Ma Mandir Sri Aurobindogram

Ma mandir Sri Aurobindo Ashram Rewa

एक महामानव की महायात्रा

डॉ0 के0एन0 वर्मा

 

श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर एक ऐसे महामानव थे जिनका आविर्भाव उस समय हुआ जब पृथ्वी पर भगवान् की पदयात्रा चल रही थी। श्रीअरविन्द और श्रीमाँ की पृथ्वी पर उपस्थिति से एक नये युग का प्रारंभ हो चुका था। अतिमानस के प्रकाश को वहन कर उसे जड़ द्रव्य की अचेतन गहराई तक ले जाने के लिये दैवी शक्तियाँ मनुष्य का रूप धारण कर पृथ्वी में लगातार उतर रही थीं। वे अपने उस स्रोत से जुड़ने के लिये अलग-अलग ढंग से आलोक पथ की खोज में चल पड़ी थीं। जिसके आह्नान पर ये आत्मायें धरती पर कूदीं। श्रीअरविन्द कहते हैं -

I saw the omnipotents' flaming pioneers

Over the heavenly verge which turns towards life

Come crowding down the amber stairs of birth.

Fore runners of a divine multitude.

— Savitri

धरती पर आते ही आत्मिक लोक की दृष्टि ओझल हो जाती है। उद्देश्य भूल जाते हैं। स्मृति खो जाती है। पथ अदृश्य हो जाता है। इन्हें नये सिरे से खोजना पड़ता है जिसके लिये जीवन भर यात्रायें करनी पड़ती हैं और भवितव्यता भाग्य बनकर खोजी को भटकाती है -

A seeker of hidden meanings in life’s' forms

of the great Mother's wide unchartered will

It's paths are found for him by silent fate.

— Savitri

अतएव फ़क़ीर को भी अपने हिस्से की यात्रायें करनी पड़ीं। वे इस पदयात्रा की अगली पंक्ति में शामिल हुये और अपने जन्म से लेकर जीवन की अंतिम घड़ी तक यात्रा ही करते रहे। उनकी मंजिल उस परम सत्य का वाहक बनकर अपनी प्रत्येक सांस में ढोना था जिसका दिव्यावतरण पृथ्वी में हो रहा था। लेकिन इनकी यात्रायें सामान्य यात्रायें नहीं थीं। ये उनकी ऊँचाई के हिसाब से लम्बी थीं और शक्ति के हिसाब से दुर्गम ही नहीं, अलौकिक और रोमांचक थीं। वे जीवनभर चलते रहे। पहले मंजिल को पाने के लिये चले। फिर मंजिल से मंजिलों को छूने के लिये चलते रहे। उनकी इस महायात्रा की कहानियाँ इतनी अद्भुत और विस्मयकारी हैं कि हमें दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है। उनकी कुछ यात्रायें जिन्होंने अपना इतिहास गढ़ा, ये हैं -

झेलम से पाण्डिचेरी तक की यात्रा

जौहर साहब पंजाब प्रांत के जिला झेलम के एक छोटे से पहाड़ी गाँव बहाली के निवासी थे। उनके पिता कहानचन्द बन्दोवस्त विभाग में गिरदावर कानूनगो के एक मामूली पद पर कार्यरत थे। पालन-पोषण ग्रामीण वातावरण के बहुत पिछड़े इलाके में अतिसामान्य व्यक्ति की तरह हुआ। इस गुमनाम इलाके में जाने योग्य जीवन के दर्शन तक दुर्लभ थे। सभ्यता और संस्कृति से कोसों दूर खपरैल छप्पर के नीचे उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। भाग्य का चक्कर कुछ ऐसा चला कि पिता की एक मामूली डाँट पर घर छोड़ दिया और गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन में कूद पड़ने के लिये भाग कर दिल्ली आ गये। गाँव का निवासी दिल्ली जैसे अंतर्राष्ट्रीय नगरी में एक असभ्य प्राणी से अधिक कुछ नहीं होता चाहे भले ही उसके हृदय में सम्राटों का सम्राट बसता हो। अतयेव इस अजनबी को जीविका के लिये दर-दर की ठोंकरें खानी पड़ीं। कंगाली में कई बार आटा गीला हुआ पर तकदीर के सिकन्दर - सिकन्दर लाल ने जीवन में कभी हार नहीं मानी। अरमान इतने ऊँचे थे कि एक ओर पेट की रोटी के लिये युद्ध तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार से युद्ध - इन दोनों मोर्चों पर वर्षों तक वे लड़ते रहे। आर्यकुमार सभा और दिल्ली कांग्रेस कमेटी दोनों ही अखिल भारतीय संस्थाओं में काम करते हुये अपनी सचाई, निष्ठा और कर्मठता को तराशा और अपने चरित्र को तपे हुये सोने की तरह निखारा। एक दिन महात्मा गाँधी के प्रधान कार्यकर्त्ताओं में उनकी गिनती होने लगी। साहस, बहादुरी, राष्ट्रभक्ति और उनकी संकल्पशक्ति ने उन्हें राजनेताओं के शिखर पर आरूढ़ करा दिया।

लेकिन अपनी इस सफलता की चोटी पर लात लगाकर उन्होंने फिर जीवन की दिशा बदल दी। अपनी यात्रा का पथ बाहर से भीतर की ओर मोड़ दिया। उन्होंने आत्मा की उस आवाज को सुना जिसके भीतर से उनके जीवन की नियति पुकार रही थी। मिट्टी के घरौंधे से दिल्ली के कुतुब तक और कुतुब से छलांग लगाकर देश की पूरी लम्बाई को पार करते हुये एक ही उड़ान में पाण्डिचेरी पहुँच कर उन्होंने जगन्माता के चरणों को पकड़ लिया जहाँ उन्हीं के शब्दों में मैंने अपना हृदय खो दिया और आत्मा तथा जीवन पा लिया।

बस जिन्दगी का आखिरी रंग चढ़ गया। मंजिल मिल गई।  ललाट की वह इबारत दिख गई, जिसके लिये यह आत्मा देव लोक से पृथ्वी पर कूदी थी।

फुटपाथ के गड्ढे से कंचनचिंगा के शिखर तक की यात्रा

दिल्ली जैसी अनजानी दुनिया में पैर रखते ही गाँव की गली में गिल्ली खेलने वाले सिकन्दर लाल की सिट्टी-पिट्टी भूल गई। जीवन की यथार्थता को पहली बार इतने पास से उन्होंने देखा। घबराहट तो हुई पर संकल्प की चट्टान ने हमेशा ही भीतर से उन्हें ढाढ़स बँधाया। जीवन एक संघर्ष है, संघर्ष करो जैसी एक ध्वनि उन्हें आश्वस्त कर रही थी। अतएव दो रुपये की उधार की पूँजी से स्टेशनरी के कुछ सामान, चूना, पान और जला हुआ मोबिल ऑयल की दुकान लगाकर वे दिल्ली के चलतू फुटपाथ पर बैठ गये। घण्टे भर में दो पैसे से लेकर एक आने तक मुनाफा मिल जाता। उसमें से एक पैसे की पाँच रोटियाँ, एक पाई में एक लोटा मट्ठा और एक धेला में सेर भर नमक और मिर्च तक मिल जाता था। इसी आय से रात-दिन भगवान् का भोग लगने लगा। परिश्रम का पसीना कितना मीठा होता है इसका पता उन्हें तब लगता जब गाय की सार में खाट पर बैठकर वे मट्ठा रोटी को प्रेम से रात जेमते। दुकान बढ़ी तो ठेला ले लिया और कोयला और चूना बेंचने लगे। टाइपिंग सीख ली झाड़ू लगाने की मजदूरी से। तब वे बाबू बन गये। कांग्रेस कमेटी में रात-दिन काम करते हुये उनकी ईमानदारी ने ख्याति प्राप्त नेताओं का चहेता बना दिया। एक दिन उनके पीछे 50,000 की भीड़ चल पड़ी और इस दमदार नेता ने अंगरेजी पुलीस को चकमा देते हुए चाँदनी चौक में भारत की पूर्ण आज़ादी का उस भीड़ में घोषणा-पत्र पढ़कर शंख फूँक दिया। यह 1930 की घटना है।

अपने पुरुषार्थ के बल पर अब एक के बाद एक सफलता की चोटी पर उन्होंने चढ़ना शुरू किया। जिस व्यवसाय में ही वे हाथ लगा देते, उसमें ही धन बरसने लगता। 1932 में पण्डित कन्हैया लाल पुंज के साथ साझे में व्यापार शुरू करने के लिये एक फर्म का गठन किया। धीरे-धीरे वे स्वयं इसके मालिक बन गये। कोयले और चूने का धंधा ऐसा चला कि वे कम्पनी के संचालक बन गये। यही आगे चलकर सुरेन्दर से सण्डर्सन कम्पनी बन गई। जिसका कारोबार कटनी से लेकर कलकत्ता तक फैल गया। फुटपाथ की इकन्नी की कमाई अब करोड़ों की गिनती तक पहुँच गई। जौहर साहब दुनिया की दृष्टि में जौहरी बन गये। दिल्ली में उन्होंने तीसों एकड़ जमीन खरीद ली। कुतुब के रास्ते पर एक आलीशान बँगला भी बन गया। जिसके दरवाजे पर कार खड़ी होने लगी। यह बात अलग है कि कंचनचिंगा की इस ऊँचाई पर पहुँचकर भी एकक्षण के लिये भी फुटपाथ की निचाई पर बैठने वाली जिन्दगी की सहजता को सहेजना उन्होंने नहीं भुलाया। एक अदृश्य शक्ति उन्हें किसी अन्य चोटी पर चढ़ने के लिये ठेले जा रही थी। कोई अद्भुत छाया उनके आगे पीछे चल रही थी। इस अनसुनी आहट को पा लेने की एक जिज्ञासा धीरे-धीरे उनके भीतर जन्म ले रही थी। भरे-पूरे जलाशय में चुपके-चुपके कभी न बुझने वाली प्यास  अपने ओंठ फैला रही थी। इसी प्यास ने उन्हें इस शीशमहल की गद्दी से उतार कर भगवान् का चौकीदार बनाया। और इस चौकीदारी पर देवताओं को ईर्ष्या होने लगी।

गोशाला के झाड़ू से श्रीअरविन्दाश्रम के संचालन तक की यात्रा

दिल्ली जैसे शहर में रात को सिर ढकने के लिये गाँव के आदमी को कोई छप्पर नहीं मिल पाता। इकन्नी की कमाई से उनका पेट तो किसी तरह चलने लगा था पर रात को वे सोते कहाँ? एक दिन झाड़ू लगा देने के पारिश्रमिक बतौर उन्हें एक घर में छप्पर के नीचे गाय के पीछे अपनी खाट डाल लेने की अनुमति उस मकान मालिक से मिल गई। जौहर साहब ने बताया कि कभी-कभी सोते समय गाय उनके ऊपर गोबर और पेशाब भी कर दिया करती थी। पर गाय तो गोमाता है और गोमूत्र में कितनों ही रोगों को दूर करने की क्षमता होती है। अतयेव उनके स्वास्थ्य में कभी गिरावट नहीं आई। वे अधिक स्वस्थ रहने लगे और आर्य समाज और कांग्रेस कमेटी के कार्यों को द्विगुणित उत्साह और ऊर्जा से पूरा करने लगे। गरीबी और सामान्य जीवन अहंविहीन व्यक्तित्व के रचना की सर्वोत्तम पाठशाला होता है। अभावग्रस्त काया और कठिनाइयाँ ही मनुष्य को कर्मठ बनाती हैं। जौहर साहब ने लम्बे समय तक इस पाठशाला में शिक्षा ग्रहण की। इसीलिये वैभव के मंचों पर भी अपने पैबन्द लगे कोट को पहनने में उन्होंने अपने को कभी असहज अनुभव नहीं किया। उपलब्धियों के अपने शिखर को भोले-भाले ग्रामीणों की चौपाल में झुकाकर एक किसान और मजदूर की ठेठ भाषा में बतियाते थे और उनके दर्द में प्रतिभागी बन जाते थे। इस सहजता, कर्मठता और पसीने की कमाई ने उनके भीतर योग का सहजमार्ग तैयार कर दिया। बिना ध्यान धारणा और प्राणायाम जैसी मानसिक कसरतों के ही वे श्रीअरविन्द योग में अनजाने ही दीक्षित होते रहे और एक दिन बिना किसी मुहूर्त के ही छापामार कर जगज्जननी पर अधिकार करके अपना झण्डा गाड़ दिया। इस निष्कष्टक राज्य में जीवनभर वे राज्य करते रहे - आज भी कर रहे हैं। पहली ही दृष्टि में दृष्टा ने इन्हें पहचान लिया और अपना खजाना सौंप दिया। किसने यह स्वप्न देखा था कि कोयले और चूने को ठेले में बेंचने वाले एक श्रमण का श्रमयोग दिल्ली जैसी राजधानी के हृदय में श्रीअरविन्दाश्रम का संचालन करेगा जहाँ सारी दुनिया के लोग आकर कर्मभूमि की बोलती इसी वेदी की परिक्रमा करेंगे? एक देवता का यह श्रम बिना बोले ही श्रीअरविन्द योग के सारे सूत्रों को पूरा समझा देता है।

बन्दीगृह की जंजीरों से मुक्ताकाश में उड़ान तक की यात्रा

राष्ट्रीय आन्दोलन में जौहर ने जौहर किया। एक दमदार पंजाबी सिख की तरह उन्होंने आततायी पर हर कदम पर प्रहार किया। पूरी निर्भीकता के साथ असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। विदेशी माल और वस्त्रों की होली दिल्ली के चौराहों में जलाई। अंगरेजी हुकूमत पर चलने वाली पुलीस के सुपरिण्टेण्डेण्ट की पिटाई की। जेल के सींकचों के भीतर जेलर की नींद हराम कर दी जिसके कारण उन्हें एक छोटी सी कोठरी के भीतर हाथ पैर में बेड़ियाँ डालकर बन्द रखा जाता था और प्रति दिन चक्की में इनसे 18 सेर अनाज पिसवाया जाता था। इस परतंत्रता की कठोर यातना में ही उनके भीतर आत्मा की मुक्ति का अनन्त आकाश गढ़ा जा रहा था। इस काल कोठरी से ही एक दिन उनकी आत्मा ने श्रीअरविन्द को पुकारा। एक लम्बी चिट्ठी लिखकर अपने मुकद्दमे की पूरी स्थिति से उन्हें अवगत कराकर परामर्श चाहा। यह परामर्श ही उनके लिये गुरुमंत्र बन गया। उन्होंने निर्णय ले लिया। यात्रा का पथ बदल गया। बाहरी राजनीतिक स्वतंत्रता के स्थान पर आत्मिक स्वतंत्रता के क्षितिज की पहली झलक मिल गई। भीतर में कभी न शान्त होने वाली एक हलचल ने उन्हें पूरी तरह अधिकृत कर लिया। राजनीति से संन्यास लेकर अनन्त के पथ पर वे चल पडे़।

1939 में भारत दर्शन की यात्रा में उन्हें पाण्डिचेरी का पड़ाव मिला। संध्याकालीन ध्यान के समय श्रीमाँ की मोहनी छवि पर उनकी आत्मा लुट गई। एक योरोपियन के सम्मुख कभी सिर न झुकाने वाला स्वाभिमानी मस्तक दण्डायमान हो गया, ‘पाहिमाम् पाहिमाम्। लगा अतीत का सारा रहस्य खुल गया। प्यास को अपना समुन्दर मिल गया। हृदय को अपना स्पन्दन प्राप्त हो गया। खोजी मन को अपना बसेरा दिख गया। अभीप्सा को लौ की दिशा मिल गई।

और भाव की विभोरता में पूरी रात अनसोयी बीत गई। सांसों में मंत्र झंकृत होने लगा - माँ माँ माँ ऽ ऽ ऽ। यह अजपा जप शुरू हो गया। सुबह दिल्ली के लिये चल तो पड़े पर अपने हृदय को वहीं छोड़कर उन्हीं के शब्दों में,ऐसा लगा कि मेरे जीवन का खेल निश्चित हो गया। मैं जा तो रहा था परन्तु वापस आने के लिये। लगा मुझे अनमोल मोती मिल गया, ऐसा मोती जिसे पूरी जिन्दगी की मेहनत के बाद भी कोई पा नहीं सकता।

अमीरी से फ़क़ीरी तक यात्रा

कहावत है कि वह अमीर-अमीर नहीं जिसमें फ़क़ीरी न हो और वह फ़क़ीर-फ़क़ीर नहीं जिसमें अमीरी न हो। जौहर साहब के जीवन में यह कहावत शत-प्रतिशत चरितार्थ होती है। निपट अकिंचनता और गरीबी से वे किस प्रकार कदम-कदम ऊपर उठे उसकी झलक ऊपर की कहानी में मिल जाती है। गरीबी में क्षणभर के लिये भी उनमें वह दिखी नहीं क्योंकि मन में वे हमेशा ही सिकन्दर रहे। निष्कर्म कर्म की कर्मठता और सच्चाई ने उन्हें सिकन्दर से एक दिन सुरेन्द्र बना दिया। और सुरेन्द्र के पास धन-दौलत, वैभव और स्वर्गीय सौन्दर्य - सबकुछ उपलब्ध हो गया। बडे़-बडे़ मंत्री, चीफ जस्टिस, कलाकार, विश्वविद्यालय के कुलपति, प्राध्यापक, विद्वान  और मण्डलाधीशों की लम्बी कतारें उनके दरबार में दस्तक देने लगीं। तरह-तरह के व्यंजन, मिठाइयों और देव-दुर्लभ पकवानों के टोकरे चढ़ोत्री में चारों ओर से आने लगे। विदेशियों की टोलियाँ भी आत्मा का एक बोल सुनने के लिये वननिवास की चढ़ाई चढ़ने लगीं। संगीत, भजन और शिविरों की पूरी शृंखलायें हिमालय की इस मनोरमवादी में अनवरत रूप से जमने लगीं।

लेकिन इस सारे वैभव के भीतर एक निर्लिप्त फ़क़ीरी का वैराग्य चैतन्य के मंदिर में रात-दिन आरती लिये खड़ा था। उनका आसन रामकृष्ण परमहंस की खटिया का ही प्रारूप था। इस खटिया को न दंभ छू सकता था, न वैभव का स्वांग। त्वदीयम् वस्तु मीराम्बिकाम् तुभ्यमेव समर्पये के साथ हर समय उनका भोग चलता रहता था। इन्द्रलोकी सम्पदा का त्याग, पद-प्रतिष्ठा का त्याग, मान-सम्मान का त्याग, तन-मन अभिमान का त्याग, समस्त परिवार का त्याग, कर्त्तृत्व का त्याग और वे जो भी थे उसका पूर्ण परित्याग - ऐसा त्याग वर्तमान के पूरे विस्तार में कहीं देखने को नहीं मिलता। पांच मंजिली इमारत की गद्दी में भगवान् और भगवती के खड़ाऊँ रखकर बगल की कुटिया में यह फ़क़ीर अपनी जिन्दंगी के दोनों छोरों को आपस में मिलाता रहा। शरीर के पोर-पोर में संसारभर का कूड़ा कफ बन-बन कर निकलता रहा। इस जर्जर शरीर के अस्थि-पिंजर से युग का ज़हर बहता रहा।

माँ के घुटनों पर माथा टेककर अपनी सिसकियों के सहारे एक दिन भगवान से पूछ लिया - मुझे इतना कष्ट क्यों दिया जा रहा है। मैं न योग जानता, न पूजा। तुम्हारे मोटे ग्रंथों को पढ़ने की मुझमें न हिम्मत है न बुद्धि। तब मैं क्या करूँ?’ उत्तर था - तुम जो भी कर रहे हो वह तुम्हारे हाथों से मैं ही कर रही हूँ। तुम्हारे कार्यों से मुझे पूरा संतोष है। तुम देने के लिये ही पैदा हुये हो। इन कष्टों के माध्यम से भी तुम हमारा योग ही कर रहे हो। सहो और देते जाओ।

उनकी फ़क़ीरी में चुम्बकीय आकर्षण था। प्रत्येक आत्मा उनकी पकड़ में आ जाती थी। जहाँ भी जाते थे, माँ का मंदिर बना देते थे। ये मंदिर कितनी ही आत्माओं के भीतर आज उठते दिख रहे हैं। इन्हीं मंदिरों के गृह में आज नये जीवन की नर्सरी रोपी जा रही है।

यात्रा का अभी अंत नहीं हुआ है। वह अदृश्य में चल रही है। दृश्य में भी चल रही है। इस महायात्रा में मेरा भी एक पुष्प।

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