Ma Mandir Sri Aurobindogram

Ma mandir Sri Aurobindo Ashram Rewa

ध्यान

....गतांक से आगे

 

 

प्रश्न - यह तो ठीक है भागवत्  चेतना का अवतरण एक आत्मबोध और ठोस अनुभूति है पर इसे प्राप्त कैसे किया जाय ?

उत्तर - अभीप्सा समर्पण विश्वास और मातृशक्ति पर पूर्ण निर्भरता यही चार चीजें हैं जो Descent के लिये दरवाजा खोले देती हैं।

उत्कट और तीव्र अभीप्सा अर्थात्  भगवान के लिये हृदय की गहराई में जोर की पुकार उठनी चाहिये। बिना भगवान के जीना कठिन हो जाये। रात दिन, सोते जागते, काम करते बस एक ही रट भगवान को जैसे भी हो प्राप्त करना है।’ जीवन का एक मात्र उद्देश्य भगवान हो जाये।

समर्पण- ऐसा कि बिना कुछ बचाये उसी का होकर जीना। जो भी है उसे दे देना - यह प्रारंभ है। जो कुछ किया है उसे दे देना यह मार्ग है। जो कुछ हम हैं उसे दे देना यही संसिद्धि है।

विश्वास- भगवान की कृपा पर अटूट विश्वास और उसकी परम शक्ति के अवतरण में थोड़ा भी सन्देह न रहे। वह जब Matter के भीतर ही प्रवेश कर रही है तब हमारे हृदय में भला प्रवेश क्यों न करेगी ? विश्वास के साथ प्राप्त करने का संकल्प भी जुड़ा हो। मातृशक्ति पर बिना निर्भर किये इस योग को कोई मनुष्य नहीं कर सकता। माँ भागवती शक्ति है, यही सावित्री है, यही Descent की शक्ति है। माँ को अपने भीतर योग कराने के लिये उसके सामने बाल हठ करना पड़ता है। बाल हठ केवल नवजात बच्चा ही करता है। सारी लोक लज्जा को त्याग कर, अपनी योग्यता, बड़प्पन और अहं के लिपटे वसनों को उसके चरणों में डालकर रोना, अन्दर के सारे दरवाजों को उसके लिये खोल देना, जिससे बिना अवरोध के यह शक्ति भीतर अपना काम कर सके, बस यही उपाय है। फिर सारी कठिनाइयों और कष्टों के भीतर चलती उसकी कृपा की उंगलियों को देखना-यही मार्ग है। Descent तो भगवान की कृपा है। यह वरदान है। मानव जाति के लिये परमाशक्ति की करुणा है। कृपा के बिना केवल प्रयास से इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता।

प्रश्न - तो क्या Descent के लिये साधक को प्रयास नहीं करना चाहिये?

उत्तर - पूरे संकल्प के साथ प्रयास करना चाहिये। उसे पूरी निष्ठा, प्रार्थना और अभीप्सा के साथ प्रयास करना चाहिये क्योंकि ये चीजें ही कृपा की भूमि तैयार करती हैं। बिना उर्वरा भूमि के शक्ति का अवतरण नहीं होता। अभीप्सा तभी पैदा होती है जब अन्तर की गहराई में ग्रहणशीलता होती है।

सावित्री में इस बात का उल्लेख है कि मानव जाति की प्रारंभिक अवस्था में जब मन का विकास नहीं हुआ था, दिव्य शक्ति का शक्तिशाली अवरोहण हुआ था लेकिन पृथ्वी चेतना में उसके लिये ग्रहणशीलता नहीं थी इसलिये वह वापस लौट गई वर्ना कष्टमय मानवी जीवन का दिव्य रूपान्तर तभी हो जाता। Descent का लाभ मानव जाति को वर्तमान में भी इसीलिये तभी मिल सकता है जब उसमें उस शक्ति के लिये भूख अर्थात्ď ग्रहणशीलता हो। मनुष्य की भूख भगवान के लिये सारी भूखों के बाद ही उठती है। आज के भौतिकवादी और भोजवादी युग में विरले लोग ही हैं जिनमें यह भूख पैदा होती है। यही कारण है कि भगवती के वरदान Supramental Descent के जड़द्रव्य में स्थायित्व की स्थिति नहीं बन पा रही है।

Descent के दो प्रकार हैं - स्वत: होने वाला अवतरण और ध्यान के द्वारा प्राप्त होने वाला अवतरण। जब सत्ता की अनुकूल स्थिति बन जाती है तो Descent अपने आप किसी भी समय कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में अप्रत्याशित होने लगता है। इसे भगवान का हमला कहा जा सकता है। यह स्वाभाविक रूप से होता है। इसलिए दिव्य शक्ति के मूल स्रोत से होता है। थोड़ी ही देर में यह व्यक्ति को आनन्दातिरेक में डुबा देता है। नैसर्गिक Descent में अक्सर शान्ति, शक्ति और आनन्द तीनों एक साथ आते हैं पर कभी-कभी अलग-अलग भी आते हैं। इसका न कोई विधान है और न ही इसका पूर्वाभास होता। प्राय: यह देखा गया है कि जब विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य अत्यन्त दुखी और व्याकुल होकर आर्तवाणी से भगवान को पुकारता है तो किसी भी समय वह एकाएक शुरू हो जाता है। यह निश्चित रूप से भगवान का यह आश्वासन होता है कि घबड़ाने की आवश्यकता नहीं है, कृपा साथ में है। और ऐसा होने पर सौ प्रतिशत संकट से छुटकारा मिलता ही है। यह आश्वासन और संकेत दोनों ही होता है। और ‘यदि भगवान की सुरक्षा और उसकी कृपा साथ में रहे तो भला किसी से डर किस बात का ?’

भगवान का यह हमला यदि एक बार हो जाता है तो फिर होता ही रहता है। ऐसा लगता है कि उसके बाद बच्चे की फिकर माँ के लिए कम हो जाती है और माँ की फिकर बच्चे के लिये अधिक हो जाती है। ऐसा अक्सर होता है कि कभी-कभी कई दिन तक ध्यान करने का मौका नहीं लगता। व्यस्तता में उसे भगवान भूल जाता है लेकिन माँ बच्चे को नहीं भूलती। उस व्यस्तता के बीच ज्यों ही उसे क्षण भर के लिये विश्राम का मौका मिलता है त्यों ही धड़ाधड़ धड़ाधड़ भगवती की कृपा वरदान बनकर सत्ता को नहलाने लगती है। तब कृतज्ञता में आंसू ढरक चलते हैं - ‘पूत कपूत भले हो जाये पर माता कभी कुमाता नहीं होती।’ भगवान की करुणा जब बरसती है तो वह पूरा ही बरसती है। भगवत्ता अपने को पूरा दे देती है चाहे हम अपने को उसे पूरा भले न दे पायें।

Descent साधना या ध्यान के फलस्वरूप भी होता है। यदि अभीप्सा प्रबल हो तो चैत्यपुरुष जागृत हो जाता है। फिर चैत्य केन्द्र में ध्यान करते रहने से वह सामने आ जाता है। पहले वह प्राण और शरीर की जड़ता के पीछे दवा पड़ा रहता है। इन तीनों की प्रवृत्तियां उसे दबाये या ढके रहती हैं। नित्य प्रति के ध्यान से इन प्रवृत्तियों, संस्कारों और मान्यताओं की मोटी परत में छेद हो जाता है और दवा हुआ चैत्य पुरुष उसी प्रकार सामने आ जाता है जिस प्रकार मोटी काई को हटाने से निर्मल जल दिखने लगता है। यह चैत्यपुरुष चित शक्ति (जिसे हम परमाशक्ति या भगवती माता भी कहते हैं) का छोटा सा अंश या बच्चा है। बच्चे को राजी कर लेने से माँ मिल ही जाती है। जैसे बच्चे की नाभी माँ के गर्भ से नाल द्वारा जुड़ी होती है उसी प्रकार चैत्य पुरुष जगन्माता या Supramental power से जुड़ा होता है। यह भी कह सकते हैं कि यह उसकी नाल का अंतिम छोर है। इसलिये चैत्य में ध्यान करने से भक्ति का उन्मेष होता है। भक्ति से समर्पण होने लगता और अभीप्सा तीव्र होने लगती है। फलस्वरूप चैत्य पुरुष पुष्प की तरह खिल उठता है। एक दिन वह सूर्य बन जाता है जिसके प्रकाश में भगवती माँ अन्दर की आँख से दिख जाती है। उसका स्पर्श मिलने लगता है। आनन्द बढऩे लगता है और यह आनन्द चैत्य की गुहा (हृदय की गहराई) से ऊपर की ओर उसी प्रकार बहने लगता है जैसे सोते से जल की धारा। यही Descent है। यह हृदय में होने वाला Descent है। पर चैत्य पुरुष केन्द्रपुरुष या जीवात्मा का अंश है जिसका ध्यान सहस्रार चक्र अर्थात्  खोपड़ी के थोड़ा ऊपर बीचों बीच है। चैत्य पुरुष में दबाव पड़ते ही इसीलिये एक दिन केन्द्र पुरुष में तो दबाव अपने आप शुरु हो जाता है और आनन्द वहाँ से निर्झारित होने लगता है। शक्ति सुषुम्ना के भीतर से नीचे को मीठे दबाव के साथ प्रवाहित होने लगती है। खोपड़ी में चींटी काटने या सुई चुभाने जैसी थोड़ी देर के लिए मीठा पीड़ा होती है। सिर में मीठा दबाव पडऩे लगता है। जब भी ऐसा हो तो ऐसा समझना चाहिये कि Descent शुरु हो गया। यह दबाव और छेदन (Drilling) नीचे शरीर में आने के लिए दिव्य शक्ति का दबाव है। यह कृपा की पहचान है। यह मातृशक्ति पहले सुषुम्ना से होकर खोपड़ी से नीचे को उतरती है। दबाव चारों ओर पूरे सिर में फिर ललाट में और ठीक उसके पीछे फैल जाता है। सुषुम्ना के भीतर भी दबाव बन जाता है। मन इस स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। मन के द्वारा थोड़ा थोड़ा, धीरे धीरे सुषुम्ना से होकर प्रवाहित होने वाली दिव्यशक्ति को दबाने वह नीचे को उतरती है। श्रीअरविन्द सावधान करते हैं कि इस शक्ति को खींचने में काफी सावधानी बरतनी चाहिये। जिनका प्राण बहुत अशुद्ध होता है उन्हें वे शक्ति को नीचे खींचने या ऊपर से दबाने के लिये मना करते हैं क्योंकि भगवान को गन्दे मन्दिर में ले आने से तोड़ फोड़ का खतरा हमेशा रहता है पर जिनमें प्राण की अशुद्धता कम है, अहं की मात्रा भी कम है उन्हें वे खूब खींचने की सलाह देते हैं। शक्ति को कितना खींचा जाये, यह अपने आप मालूम हो जाता है। इसका पैमाना भीतर ही लगा है। अशुद्धता या विकार के क्षेत्र को भागवत शक्ति ज्यों ही स्पर्श करती है, त्यों ही Descent तीखा हो जाता है। प्राण और अहं दोनों के विकार अवरोध (Resistence) का काम करते हैं। शक्ति के प्रवाह में इस अवरोध के कारण काफी तीखापन (काटने जैसा सम्वेदन) पैदा हो जाता है। और आनन्द में कुछ मजा नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में शक्ति को दबाने या नीचे से खींचने की क्रिया बन्द कर देनी चाहिये। पहले वह सहस्रार में काफी दिन ठहरती है फिर आज्ञाचक्र में ठहरती है। चक्रभेदन हो जाने पर उसके नीचे कष्ट में स्थित विशुद्ध चक्र में आकर ठहरती है। वर्षों बाद वह हृदय चक्र तक पहुँच पाती है। हृदय चक्र में पहुँचना साधना में निर्णायक प्रगति का सूचक माना जाता है क्योंकि तब चैत्य पुरुष और केन्द्रपुरुष के बीच सोपान (Golden Bridge) तैयार हो जाता है और चेतना के ये दोनों सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र एक दूसरे के साथ अक्स होने या जुडऩे लगते हैं। दोनों के बीच का सेतु ज्योतिर्मय हो जाता है और साधना चैतन्य सागर के परमानन्द में डूब जाती है। तब शिला जैसी ठोस शान्ति, दुघ्दर्ष शक्ति और समुद्रवत आनन्द  ‘सच्चिदानन्द’ की अनुभूति कराने लगते हैं। दिव्यशक्ति का Radiation (विकिरण) जोरों से चारों ओर होने लगता है। चेतना का वैश्वीकरण होने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि हृदयपुरुष से केन्द्र पुरुष को मिलाने वाला चेतना का सोपान सूर्य की तरह दमक कर अपनी किरणों से सारे जगत को प्रकाशित कर रहा है। तब साधक धन्य हो जाता है। प्राण कृतज्ञता के स्पन्दन से स्पन्दित होने लगता है। भगवत्ता निहारने लगती है। मृत्यु से जूझती सांस अमर होने लगती है। अन्तरजगत में एक चमत्कार हो जाता है।

 

........क्रमशः

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