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चैत्य पुरुष को कैसे जगाये ?

    

    

....गतांक से आगे

चैत्य पुरुष का विकास

       चैत्य पुरुष का किसी प्रकार जागरण तो हो जाता है पर उसे सदा जागृत रख पाना कठिन होता है। यदि साधना में ढील हुई और बाह्य जीवन पुनः हावी हुआ तो चैत्य पुनः त्रिगुणात्मक प्रकृति के पीछे चला जाता है। उसे दुबारा जगाने व व्यक्तित्व के सामने ले आने में तब दूनी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। भौतिक जीवन के प्रति मनुष्य का लगाव इतना अधिक होता है और वर्तमान भोगवादी युग में पद, प्रतिष्ठा प्रदर्शन और पैसे के बढ़ते मोह और तथाकथित जीवन स्तर केा ऊँचा उठाने की प्रतिस्पर्धा ने मनुष्य केा इतना व्यस्त बना दिया है कि वह रात दिन इच्छाओं के पीछे भागता ही रहता है। किसी सत्संग या आत्मिक संयोग में उसका अन्तर्मन जब कभी आकर्षित हो जाता है तो चैत्य पुरुष जागृत हो जाता है पर यह उत्साह अधिक दिन ठहर  नहीं पाता और व्यक्ति पुनः अपने ही बनाए जंजालों में उलझ जाता है। रात दिन की इस दौड़ में न किसी को क्षण भर के लिए ऐसा एकांत मिल पाता जहां वह अपनी अन्तरात्मा से बात कर सके न इतना समय मिल पाता कि फिर से अपने को सहेज सके। ‘क्या करूं समय ही नहीं मिलता’ यही उत्तर उसके ओंठ में तैयार मिलता है। लेकिन प्रश्न यहां जितना समय का नहीं है उतना प्राथमिकता का है। अभी मनुष्य के लिए ‘सत्य’ जीवन की कोई प्राथमिकता नहीं बन पाया है। बाहरी जीवन की पश्चिमी चकाचौंध ने भागवत जीवन को रद्दी के टोकरे में डाल दिया है और बाह्य के भीतर ही सारे सुख व शान्ति को पाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा है। इसलिए प्राथमिकताओं को बदलना होगा। बाह्य और आन्तरिक जीवन के लिए 24 घण्टे के समय को उचित अनुपात में बाँटना होगा। शुरू शुरू में यह बहुत आवश्यक होता है, बाद में साधना में रस आने के बाद यह अनुपात आत्मा के पक्ष में अपने आप बढ़ता जएगा। श्रीअरविन्द और माता जी से संबन्धित साहित्य का रुचि पूर्वक अध्ययन, सत्संग, संस्मरणों का श्रवण, प्रेरणा के श्रोतों से नित्य का संपर्क और दृढ़ संकल्प उदासीनता और पथ की नीरस्ता को तोड़ते हैं। अन्दर की मिठास जितनी ही बढ़ती है, श्रद्धा और समर्पण के भाव भी उतने ही तीव्र होते हैं। जप और ध्यान, प्रारम्भ में चाहे जितने भी उबाऊ और यान्त्रिक लगे, निरन्तर के अभ्यास द्वारा आगे चलकर परमानन्द के स्रोत बन जाते हैं। इसमें समय तो लगता है। भगवान बनिया की दूकान का सौदा नहीं होता कि पैसा देते ही चीज मिल जाय। धैर्य और अध्यवसाय के साथ अपने इष्ट पर अटल विश्वास के साथ समर्पण की आहुति देते रहने से चैत्य की आग हमेशा प्रज्वलित रहती है। जीवन को एक यज्ञ मान कर इस हवि को अर्पित करने में कोताही यदि न होगी तो चैत्य की आग न बुझेगी।

       प्रेम एकतरफा कभी नहीं होता। बच्चे को मां के निकटता की जितनी आवश्यकता है उतनी ही, या उससे भी अधिक मां को अपने बच्चे के सामीप्य की आवश्यकता है इसलिये प्रयास का दूना चौगुना प्रसाद हमेशा ही साधक की झोली में आता है। कभी कभी प्राण व मन चैत्य के विरुद्ध अपनी मनमौजी मागों के लिए विद्रोह कर बैठते हैं। वे समर्पण के लिए यह शर्त रखते हैं कि पहले उनकी मांगे पूरी हों। मांगे पूरी न होने पर साधना की उर्वर भूमि को वे ऊसर में परिणित कर देते हैं। केवल तीव्र पुकार और अध्यवसाय ही वह उपाय है जो भागवत सत्य को हस्तक्षेप के लिए तैयार कर देता है। Descent होते ही सारी नीरसता विद्रोह और बहाने समाप्त हो जाते हैं। अतयेव ध्यान को इतनी गहराई तक ले जाना चाहिए कि ध्यान के समय ही शक्ति का अवतरण प्रतिदिन की उपलब्धि बन जाय। तब कभी भी नीरसता नहीं आएगी। लगातार के शक्ति अवतरण से चैत्य पुरुष सूर्य बनकर जगमगाता रहता है। चलते फिरते, काम करते यहां तक कि व्यस्तताओं में भी यह भागवत उपस्थिति का ज्ञान कराता रहता है। मातृस्मरण, हर समय मां मंत्र का जप अभीप्सा की आग को जलाये रखते हैं और भागवती माता चैत्यपुरुष को चुम्बक की तरह अपनी ओर खींचती रहती है-

           (She is) The magnet of our difficult ascent

           The Sun from which we kindle all our suns.

निष्कर्ष - चैत्य पुरुष के जागरण के लिए निम्नलिखित बातें अपरिहार्य हैं-

1  जगत और जीवन को दिव्य बनाना, जिसके लिये भागवत शक्ति उतर चुकी है। इस शक्ति का वाहक बनने के लिए साधक की ओर से विश्वास के साथ प्रार्थना हमेशा चलती रहनी चाहिए।

2  श्रीअरविन्द और श्रीमां के प्रति अटूट निष्ठा, जिन्होंने इस शक्ति को पृथ्वी में उतारा।

3  अभीप्सा की आग जलाए रखना।

4  नित्य प्रति जप और ध्यान का संकल्प।

5  श्रद्धा और समर्पण। समर्पण शरीर प्राण, मन और चैत्य चारों के द्वारा होना चाहिए।

6  चैत्य पुरुष के जागरण के साथ शक्ति के अवतरण (Descent) के लिए प्रार्थना करना।

7  भगवान की सतत् उपस्थिति को बनाए रखना।

8  श्रीमां के ग्रन्थ ‘माता जी की बातचीत’ का कुछ अंश भक्ति भाव से रोज पढ़ना।

9  ढेर सारा उत्साह-कठिनाइयों से निरुत्साहित न होना।

10 सत्संग और पाठचक्रों में हमेशा उपस्थित होना।

 

समाप्त

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