Ma Mandir Sri Aurobindogram

Ma mandir Sri Aurobindo Ashram Rewa

अवतरण और चेतना का दिव्य रूपान्तर

 

क्ति के अवतरण का उद्देश्य ही है जीवन का दिव्य रूपान्तर। भगवान् का मिशन ही है धरती पर के जीवन को स्वर्ग जैसा सुन्दर बनाना। मानवीय चेतना की तैयारी में भागवत प्रेम धीरे-धीरे क्रम से धरती की चेतना में उतरता है और चूँकि मानव चेतना में विभिन्न परतें हैं - ग्रहणशील, कम ग्रहणशील और अग्रहणशील तामसिक और कठोर इसलिये अवतरण करने वाली शक्ति और प्रेम भी ग्रहणशीलता के अनुपात में, कम उँचाई, अधिक उँचाई और सर्वोच्च शिखर अर्थात् अतिमानस से उतरते हैं। मोटे तौर पर हमारी सत्ता में आत्मा, मन, प्राण और शरीर की विभिन्न चेतनायें हैं। इनमें अकेले शरीर में ही अवचेतन से द्रव्य (Matter) के निश्चेतन तक कितनी ही परतें विद्यमान हैं। इस घोर निश्चेतन अर्थात् तमोगुणी जड़ता की पेंदी में सुप्रामेण्टल अर्थात् अतिमानस का जमा हुआ शुद्ध द्रव्य मौजूद है जहाँ से सारी सृष्टि उत्पन्न और विकसित होती है। जीवन की अदिव्यता का कारण है हमारे भीतर विभिन्न चेतनाओं के रूप में बुरे संस्कारों और विकारों की परत दर परत जमावट। जीवन के सभी स्तरों में किसी न किसी प्रकार की विकृति मौजूद है। मन में अनेकों झूठी मान्यतायें, आदतें, अहंमन्यतायें, प्रदर्शन और पाखण्ड की प्रवृत्तियाँ, प्राण में अंधविश्वास, कट्टरतायें, जातीय व सांप्रदायिक रूढिय़ाँ, आवेश, संवेग, ईष्र्या, क्रोध, वासनायें, शरीर में खान-पान, रहन-सहन, भोग, रूप, रस, गंध, स्पर्श जैसी भूखें मौजूद होती हैं। सबसे नीचे अन्धकार, अज्ञान, मित्थ्यात्व और मृत्यु जैसी दानवी शक्तियाँ अपना डेरा डाले हुये हैं। मन के ऊपर आध्यात्मिक लोक, देव लोक अतिमानस व सच्चिदानन्द के दिव्य लोक हैं। इन सबके प्रभावों के घोल मेल का नाम ही है मानव जीवन। हमारी रीढ़ चेतना के दो विरोधी ध्रुवों-दिव्यता और अदिव्यता को जोड़ती है। अदिव्यता की इस अटूट शृंखला के प्रभावों के कारण जीवन इतना संत्रस्त है। इन्हें दूर करने के सारे धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक साधन अभी तक असफल ही सिद्ध हुये हैं।

श्रीअरविन्द और श्री माँ ने अपने चेतनात्मक अनुसंधान द्वारा यह पता लगाया कि चेतना के उच्चतम शिखर अतिमानस की चेतना को यदि किसी प्रकार नीचे की अदिव्य चेतना के स्तरों पर उतार लिया जाय और वहाँ उसे ठहरा दिया जाय तो जीवन दिव्य हो जायगा और धरती स्वर्ग बन जायगी और यदि कहीं ऊपर के अतिमानस को निश्चेतना में दबे नीचे के अतिमानस से जोड़ दिया जाय तो एक देवोपम सृष्टि का निर्माण हो जायगा। इस अनुसंधान को उन्होंने योग द्वारा कार्यरूप में परिणित करने का अंत तक प्रयास किया और अतिमानस चेतना को धरती और मानव कल्याण के लिये नीचे उतार लाने में सफल भी हो गये पर अधोलोकों में बसा पाना लोगों की ग्रहणशीलता, स्वीकारोक्ति और अभीप्सा पर निर्भर करता है। यह भागवत प्रेम धरती की चेतना में तभी ठहर सकता है जब मनुष्य के भीतर की निम्न से निम्न चेतना भी उसे ग्रहण करना चाहेगी। यही सबसे दुष्कर कार्य है। हमारी अदिव्यतायें और विकृतियों का जीवन भगवान् के दिव्य प्रेम को स्वीकार नहीं करता। अंधकार प्रकाश को ग्रहण नहीं करना चाहता। मृत्यु अमरता के सोम को घूटने से इंकार करती है। यही मनुष्य की वर्तमान समस्या है फिर भी चूँकि दिव्य शिखर में भगवान् का निर्णय मानव जाति के उद्धार का हो चुका है और पृथ्वी को दिव्यता का अनुपम वरदान मिल चुका है इसलिये रूपान्तर का कार्य ग्रहणशीलता के अनुपात में शुरू हो चुका है और चाहे इस कार्य में सदियों का समय लग जाय पर भागवत इच्छा निष्फल नहीं होगी।

प्रेम की इस दिव्य धारा को जीवन के विभिन्न प्रदेशों के साथ जोडऩे के लिये भगवती माता ने मानव शरीर धारण कर मनुष्यों के भीतर चैतन्य शक्ति को ग्रहण करने के लिये चैत्य पुुरुष को हृदयों में जागृत और विकसित किया है। यह चैत्य पुरुष अतिमानस शक्ति का मनुष्य के भीतर एक छोटा सा ट्रांसफार्मर है जो ऊपर से अवतरित होने वाले दिव्य प्रेम को ग्रहण करता है और फिर स्नायु मण्डल के विभिन्न तारों और कोशिकाओं के माध्यम से सत्ता के अँधेरे पक्षों में भगवान् के प्रेम व प्रकाश को संचरित करता है। यह चैत्य पुरुष ही दिव्य जीवन की कुंजी है जो इस युग में मानव जाति को प्रारब्ध के रूप में मिली है और जिसके लिये देवता तरसते हैं।

चैत्य पुरुष शक्ति, प्रेम व भागवत प्रकाश को धारण करते हुये क्रम से मन, प्राण और शरीर से बने त्रिगुणात्मक जीवन को सबसे पहले रूपानतरित करने का प्रयास करता है। इसके लिये बार बार के Descent की आवश्यकता होती है क्योंकि हमारी वासनायें और विकृतियाँ इस अमरता के अमृत का जमकर दुरुपयोग करती हैं और उसे अपनी कूड़ेदानी में बार-बार फेंक देती हैं फिर भी किंचित प्रभाव भी धीरे-धीरे उनकी प्रकृति में परिवर्तन ला देता है। ज्यों ज्यों मंदिर साफ होता जाता है अवतरण नीचे को धँसता जाता है। रूपांतर का कार्य वर्ष दो वर्ष का काम नहीं है। इसमें वर्षों यहाँ तक कि सारा जीवन ही लग जाता है। यह अवतरण त्रिगुणात्मक जीवन की तलहटी में जब पहुँचता है तो रूपांतर की क्रिया एक युद्ध भूमि में परिणित हो जाती है। हमारी अवचेतना और निश्चेतना के प्रदेश असत्, अंधकार, पीड़ा, झूठ, अन्याय, विनाश और मृत्यु के गढ़ हैं जिनका प्रतिनिधित्व अंधकार की प्राणलेवा शक्तियाँ करती हैं। इन्हें ही असुर, दैत्य या वेदों में पणि, बल, वृत्र और यम कहा गया है। ये शक्तियाँ पग पग पर अवतरण को रोकने के लिये युद्ध करती हैं। तब हमारा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाता है। इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये साधक को अर्जुन का गाण्डीव धारण करना पड़ता है और चैत्य-कृष्ण को अपने रथ का सारथी बनाना पड़ता है।

निश्चेतना का यह दुर्गम गढ़ श्रीअरविन्द और श्री माँ के अनुसार नर्क की पेंदी में छिपा हुआ एक अमूल्य खजाना भी है। ये विरोधी दानवी शक्तियाँ वास्तव में इस खजाने की पहरेदार हैं और इसकी रक्षा करने के लिये ही ये जीवन के ऊध्र्वलोकों तक हमला करती हैं। अदिव्यता के घर में परम दिव्यता का खजाना - यह खोज आध्यात्मिक जीवन की सबसे बड़ी खोज है जिसे श्रीअरविन्द और श्री माँ ने पूरा किया।

श्री अरविन्द कहते हैं -

The Inconscient is the superconscient's sleep

Darkness a magic of hidden light.

(A Voice) Entered the invisible and forbidden house

...Where by the miser traffickers of sense

unused guarded beneath Nights' dragon Paws

...Whose priceless value could have saved the World.

अर्थात् ''निश्चेतना का जगत अति चेतना की ही सुसुप्त अवस्था है और अंधकार छिपाये गये परमप्रकाश का जादू है..... खोजी स्पन्दन की वाणी ने एक अदृश्य और वर्जित घर में प्रवेश किया जहाँ उसे महान दिवस का खजाना मिल गया और जिसे वासना के कंजूस पणिक खर्च न कर महारात्रि के विकराल पंजे के नीचे दबाये पहरा दे रहे थे। यदि यह खजाना छिपा न होता तो इस अमूल्य निधि (सत्य के प्रकाश) से संसार को ज्ञान की गरीबी से बचा लिया गया होता।

निश्चेतना का यह साम्राज्य False matter का राज्य है। Matter अपने मूल में विशुद्ध चैतन्य अर्थात् अतिमानस ही है लेकिन इसे भौतिक मन ने अज्ञान के तमस का चश्मा लगाकर अशुद्ध (false) बना डाला। यह भौतिक मन कीचड़ जैसी दीवाल या चश्मा है जिसके माध्यम से देखने पर सारा कुछ जो सुन्दर था वह असुन्दर में बदल गया। यही हमारे जीवन की सबसे जटिल और मायावी समस्या है। इसके कारण ही चेतना की गहराई में सारी अच्छाइयाँ बुराइयों में, सारा देवत्व असुरत्व में बदल गया। जीवन मृत्यु में बदल गया। यदि इस दीवाल को किसी प्रकार पार कर लिया जाय तो जीवन और मृत्यु में कोई अंतर नहीं रह जाता। सारा भ्रम दूर हो जाता है। मृत्यु का स्थान अमरत्व और असत् का स्थान सत् ले लेता है। सत्ता के छोर में Material Supermind मिल जाता है और शिखर की Spirit पेंदी के Matter से मिल जाती है।

इसलिये सारी समस्या है इस भौतिक मन (Physical Mind) की दीवाल को ढहाने की अर्थात् मन के बुने इस काले जाल या चश्मे को हटाने की। प्रकृति स्वयं इस दैवनिर्दिष्ट कार्य को धीरे-धीरे अपने ढंग से कर रही है और सारा विकास इसी दिशा की ओर जा रहा है पर प्रकृति को इस कार्य में लाखों करोड़ों वर्ष लग सकते हैं। Descent की शक्ति से इसे कुछ सौ वर्षों में ही पूरा किया जा सकता है। भगवान् की कृपा ने विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने के लिये ही हस्तक्षेप किया है। Descent इसी कृपापूर्ण हस्तक्षेप का परिणाम है। इस परमशक्ति को धारण करके योद्धा साधक भगवान् के इस कार्य को पूरा करने के लिये युद्ध के मैदान में कूदते हैं और भौतिक मन के अँधेरे जगत् में धावा बोलते हैं। यहीं यह योग कठिन युद्ध बन जाता है जिसे हर कोई नहीं लड़ सकता। माँ योद्धा साधकों का चुनाव करके अपने रणबाँकुरों को ही इस संघर्ष में झोंकती है और स्वयं ही सेनापति बनकर Descent के रूप में अपने वज्र से कीचड़ की कठोर दीवाल को गिराने का अभियान शुरू करती है। विरोधी शक्तियाँ भौतिक मन की ही कौरवी शक्तियाँ हैं जो जानवरों व मनुष्यों को ही अपना यंत्र बनाती हैं। ये सत्तायें वैसी मानवेतर नहीं होतीं जैसा काल्पनिक चित्रों में विकराल रूप देकर दिखाया जाता है। निश्चेतन में साधना के पहुँचते ही अर्थात् Descent के वज्र के गहराई में जाते ही जानवर, आदमी, पड़ोसी सभी चीजें आक्रामक हो जाती हैं। सारी कठिनाइयाँ एक साथ टूट पड़ती हैं। माता जी कहती हैं कि यही श्रीअरविन्द और उनके साथ घटा। पर बिना इस युद्ध को लड़े और विरोधों पर विजय पाये रूपान्तर पूर्ण नहीं हो सकता। 31 तमस को तोडऩे के लिये Descent का प्रयोग सब्बल के रूप में करना पड़ता है। और लड़ाई चाहे जितनी लम्बी चले, इस तमस को तोडऩा अवश्यंभावी है। माँ के अनुसार यह भगवान् की इच्छा है और उसे पूरा करने का यही समय है। माँ और श्रीअरविन्द दोनों ने इस युद्ध में अपनी बलि दी है और तमस में छेद हो चुका है। मानव जाति के रणबाँकुरों को उन्होंने बाकी के कार्य को पूरा करने में सहयोग के लिये आह्वान किया है। लोगों को इस यज्ञ में भाग लेने से कतराना नहीं चाहिए क्योंकि इस संघर्ष में जितना कष्ट है उससे सहस्र गुना कृपा और क्षण-क्षण में माँ का अकल्पनीय दुलार व भगवान् की सतत् उपस्थिति, योद्धा साधक को धन्य कर देती है।

 

००००

........क्रमशः

 

 

Rounded Rectangle: सम्पादकीय 
Rounded Rectangle: चैत्य पुरुष कैसे जगाये
Rounded Rectangle: सावित्री अमृत सरिताएं
Rounded Rectangle: सावित्री (हिंदी रूपांतर)
Rounded Rectangle: कवितायें
Rounded Rectangle: Work and Teaching
Shri Surendranath Jauhar (श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर) Sri Aurobindo Ashram Delhi Branchmamandir.com, sri aurobindo ashram, rewaRounded Rectangle: अवतरण और चेतना का दिव्य रूपान्तर
Rounded Rectangle: पिछले अंक
Rounded Rectangle: श्रीअरविन्द का जीवन एवं योग
Divyanter Sri Aurobindo Ashram Rewa e-magazineSri Aurobindo Ashram Sri Aurobindo Ashram Ma Mandir RewaSri Aurobindo mamandir.comMa Mandir PublicationsSavitri Hindi Translation