सिंचाई की। यह गाँव में अकेला खेत था जहाँ चरस से सींच सींच कर गेहूँ के पौधे एक एकड़ में उगाये गये थे। पशु पक्षियों व मनुष्यों के अतिरिक्त कीड़े मकोड़े भी तो भूखे थे। अतयेव एक रात को उन्होंने पूरे खेत को खा कर पूरा साफ कर डाला। अब क्या करते? तब त ने अपनी वघेली भाषा में माँ को कार्ड में एक चिट्ठी लिखी जिसमें उस भयंकर अकाल के साथ अपनी उजड़ी खेती का हाल लिखा गया था और माँ के हस्तक्षेप की प्रार्थना की गई थी। एक सप्ताह के भीतर ही माँ का आशीर्वाद पुष्प आ गया। आशा बँधी। पर घर में बीज नहीं था इसलिये सोने के भाव बाजार से 10 किलो गेहूँ खरीद कर उसमें माँ के प्रसाद को मिला दिया गया फिर पहले की तरह ही पुनः दाने दाने को खेत में गाड़ दिया गया। दाने तेजी से उगे और 15 दिन के भीतर खेत पूरा हरा भरा हो गया लेकिन यह क्या! अबकी कीड़ों ने एक भी पौधे को नहीं छुआ। इस (बम्पर क्रॉप) को देखने के लिये पूरे जिले के सैकड़ों लोग प्रतिदिन आने लगे। जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर अपने पूरे शोधकर्ताओं को ले कर पहुँच गये और औसत से बड़ी बालियों की तस्वीरें लेने की होड़ लग गई। उस एक एकड़ के खेत में इतना अनाज हुआ कि कोठे भर गये और पूरे गाँव के किसानों को बोने के लिये बीज वितरित किये गये। दूसरे वर्ष भी उतना ही भयंकर अकाल था क्योंकि वर्षा फिर नहीं हुई थी लेकिन अबकी बार पूरा गाँव इसका सामना करने के लिये पूरी तरह तैय्यार था। सभी ने सब्बल हथौड़ों से अपने अपने कुयें गहरे कर डाले और नवम्बर का महीना आते ही सभी ने उसी प्रकार अपने अपने खेतों में माँ की उपज से प्राप्त बीज बो दिये। गाँव के सभी खेत में वैसी ही बम्पर क्राप उगी और पैदावार को देख कर आस पास के लोग हतप्रभ रह गये। इस प्रकार भगवती की कृपा को देख कर इस गाँव को हरित क्रांति का स्रोत मान लिया गया और उसका नाम मध्य प्रदेश के नकशे में एक आश्चर्य के रूप में लिख दिया गया।

एक चौथी घटना 1969 में घटी। तब तक माँ का नाम गाँव के प्रत्येक ओंठ पर आ चुका था। एक रात को पुनः उसी स्थान पर अनुभूति में उसी प्रकार का मन्दिर ठीक उसी स्थान पर दिखाई पड़ा जहाँ 1958 में श्रीअरविन्द का अनुभूति में आगमन हुआ था। बीच में भी एक बार वह वहीं दिखा था पर उसे निरा स्वप्न मान कर भुला दिया गया था पर अबकी तीसरी बार की अनुभूति इतनी स्पष्ट और प्रगाढ़ थी कि उसे किसी भी प्रकार भुलाया नहीं जा सकता था। यह ठीक वैसा ही मन्दिर था जैसा बाद में 1975 में वह बना। इस मन्दिर के गर्भगृह में पहले एक छोटी सी काली मूर्ति दिखी जो आकार में बढ़ती हुई सहस्रों सूर्य के प्रकाश में बदल गई। उसी प्रकाश के भीतर माँ अपनी आजान बाहुओं को फैलाये मानों धरती को लपेट लेने के लिये मूर्ति के भीतर से प्रकट हो गई। दिग दिगन्त इस महाप्रकाश से भर गये। क्या ही आश्चर्यजनक दृश्य था!! सारा संसार उसके महागान में आलोड़ित हो उठा। रोम रोम आनन्द से पुलकित हो उठे। मन्दिर का दृश्य इतना स्पष्ट था कि अनुभूति के बन्द हो जाने के बाद भी उसका रेखा चित्र बना लिया गया जिसे सही आकार देने के लिये भिलाई प्लाण्ट के स्वर्गीय श्री महेश जांगले के पास (जो माँ के अच्छे भक्त थे) भेज दिया गया। बनकर आते ही उसे हम लोगों ने श्री माँ के पास यह जानने के लिये भेजा कि यह देखा गया मन्दिर किसका है। माँ ने उसी नक्शे में बड़े अक्षरों में लिख दिया -

Ma Mandir

Blessings.

डाक से आये नकशे पर माँ की इस कृपा को देखते ही हम सभी दंग रह गये। अश्रु पूरित नेत्रों से हम सबने प्रणाम करते हुये अपने भाग्य को सराहा लेकिन अब प्रश्न यह था कि बिना पैसे कौड़ी के इस मन्दिर को बनाया कैसे जाय। वह भूमि भी जहाँ मन्दिर दिखाई पड़ा था सरकारी थी और पूरे गाँव के निस्तार में थी। उसे प्राप्त कर पाना बहुत कठिन काम था क्योंकि पूरी भूमि तीन एकड़ से ऊपर थी। लेकिन तभी पाँचवँा आश्चर्य घटित हुआ। श्रीअरविन्दाश्रम के प्रसिद्ध साधक श्रीचन्द्रदीप जी एकाएक बिना किसी सूचना के वहाँ आ गये। उनके सामने पूरे गाँव के लोगों की बैठक बुलाकर उस अनुभूति और श्रीमाँ की कृपा के बारे में बताया गया। श्रीचन्द्रदीप जी ने गाँव वालों से स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह तो जगज्जननी का इस भूमि में, इस गाँव में, सदेह आना हुआ है, इस कृपा के लिये सारी धरती और देवता तरसते हैं इसलिये अपने भाग्य को सराहो। इस गाँव के तो भाग्य खुल गये हैं। और जैसी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, सभी ने एक स्वर से उस भूमि को माँ के चरणों में समर्पित करते हुये तन मन धन से माँ मन्दिर के निर्माण में सहयोग का संकल्प कर डाला। बाकी के सारे संयोग भी अपने आप जुड़ते गये। रीवा में एक के बाद ऐसे कलेक्टर आये जिनकी श्रीअरविन्द और माँ पर आस्था थी। 1972 में सारे संसार में श्रीअरविन्द जन्म शताब्दी मनाई गई। मध्य प्रदेश में जन्म शताब्दी समिति के अध्यक्ष तत्कालीन शिक्षा मंत्री कुँवर अर्जुन सिंह बने जो हम लोगों के शुभ चिन्तक थे। उन्होंने माँ मन्दिर के निर्माण में थोड़ी बहुत आर्थिक सहायता भी की और भूमि का नामान्तरण माँ मन्दिर के नाम पर कराने में अपनी अहं भूमिका निभाई।

अब प्रश्न था माँ मन्दिर के निर्माण के लिये धन कहाँ से आये? यह यक्ष प्रश्न हम सबके सामने था। गाँव में तब बँधुआ मजदूर अधिक थे, कुछ प्राइमरी स्कूलों के अध्यापक थे तो कुछ जंगल विभाग में मोहर्रिर। बाकी के लोग एक एक दो दो एकड़ के छोटे मोटे किसान और मजदूर ही गाँव में बसते थे। इनसे भला क्या आशा की जा सकती थी? गाँव में तब तक किसी भी व्यक्ति के पास पक्का मकान नहीं था इसलिये माँ मन्दिर के निर्माण के लिये इंजीनियर और आर्किटेक्ट कहाँ से आते? लेकिन ‘All is possible if God’s touch is there.’

  अतयेव बिना किसी इंजीनियर और बिना किसी पूँजी के ही एक दिन पूरे गाँव के लोग अपनी अपनी कुदाल, फावड़ा और तगाड़ियाँ लेकर पहुँच गये और अपने हाथ से चूना की लकीरें डालकर नींव की खोदाई शुरू कर दी। देखते देखते नींव खुद भी गई, और भर भी गई। किसी ने अपनी गाढ़ी मजदूरी के पैसे लगाये, तो किसी ने श्रमदान किया तो किसी ने अपने पूरे वेतन दे डाले। यह समा देखते ही बनती थी। हमेशा ही मुर्गों की तरह आपस में लड़ने वाले ये लोग माँ मन्दिर में आकर एकता की मिशाल बन गये। कभी गाँव के स्त्री और बच्चे तो कभी पुरुष आकर नींव खोदने में पांच पांच घण्टे लगे रहते। घर से आते समय और जाते समय माँ का तीर्थ गान करते हुये सभी इस गाँव की अद्भुत कहानी लिख रहे थे। जाति पांति, छुआ छूत, ऊँच नीच की प्रथाओं और कुरीतियों से जकड़ा हुआ यह गाँव माँ मन्दिर में आकर एक सगा परिवार बन जाता और दोपहर का भोजन माँ के स्थल पर ही बनता जिसे मिल कर सभी बनाते और साथ में मिल बैठ कर खाते। जाने के पहले 10 मिनट का ध्यान करना न भूलते। कितनी सुन्दर कितनी सुखद थी वह घड़ी! ऐसा लगता था हम जल्दी ही भगवती के राज्य में अपना झण्डा गाड़ देंगे। हम जो भी चाहते अपने आप हो जाता, हम जो भी मांगते कोई भी अदृश्य हाथ पहुँचा जाता या किसी व्यक्ति को सहायता के लिये भेज दिया जाता। अद्भुत! अकल्पनीय! आज भी ये घड़ियाँ हमारे स्वप्नों में तैर जाती हैं। अगर सचमुच में हमारे पास आंखंे होतीं तो हम वहाँ माँ को कुदाल चलाते देख सकते थे। फिर भी इन जड़ता की आंखों से हम सभी ने उनकी परछाईं को देख ही लिया। उस समय भी जब घरों में आग धांय धांय कर रही थी, कंकड़ पत्थर से बनी इन आंखो से अमृत के घट फूट कर बहा करते थे। उन विपत्तियों के दरवाजे से ही हमने परात्परा की करुणा में पहली बार झांका था। लगता है माँ मन्दिर का यह शिलान्यास किसी ओरोवील का पूर्वाभास था।

और हाँ, इस शिलान्यास के पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। जब मन्दिर की पहचान और नामकरण माँ ने 1970 में कर दिया तो मन्दिर तो बनना ही था पर हम लोगों को एक चालाकी सूझी। हमने लिख भेजा - माँ हम तेरा मन्दिर तो बनायेंगे पर उसके पहले हमारी एक शर्त है जिसे तुम्हें स्वीकारना होगा। कहा - हम पांच लोगों को पहले तुम्हें प्रणाम (व्यक्तिगत दर्शन) देना होगा तभी हम नींव में पहला पत्थर रक्खेंगे वर्ना मन्दिर बनाना हम गाँव गँवई के लोगों के बस की बात नहीं। और माँ को हमारी शर्त स्वीकार करनी पड़ी। हम 1971 के दिसंबर में एक बड़ी शिला लेकर 6 व्यक्ति पाण्डिचेरी पहुँच गये। प्रणाम देने की तिथि निश्चित हो गई। नवजात भाई जी हमें ऊपर ले चलने के लिये आये पर हमारी भारी भरकम शिला को देख कर लगे कहने - ष्इतनी बड़ी शिला भला कमरे में कैसे जायगी? उस पर भी आप लोगों ने इसे मां की गोद में रखने की ठान ली है। असंभव! यह नहीं हो सकता। आश्रम से स्वयं भी शिलान्यास के लिये पत्थर मिलता है उसे ही लेकर जाना होगा।

लेकिन भाई जी यह पत्थर नहीं है यह तो हमारी ठोस श्रद्धा है। हम बड़ी मेहनत से इसे यहाँ तक ले आये हैं।                     

कुछ भी हो, आपको माँ के शरीर और उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना ही होगा। आप बिना शिला के प्रणाम के लिये चल सकते हैं।

भाई जी अपनी श्रद्धा के बिना, हम खाली शरीर को प्रणाम नहीं कराना चाहते। इसे ले जाने दें।

अच्छा अगर आप लोग जिद्द करते हैं तो मैं माँ से पूछ कर आता हूँ कि माँ मन्दिर वाले लोग एक मन की शिला ले कर आये हैं।                

और भाई जी माँ से हमारी जिद के बारे में बताने के लिये चले गये। हमारी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने लौट कर बताया कि माँ ने शिला ऊपर ले आने की अनुमति दे दी है। हम लोग खुशी खुशी ऊपर गये। हम, श्री चम्पकलाल, भाई जी और बंशीलाल ने शिला के चारों कोनों को पकड़ कर माँ की शाश्वत गोद में रख दिया। माँ ने प्रतीक चिन्ह और हिन्दी में लिखी सन् की जानकारी के लिये कुछ पूछा जिसका भाई जी ने उत्तर दिया। थोड़ी देर पत्थर की ओर वे करुणा भरी दृष्टि से एकाग्र देखती रहीं और ‘yes’ कह कर हाथ से स्पर्श करते हुये शिला को प्रसाद के रूप में हमें लौटा दिया। फिर एक-एक को बारी बारी से उनकी गोद में सिर रखने की हमारी जन्म जन्मान्तरों की प्यास पूरी हुई। हम धरती का सम्राट बनकर वापस आ गये और जितना चाहते थे उससे कई गुना अधिक बटोर लाये।

वर्तमान समय में शिला गर्भगृह के मुख्य द्वार पर लगी हुई है और स्वर्ग से टपका माँ मन्दिर का मानचित्र बगल में लगा हुआ है। दोनों हमारे लिये ‘A vision and a boon’ से कम नहीं हैं। इस अहैतुकी कृपा में वह बीज छिपा है जिसके लिये हम युगों से तरस रहे हैं-

‘Thus was a seed cast into endless time.’

श्रीअरविन्द और श्री माँ ने जान बूझ कर कोई चमत्कार नहीं किया लेकिन संसार में उनकी उपस्थिति चमत्कारों का चमत्कार है। उनकी कृपा और करुणा से ईंटें जुड़ती चली गईं। यह मन्दिर कोई न भव्य इमारत है और न संगमरमरी कलाकृतियों और स्थापत्य का नमूना। फिर भी लोग पूछते हैं कि इस मन्दिर का नकशा किस आर्किटेक्ट ने बनाया था। यह समझा पाना कठिन है कि कुछ चीजे़ं बनाई नहीं जातीं, वे कृपा के अनदेखे झरोखों से टपक पड़ती हैं बशर्ते कि उन्हें ग्रहण करने के लिये अभीप्सा के आंचल खुले हों। और जब यह कृपा सुप्रामेण्टल चेतना का रूप ले कर आती है तो जिस व्यक्ति की जहाँ आवश्यकता होती है वह स्वयं ही आ जाता है, जिस वस्तु की आवश्यकता होती है, उसकी व्यवस्था अपने आप हो जाती है, साधन सम्पन्न लोग आकर सहायता करके अदृश्य हो जाते हैं। माँ मन्दिर इस कृपा का इतिहास है जिसके थोड़े से ही पन्ने अभी तक खुल पाये हैं।

अतयेव 3.11.1975 को दीपावली के पावन पर्व पर उद्घाटन के रूप में माँ मन्दिर के भीतर दीपक जल उठे। बच्चों के ओठों से यह गीत निर्झरित होने लगेः-

दीप जले भीतर दीप जले बाहर

सारे जहाँ में दीप जले रे।

आज का दिवस यह कितना महान है?

मन्दिर का आंगन यह कितना विशाल है?

आओ सब मिल कर आह्नान करें रे।

ज्योति मिली धरती को कितनी महान रे

माँ की यह छाती है कितनी विशाल रे

आओ हम सब मिलकर जयगान करें रे।

आई आई रे दीवाली।

और जब ऋग्वेद के अग्नि सूक्तों का गायन हो रहा होता है तभी मील भर लम्बे काफिला के साथ श्री नवजात भाई जी श्रीअरविन्द के पवित्र देहांशों को लेकर गर्भ मन्दिर में प्रवेश कर जाते हैं। भीतर में चेतना की गहराइयों में कोई अनगाया गीत गूँज उठता है, अनाहत की झंकार में कोई नारद स्तवन करने लगता है, वीणा वादिनी प्रत्येक वीणा में अँगुली चलाने लगती है और मनमोहिनी गर्भ मन्दिर में रखे कमल की पंखुड़ियों को उघार देती हैं। भगवान के श्री चरण कमल के भीतर विराजते ही शंखध्वनि के ये बोल दीप्तियों में तिरने लगते हैं

बोलत बोल न पाऊँ

प्रभु पद पंकज नमन नमन हे

चिदविलास चिन्माऊँ।

धन्य धन्य यह घड़ी आज की

गंगा भूमि बहाऊँ। बोलत बोल न पाऊँ।

उसके बाद की कहानी लम्बी है। इसके विस्तार में जाने का उद्देश्य हमारा नहीं है। हमें तब मालूम नहीं था कि भगवान के चरण धरती पर पड़ते ही असुरों के गढ़ में खलबली मच जाती है। अग्निकाण्ड का तिलिस्म हम झेल चुके थे। तब सारा गाँव और समाज हमारे साथ था। श्रीअरविन्द के देहांशों के पधारते ही हमारे और हमारे ही बंधु बान्धवों, मित्रों और सहयोगियों के निश्चेतन में जो भूत सोये पड़े थे, जाग उठे और विश्वयुद्ध शुरू हो गया। हम इसके लिये बिलकुल तैय्यार नहीं थे तभी हमारे निश्चेतन ने बिगुल बजा दिया। इस संघर्ष का समय इतना लम्बा रहा कि कई बार मरणान्तक पीड़ाओं से हमें गुजरना पड़ा। जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा यह युद्ध खा गया लेकिन कृपा और मिथ्यात्व के बीच जो मेराथन दौड़ चली उसमें जीत कृपा की ही हुई। शायद हमारे समर्पण और सच्चाई के लिये यह परीक्षा आवश्यक थी। सारा गाँव जो कभी माँ की कृपा के प्रति कृतज्ञ था, उसे ढहा देने पर आमादा हो गया, जिस भूमि को एक आवाज से लोगों ने माँ को अर्पित की थी उस पर जबरन कब्जा कर लेने के लिये हमले पर हमले हुये। बाद में यह जाना कि जिस स्थान पर भगवान की कृपा अनवरत रूप से बरसती है वहाँ ऐसा होना स्वाभाविक ही है क्योंकि अभी तक संसार में मृत्यु, मिथ्यात्व, पीड़ा, अन्याय और निरंकुश पशुता का ही राज रहा है। भागवत शक्ति के प्रवेश को वे अपने शासन के विरुद्ध अनावश्यक हस्तक्षेप मानती हैं इसलिये अपने शासन को बनाये रखने के लिये वे पूरी शक्ति के साथ हमला बोल देती हैं। श्रीअरविन्द योग के सैनिकों को यह लड़ाई लड़ना और उनकी सफाई करना अनिवार्य होता है। यह सारी गंदगी हमारे भीतर होती है जिसका रूप बाहर परिस्थितियाँ बनाकर खड़ा करती हैं और जब हम भीतर उन्हें लगातार के समर्पण से, व कष्टों की मार से जीत लेते हैं तो बाहर अपने आप शान्ति स्थापित हो जाती है। श्रीअरविन्द कहते हैं, तुम्हारी आत्मा ही सारे कष्टों और पीड़ाओं को आमंत्रित करती है। ये पीड़ायें ही हमारे भीतर के उन कठोर अवरोधों को तोड़ती हैं जो भागवत प्रेम और प्रकाश को भीतर आने से रोकते हैं। इसलिये जीवन के रूपान्तर के लिये इन अवरोधों की सफाई आवश्यक होती है। और जो चीज़ व्यक्ति के लिये आवश्यक है वही एक संस्था के लिये भी आवश्यक होती है क्योंकि संस्था भी एक व्यक्तित्व ही है। संस्था में जुड़े हुये लोगों के भीतर की सारी कुण्ठाओं, पुरानी आदतों, अहंकार और सड़ी मान्यताओं की सफाई के लिये संस्था की आत्मा उन विपत्तियों का आवाहन करती है जिनसे टकराकर हम अपने छिपाये गये भूतों को बाहर खदेड़ते हैं। इस युद्ध को वास्तव में हमारे भीतर भगवत्ता ही लड़ती है और इसका अनुभव योद्धा साधकों को कराती रहती है।

श्रीअरविन्द बालविद्यामंदिर

इस संघर्ष के बीच ही श्रीअरविन्द बालविद्यामन्दिर (विद्यालय) और मीरा अदिति शिशु छात्रावास की स्थापना हुई जिनके प्रारंभ की कहानी भी अद्भुत है। हम लोगों ने कभी भी कोई योजना अपनी ओर से नहीं बनाई। हमने कभी भी विद्यालय या छात्रावास खोलने की बात सोची भी नहीं थी, लेकिन इन्हें इसी प्रकार खोलना पड़ा जिस प्रकार माँ मन्दिर के लिये अपने को तैय्यार करना पड़ा था।

एक दिन स्वर्गीय विद्यावती जी कोकिल, श्रीअरविन्द आश्रम पांडिचेरी से माँ मन्दिर आ धमकीं। कहा - ‘माँ की इच्छा है कि यहाँ नन्हें मुन्नों का विद्यालय खोला जाय।’

लेकिन विद्यालय के साधन कहाँ हैं? शिक्षक कहाँ मिलेंगे? भवन कहाँ मिलेंगे? उन्हें वेतन कौन देगा?

हमने प्रश्न किया।

भैय्या तुम इसकी चिन्ता मत करो। माँ सारी व्यवस्था कर देंगी।

नहीं बहन जी! विद्यालय खोलना कोई खिलवाड़ नहीं है। फिर माँ का स्कूल खोलने के लिये जिस चेतना की आवश्यकता है वह किसी में नहीं है। मैं व्यवसाय वाला विद्यालय खोलने के पक्ष में नहीं हूँ।

भैय्या! तुम केवल हा कर दो। बाकी की चिन्ता माँ पर छोड़ दो।

ठीक है लेकिन पहली शिक्षक आपको ही बनना है। श्रीअरविन्दाश्रम छोड़ कर माँ मन्दिर में आकर रहें और बच्चों को पढ़ायें।  

दूसरे दिन घर के सामने अपना मजीरा बजाते हुये नीम के पेड़ के नीचे 25 बाल गोपालों को लेकर उन्होंने स्कूल खोल दिया। हमारी एक न मानी। यह 1976 की बात है। लेकिन कुछ दिन बाद ही झांझ मजीरा बहू को थम्हाकर उन्होंने आश्रम का रास्ता पकड़ा। अब क्या होता ? उसे तो अब झेलना ही था। इस प्रकार श्रीअरविन्द बाल विद्या मन्दिर की नींव नीम के पेड़ के नीचे पड़ी। आज वह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के नाम से क्षेत्र का अँगरेजी माध्यम विद्यालय बन चुका है।

मीरा अदिति शिशु छात्रावास

छात्रावास की कहानी भी इतनी ही दिलचस्प है। विद्यालय की प्रसिद्धि सुनकर एक दिन एक सज्जन 75 कि.मी. दूर से अपने छोटे से बच्चे को लेकर स्कूल में भरती कराने के लिये ले आये। बच्चा प्रतिभा सम्पन्न था। उसके ठहरने की व्यवस्था? उसके आवास और भोजन की व्यवस्था के लिये कहने पर उन्होंने दोनों हाथ खड़े कर लिये। अपने यहाँ ठहराने की कोई व्यवस्था हो नहीं सकती थी। अतयेव प्रवेश इन्कार कर दिया गया। बच्चे को आधा घण्टे के लिये वहीं छोड़ कर वे उसके आवास की व्यवस्था के लिये पास के गाँव गये पर वापस नहीं लौटे। चार घण्टे छः घण्टे बीत गये फिर भी वे लौटे नहीं। लड़के ने जो रोना शुरू किया तो रोने का रिकार्ड बना डाला। पूरे छः घण्टे तक तब तक रोता रहा जब तक थक कर सो नहीं गया। अब तो लड़का गले पड़ गया। उसके लिये एक बहू को उसकी माँ बनाना पड़ा। चार दिन के भीतर ही वह उससे इतना हिल मिल गया कि अपनी सगी माँ को वह भूल गया। उसके साथ के लिये दो चार और बच्चों को ढूँढ़ कर ले आना पड़ा। दूसरे वर्ष दूर के कई लोगों ने आकर अपने बच्चों को माँ मन्दिर में रखकर पढ़ाना चाहा। आवास के निर्माण के लिये पांच पांच हजार रुपये 1980 के दशक में अग्रिम धन राशि जमा कर प्रवेश ले लिया और छात्रावास तथा विद्यालय दोनों के सुन्दर भवन खड़े हो गये। ऐसी होती है माँ की योजना जिसे इन आंखों से देख पाना संभव नहीं है।

श्रीअरविन्द पुस्तकालय एवं वाचनालय

मनीषियों, साधकों व विद्यार्थियों के लिये चुनिंदा पुस्तकों का एक सुन्दर पुस्तकालय भी धीरे धीरे अस्तित्व में आया जिसमें लगभग सात हजार पुस्तकों का संग्रह है। श्रीअरविन्द और श्री माँ के योग और दर्शन पर शोध करने वालों को यहाँ पूरी सुविधा दी जाती है। अभी तक यहाँ कई शोध प्रबन्ध लिखे जा चुके हैं।

पुष्प वाटिका और उद्यान

माँ मन्दिर के चारों ओर सुन्दर पुष्प वाटिका और छोटा सा बगीचा है जिसमें लोगों के लिये गुरुकुलों का प्रशान्त वातावरण दृश्यमान हो उठता है। इस फुलवाड़ी के बीचों बीच नन्हें मुन्नों की के.जी. की कक्षायें चलती हैं। सुबह और शाम हजारों चिड़ियों का कलरव पूरे वातावरण को अनुगुंजित कर देता है। रंग बिरंगे फूलों और पुष्पलताओं की सौरभता में माँ मन्दिर परिसर पूरे बारहों महीने गमकता है।

माँ मन्दिर के परिसर से लगा हुआ छात्रावास है जिसमें प्रदेश व कुछ प्रदेश के बाहर के बच्चे भी रहते हैं। इन बच्चों की दिनचर्या इस ढंग की बनाई गई है कि उनके शारीरिक, प्राणिक, मानसिक और आत्मिक विकास को एक साथ सन्तुलित किया जा सके।

विद्यालय में संगीत और कम्प्यूटर प्रशिक्षण की भी सुविधायें हैं। खेल के लिये आश्रम के पास बहुत बड़ा मैदान है जिसमें हर प्रकार के खेलों की सुविधा उपलब्ध है। इस विद्यालय के खिलाड़ी प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर की मिनी स्पर्धाओं के लिये चुने जाते हैं जिसके कारण पूरा क्षेत्र गौरवान्वित अनुभव करता है। प्रतिवर्ष श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर ष्फकीरष् क्रिकेट व वालीबाल टूर्नामेण्ट आयोजित किया जाता है जिसमें कई क्षेत्रीय टीमें भाग लेती हैं।

इतना होते हुये भी हमारा विद्यालय और छात्रावास श्रीअरविन्द और श्रीमाँ की शिक्षा पद्धति से अभी कोसों दूर है जिसके प्रमुख तीन कारण हैं - प्रथम है बच्चों के पालकों की उदासीनता और असहयोग। यह गाँव है और प्रदेश के आन्तरिक भाग में स्थित होने से लोगों में शिक्षा के प्रति अब भी जागरूकता नहीं है। गरीबी होने से कम से कम शुल्क भी नहीं अदा कर पाते। वे बच्चों के चारित्रिक विकास के बजाय बच्चों को कमाऊ तोता ही बनाना चाहते हैं। दूसरा कारण है साधक शिक्षकों का नितान्त अभाव। वर्तमान शिक्षा व्यवसाय की सबसे बड़ी दुकान बन चुकी है और व्यवसायिक होने के साथ-साथ शिक्षा का रंग राजनीतिक हो गया है। प्रत्येक राजनीतिक दल ने अपने दल के लोगों को काम देने के लिये अपने सैकड़ों विद्यालय खोल लिये हैं। उनके मतदाता उन्हीं स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना पसंद करते हैं। उन्हें बच्चों को इंसान बनाने या पूर्ण व्यक्ति बनाने में कोई रुचि नहीं होती। शिक्षक जो मिलते भी हैं उनमें श्रीअरविन्द व श्रीमाँ की सर्वांगीण शिक्षा से दूर का भी सम्बन्ध नहीं होता। शिक्षक जब तक साधक शिक्षक नहीं बन जाते तब तक माँ की शिक्षा पद्धति दूर की परीकथा बनी रहेगी। यह एक ऐसा विषय है जिस पर सम्मेलनों, सेमीनारों और श्रीअरविन्द गोष्ठियों में गंभीरता से विचार किया जाना बहुत आवश्यक है। माँ के अनुयायियों में भी भौतिकता की दौड़ का ही जादू सवार है। हम भाषण तो ऊँचे देते हैं पर सारे बच्चों को विदेश भेजने की सारी जुगाड़ में आधी से अधिक अपनी उम्र खपा देते हैं। हम सभी भीतर से इसी बात पर विश्वास करते हैं कि उच्च जीवन का अर्थ पैसा है। कितने लोग हैं जिन्होंने अपनी एक भी सन्तान को दिव्य जीवन की तैय्यारी के लिये कमर कसी है? यही तीसरा कारण है कि उन्मुक्त शिक्षा प्रणाली (Free Progress Education) के लिये आज तक हम उपयुक्त वातावरण नहीं बना पाये। जिनके पास विचार हैं उनके पास साधन नहीं हैं। अतयेव साध्य और साधन को आपस में मिलाने का प्रयास किया जाना चाहिये और उसके लिये यही उपयुक्त समय है।

दुनिया तेजी से भौतिकता की दौड़ में छलांग भरती जा रही है। इस दौड़ में अपराध, हिंसा, अपहरण, कैंसर, तनाव, एड्स, प्रतिस्पर्धा और व्यस्तता जैसी चीज़ें अपनी चरम सीमाओं में पहुँच रही हैं। प्रत्येक व्यक्ति मशीनों से जुड़कर मशीन बन चुका है और उसके भीतर आत्मा की जगह लोहा और बालू भर चुका है। चेतना का स्थान सिमेण्ट ले चुकी है और सच्चिदानन्द का स्थान बालीउड और हालीउड की नग्नता। आतंकवाद इस अंधी दौड़ का उत्तर है जो चीख रहा है - मंगल में यान उतारने के पहले अपने भीतर के ताले को खोलो। माँ कहती हैं कि संसार का गुरु बनना भारत की नियति है। लेकिन हमारे पास भारत बचा कितना है?

श्रीअरविन्द योग ‘Action’ है पूजा नहीं? भगवत्ता की करुणा अमृत बन कर कोश कोश में जितना ही ढरकती है उसकी क्रियाशक्ति उतनी ही तीव्र होती है। भीतर में एक युवा पैदा हो जाता है जो रात दिन उसके रथ को आगे बढ़ाने के लिये जुयें में जुतता है। शिक्षा हमारी चेतना का रथ है यदि समय रहते हमने चारों पहियों को दुरुस्त नहीं किया तो अकेले नाम जोड़ने से क्या होगा? शिक्षा के जगत में बहुत बड़ी क्रान्ति की आवश्यकता है। क्रान्तिकारी भीतर से आयेगा। पर उसके लिये छटपटाहट की आवश्यकता है। I.I.T. तो होंगे पर I.I.P. (P=Psychic Being) भी होंगे। अगर हम मन्दिर बनाने की जगह एक I.I.P. बना सकें तो शायद माँ इसे अधिक पसन्द करेगी।

गत 30 वर्षों से विद्यालय चलाने और 25 वर्षों से छात्रावास चलाने का हमारा अनुभव भी एक मायने रखता है। पढ़ाई के ढंग में कोई विशेष परिवर्तन तो नहीं है पर बच्चों की चेतना में थोड़ा बहुत परिवर्तन अवश्य हुआ है। बच्चे अधिक अनुशासित और आत्मिक चीज़ों के प्रति अधिक सम्वेदनशील हुये हैं दूसरी ओर पाठ्यक्रमीय शिक्षा के प्रति अधिक उदासीन भी हुये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि पारम्परिक शिक्षा इतनी यांत्रिक, उबाऊ और नीरस है कि बच्चों की आत्मा उसे स्वीकार नहीं करती। परीक्षा का डण्डा आखिर आत्मा पर कब तक चलता रहेगा? सरकार इस तथ्य को समझने में सक्षम नहीं है। उसे तो निर्जीव शिक्षा में उत्तीर्णता  का केवल प्रतिशत चाहिये। यही प्रतिशत देश में अपंगों और बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रहा है। शिक्षा और अपराध सगे भाई बन चुके हैं। अतः डिग्री उगलने वाले इन कारखानों के स्थान पर अब नये विद्यालयों को उगाना पड़ेगा जो बाह्य और आन्तरिक जीवन के बीच का सेतु बन सकें। इसका प्रारंभ हमीं आपको करना है।

छात्रावास चलाने के पिछले अनुभव ने हमारी आंखों को काफी कुछ खोला है। हमारे विद्यालय में दोनों प्रकार के विद्यार्थी पढ़ते हैं, छात्रावासी और प्रतिदिन बाहर के पास पड़ोस से आने वाले विद्यार्थी। शिक्षा का माध्यम अँगरेजी है। दोनों प्रकार के बच्चों की चेतना, अनुशासन प्रियता और प्रतिभा में बहुत बड़ा अन्तर है। छात्रावासी बच्चों की जो दिनचर्या यहाँ बनाई जाती है उसमें जीवन से सम्बन्धित शिक्षा अधिक होती है। वे अधिक अनुशासित, कम उद्दण्ड और ग्रहणशील होते हैं। कुछ छोटे बच्चे तो इतने प्यारे होते हैं, इतने सम्वेदनशील और विनम्र कि उनकी आंखों से उनके भीतर की आत्मा झलकती है। ये बच्चे जब प्यार से, झुण्ड के झुण्ड आकर लिपट जाते हैं तो उनका अभिवादन करने के लिये हमारी भाषा गरीब हो जाती है। वे आत्मिक सम्वेदनों का बहुत जल्दी उत्तर देते हैं। उनके भीतर आत्मा की ही भाषा होती है जिसे सी.ए.टी. कैट और आर.ए.टी. रैट की भाषा कुचल देती है। जिन सुन्दर कुदरती स्पन्दनों को लेकर ये नन्हीं आत्मायें हमारे तथाकथित विद्यालयों में आती हैं उनके ऊपर हम स्पेलिंग रटाई की कलई चढ़ा चढ़ा कर कुन्द कर देते हैं। जो थोड़ी बहुत चमक शेष रह जाती है उसे ट्यूशन के पुराने घोंघे होमवर्क के नाम पर चट कर जाते हैं। रही सही सम्वेदना प्रतियोगिता की दौड़ में समाप्त हो जाती है। ये किताबी सम्वेदनहीन कीड़े जब ऊँची कुर्सियों में बैठकर जीवन की बैलेन्सशीट मिलाते हैं तो माँ बाप परिवार और अपना देश- ये सारे आइटम Liability की ओर सरक जाते हैं। तब यह कहने से क्या लाभ कि हमारा बच्चा बड़ा भारी इंजीनियर बनकर हमें वृद्धाश्रम में फेंक आया है?

इसीलिये माँ कहती हैं कि ‘We don’t want intelligent child, we want good soul’ और यह कि ‘Nothing can be taught.’ हम इन अबोध आत्माओं का मर्डर कब बन्द करेंगे? श्रीअरविन्दाश्रम पाण्डिचेरी में इसीलिये उन्मुक्त शिक्षा प्रणाली का प्रारंभ माँ ने कराया था।

माँ मन्दिर के किसी कोने से आवाज आ रही है कि नये विद्यालय की रचना सूक्ष्म जगत में हो चुकी है और वह माँ मन्दिर की तरह ही इसी परिसर में टपकना चाहता है इसलिये हम अपनी चेतनात्मक तैय्यारी में लगे हैं। हम चाहते हैं कि हमारा पूरा विद्यालय आवासीय विद्यालय बन जाय और हम बाहर के अनियंत्रित तत्वों को प्रवेश देना बन्द कर दें। ऐसा करने में वित्तीय स्थिति हमारे आड़े आ रही है। बच्चों और शिक्षकों के बीच 15:1 से अधिक का अनुपात होना, विद्यालय को धर्मशाला बना देना है। ऐसा करने के लिये हमारे पास लाखों रुपयों का कोष होना चाहिये। दूसरी कठिनाई साधक शिक्षकों की है। बाहर की हवा इतनी तेज है कि हम जिन्हें साधन उपलब्ध कराकर वेतन भी देते हैं वे भी कोचिंग स्कूल खोले बिना नहीं रह सकते। शिक्षण कार्य को साधना मानकर काम करने वालों की संख्या अँगुलियों में गिनने लायक भी नहीं है। तब?

माँ मन्दिर, श्रीअरविन्द बाल विद्या मन्दिर, मीरा अदिति शिशु छात्रावास और श्रीअरविन्द पुस्तकालय का संचालन पंजीकृत संस्था ‘श्रीअरविन्द सोसाइटी महसुवा’ करती है जो एक स्वतंत्र निकाय है। वह देश की किसी भी अन्य संस्था से वैधानिक रूप में संलग्न नहीं है। माँ मन्दिर का एक दूसरा भी अंग है - ‘माँ मन्दिर जन कल्याण ट्रस्ट’। यह अलग से पंजीकृत है और यह भी अपने आप में वैधानिक रूप से एक स्वतंत्र निकाय है। ट्रस्ट ने श्रीअरविन्द योग और उनके दर्शन को संक्षेप में सरल हिन्दी भाषा के माध्यम से समझाने का कार्य हाथ में लिया है। ट्रस्ट के जन्म व कार्य के पीछे भी एक मार्मिक प्रसंग जुड़ा हुआ है -

माँ मन्दिर जन कल्याण ट्रस्ट

हम अपने मरीज को लिये अस्पताल में हैं। रात का समय है। चारों ओर गंभीर रोगियों की कराह और लम्बी सांसें चल रही हैं, यह जनरल वार्ड है। दो की उलटी गिन्ती चल रही है। एक कोने से रोने की आवाज तेज हो रही है, शायद कोई भगवान को प्यारा हो गया है। मैं अपने मरीज की खाट के पास जमीन पर लेटा हूँ और न जाने कब आँख लग जाती है। देखता हूँ मैं श्रीअरविन्दाश्रम पाण्डिचेरी पहुँच गया हूँ। माँ अपनी ऊँची कुर्सी पर बैठी हैं और उनके सामने आधा मील की लम्बी दर्शनार्थियों की कतार लगी हुई है। मैं भी सबके पीछे कतार में लग जाता हूँ। तभी अचरज की बात घटित होती है। माँ का हाथ बढ़ते बढ़ते मेरे पास तक पहुँच कर मुझे पास आने का संकेत करता है। और लो! अब कतार का कोई पता नहीं है। मैं माँ के सामने खड़ा हूँ। प्रश्न करती हैं -

तुमने श्रीअरविन्द के बारे में क्या कुछ लिखा है?

हाँ माँ श्रीअरविन्द और उनकी साधना के पाँच अध्याय लिख चुका हूँ छठवाँ चल रहा है।

लाओ देखूँ तो क्या लिखा है।

मैं हिन्दी में अपने हाथ की लिखी पाण्डुलिपि उनके हाथ में दे देता हूँ और वे उसके पन्ने पलट पलट कर इस प्रकार देखती हैं मानों हिन्दी में साहित्यरत्न किया हो। काफी कुछ पढ़ कर वे एकाएक कुर्सी से उठती हैं और सीढ़ियों से खटपट खटपट ऊपर की मंजिल में चली जाती हैं। मैं कुछ समझ नहीं पाता। जल्दी ही हाथ में आधा किलो की लड्डू जैसी कोई चीज़ लाकर वे मुस्कुराते हुये मेरे हाथों में देती हुई प्यार से कहती हैं लो यह .........।

तभी मैं जाग जाता हूँ और उस अलौकिक दृश्य का पटाक्षेप हो जाता है। इसे हम हिन्दी में लेखन कार्य की भागवत स्वीकृति मानते हैं। बाद में जब वह पुस्तक छप कर तैय्यार हुई तो उसे लेकर हम पाण्डिचेरी गये और माँ के चरणों में समर्पित किया। माँ ने बड़े अक्षरों में Blessings लिख कर अपने हस्ताक्षर किये।

तभी माँ मन्दिर में हिन्दी भाषा में लेखन कार्य शुरू हुआ जिन्हें प्रकाशित करने के लिये ‘माँ मन्दिर जन कल्याण ट्रस्ट’ का जन्म हुआ। आज तक लगभग 20 छोटी बड़ी पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है और लेखन तथा प्रकाशन का कार्य मित्रों और सहयोगियों की सहायता से अनवरत रूप से चल रहा है।

श्रीमाँ स्वयं चाहती थीं कि उनके योग के बारे में पुस्तकें काफी सरल भाषा में मस्तिष्क के बजाय हृदय से लिखी जायँ जैसी माँ ने स्वयं ही ‘The Science of Living’ में लिखी है। उन्हें उपदेश पसंद नहीं था न ही दार्शनिकता। उनका विश्वास था कि उनके कार्य के बारे में सुन्दर कहानी के रूप में सारी चीज़ों को सरल भाषा में कोई लिखेगा। वे कहती थीं कि अगर पुस्तक एक दो व्यक्तियों की आत्मा को भी छू लेती है तो इसे बहुत अच्छा परिणाम कहा जाएगा।

श्रीअरविन्द और माताजी के पूर्ण योग, उनकी कठिन साधना और उनके कार्यों को समझने के लिये आरंभ करने वाले व्यक्ति को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उसे यही समझ नहीं आता कि वह आरंभ कहाँ से करे। वह भूल से Life Divine या Savitri उठा लेता है या Synthesis of Yoga पढ़ने लगता है और थोड़ी देर में ही सो जाता है। तब उन्हें आलमारी में सजा कर रख देता है। इन नये जिज्ञासुओं के लिये सुबोध भाषा में एक संक्षेपिका लिखने की बड़ी आवश्यकता है और यह भी बताना जरूरी है कि उन्हें किन पुस्तकों से शुरू करना चाहिये। हमारा ट्रस्ट इसी दिशा में कार्य कर रहा है। श्रीअरविन्द की लगभग सभी पुस्तकें ‘आर्य’ में लिखे उनके लेखों के ही संग्रह हैं। ये सभी लेख अपने आप में पूर्ण हैं कहीं भी योग का प्रारंभ, मध्य और अन्त नहीं है। दूसरे लेख चेतना के विभिन्न स्तरों से समय समय पर लिखे गये हैं और बौद्धिकता के शिखर को छूते हैं। पूर्ण योग को समझने के लिये उनके दर्शन में जाने की आवश्यकता नहीं है। सीधे हृदय में उतारने की आवश्यकता है इसलिये कभी उन्होंने कहा था कि उन्होंने कुछ लोगों को उपदेश देने के लिये नहीं लिखा है बल्कि उनके मन को शान्त करने के लिये लिखा है। एक बार मन शान्त हो जाय तभी उनके योग को प्रारंभ किया जा सकता है।    

 

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