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हिमालय का फकीर

 

डॉ0 के0एन0 वर्मा

श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर जिन्हें मैं प्यार से ‘पूज्य पिताजी’ शब्द से हमेशा सम्बोधित करता था, मेरे जीवन में एक तूफान की तरह आए - एक ऐसा तूफान जो वर्षों तक माँ मंदिर के ऊपर मड़राता रहा और धीरे-धीरे शांत होकर समाधिष्ठ हो गया। केवल 6 वर्षों के अल्पकाल में उन्होंने मेरे पूरे अस्तित्व को झकझोर दिया, इसका एक प्रकार से पुनर्निर्माण किया और उसे आनन्द शक्ति व अभीप्सा के प्रोज्ज्वल प्रकाश में नहला दिया।

 

श्रीअरविन्द ग्राम के माँ मंदिर में उनका आगमन एक महान घटना थी - यह थी इस पुण्यस्थली की स्वर्गिक पीठिका में श्रीमाँ के पाद-पद्मों का पदार्पण। वे आज भी मुझमें और मन्दिर प्रांगण के बोलते क्षणों में पूरी तरह जीवन्त हैं - अभीप्सा की एक-एक सांस और कर्म की एक-एक ईंट में श्रीअरविन्द और श्रीमाँ की प्रगाढ़ उपस्थिति के रूप में वे यहाँ विद्यमान हैं। यह महत्त्वपूर्ण घटना 12 मार्च, 1979 को घटी। इस छोटी-सी अवधि में वे तीन बार यहाँ आये। 12 मार्च से 14 मार्च, 1979 और 2 से 8 फरवरी, 1982 तथा 25 से 26 सितम्बर 1984। उनके प्रत्येक आगमन ने माँ मंदिर के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुये उसे सुन्दर चेतनात्मक स्वरूप प्रदान किया। इन आगमनों के स्फूर्तिदायी स्पन्दन आज भी इस प्रशान्त वातावरण में अनुभूत किये जा सकते हैं, झनझनाती आहट अभीप्सित आत्माओं को जगा जाती है। यह विश्वास करना कठिन है कि 1979 व 1980 के मात्र 2 वर्षों के अंतराल में हमारे बीच 200 से अधिक पत्रों का आदान-प्रदान हुआ। यह उनके उत्कर्ष का वह महत्तम कार्य था जब उन्होंने सूक्ष्म जगत में स्थित माँ मन्दिर के स्वरूप को धरती पर उतार लाने के लिये हमें अपना कंधा दिया।

 

अप्रत्याशित आगमन

अत्प्रत्याशित रूप से प्रकट होने और कार्य कर लोगों को चकित कर देने में उन्हें मजा आता था। हमने माँ मंदिर में 12 मार्च, 1979 से एक चार दिवसीय अखिल भारतीय साधना सम्मेलन का आयोजन किया था। जिसके उद्घाटन के लिये उन्हें आमंत्रित किया गया था। उस समय तक केवल श्रीअरविन्द कर्मधारा के माध्यम से ही अत्प्रत्यक्ष सम्पर्क उनके साथ था। हम सुश्री तारा जौहर के माध्यम से उद्घाटन की अनुमति हेतु बारम्बार अपना निवेदन प्रस्तुत कर रहे थे और प्रत्येक बार उनका एक ही उत्तर मिलता ‘पिता जी का अभी तक कोई उत्तर नहीं मिला है। वे नैनीताल में हैं।’ प्रतीक्षा करने के सिवा हमारे पास और कोई चारा नहीं था। सम्मेलन के लिये मुश्किल से 15 दिन शेष बचे थे पर अब भी कोई उत्तर नहीं। हम लगभग हताश ही हो चुके थे कि अचानक उनका सुन्दर सन्देश मिला कि वे सम्मेलन में पहुँचेंगे और अपने 21 व्यक्तियों के दल के साथ माँ मन्दिर में धावा बोलने के लिये दिल्ली में पूरे जोर के साथ तैयारियाँ चल रही हैं। 21 की यह संख्या शायद हमारे 12 का सबल जवाब था। और एक बार पुनः हमें आश्चर्यचकित करने के लिये उन्होंने आते समय अपना पूरा लवाजमा पीछे छोड़ दिया, और अपनी कार को छिपाकर पैदल ही एक दिन माँ मन्दिर के परिसर में अकेले ही बिना किसी पूर्व सूचना के प्रवेश किया। वे एक सफेद काँग्रेसी टोपी और खादी की लम्बी अचकन पहने हुये थे। माली ने मुझे सूचित किया - ‘कोई नेता जी आये हैं और आपको पूछ रहे हैं। आकर मैंने ज्योंही चरण स्पर्श किया, वे लगे मेरी ओर घूर-घूर कर देखने, फिर एक के बाद एक प्रश्नों की झड़ी लगा दी - ‘क्या आप केदारनाथ जी हो?’ यह मन्दिर किसने बनवाया है? देवी-देवताओं का मन्दिर न बनवाकर माँ का मन्दिर क्यों बनाया? आदि आदि। इतने में ही छिपने के स्थान से कार बाहर निकली और करुणा दीदी प्रकट हो गईं, हम दोनों के वार्तालाप के बीच में जोर का ठहाका लगा और सारा वातावरण उन्मुक्त विनोद से विहस उठा - ‘आप बडे़ चतुर निकले, हमने तो आपको चकित कर छकाना चाहा था पर आपने पहचान लिया।’ इस प्रकार हास-परिहास के बीच उल्लसित वातावरण में पिता-पुत्र के सम्बन्धों का सृजन प्रारंभ हो गया।

 

सम्बन्धों की कड़ियाँ

श्री जौहर साहब मेरे जीवन में अस्सी के दशक में आये और अन्त तक मानों किसी दैवी आदेश से जुडे़ रहे। वे उस समय आये जब उनकी बहुत जरूरत थी। आध्यात्मिक जगत में हमारे सम्बन्ध चार प्रकार के थे -
(1) संरक्षक व सहायक जैसा,
(2) पिता व पुत्र जैसा,
(3) मित्र, सलाहकार व पथ-प्रदर्शक जैसा,
(4) अन्तिम भेंट में मिलन जैसा।

 

(1) संरक्षक व सहायक के रूप में:

माँ मन्दिर में मार्च 1979 में हुये साधना सम्मेलन के बाद शीघ्र ही उन्होंने तार द्वारा मुझे दिल्ली बुलाया। यद्यपि उस समय मेरा स्वास्थ्य यात्रा के योग्य बिल्कुल ही नहीं था फिर भी इसे एक दैवी आदेश मानकर अगली ही ट्रेन से मैं दिल्ली के लिये रवाना हो गया। वहाँ मेरी स्थिति बिगड़ती ही गई और आश्रम में अधिकतर समय मुझे ड्रिप में रहना पड़ा फिर भी उनके अनन्य स्नेह और उद्बोधक प्रसंगों ने जीवन में उत्साह बनाये रखने में सहारा दिया। वे दिन में तीन चार बार मुझे देखने आते थे और घण्टों तक मेरी आंतरिक सत्ता को इस अनजानी बीमारी से लड़ने के लिये उत्प्रेरित करते थे। दिल्ली से लौटकर जब मैं रीवा मेडिकल कॉलेज में जहाँ मैं महीने भर से ऊपर प्लूरसी की बीमारी से जूझता रहा, भर्ती हुआ तब भी मुझे हमेशा ही श्रीमाँ का संरक्षण प्रदान करने में वे पूरी तरह सजग रहे। और जब तक मैं अस्पताल में भर्ती रहा, पूरे समय तक लगभग प्रतिदिन मुझे दिल्ली से आशीर्वाद सहित-पुष्प ¼Protection flower½ भेजते रहे। इस बीच वे स्वयं भी भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में अपनी चिकित्सा हेतु भर्ती रहे। जब कभी भी मेरी हालत अधिक गंभीर हो जाती तो वे चिंतित हो जाते और मेरे लिये प्रार्थना करते। वे मुझे पत्र द्वारा सलाह देते ‘आपको अपने स्वास्थ्य पर अपना ध्यान सबसे अधिक केन्द्रित करना चाहिए। ऐसी स्थिति में हमें मातृ-कृपा के लिये हमेशा प्रार्थना करना चाहिए।’ (26/4/79) 
‘मैं आपके लिये अत्यधिक चिन्तित हूँ क्योंकि कोई पत्र नहीं आया। शीघ्र अपना कुशलक्षेम भेजें।’ (1/5/79) 
‘कृपया इस बात का ध्यान रखें कि पत्रों का आदान-प्रदान अवाध गति से होता रहे।’ ‘आपके स्वास्थ्य के बारे में सतत रूप से समाचार नहीं मिल पा रहे हैं इसलिये चिन्ता लगी है। (3/5/79) 
‘आपके स्वास्थ्य के बारे में मैं बहुत चिन्तित हूँ। जब आपका पत्र नहीं मिल पाता तो मैं बेचैन हो जाता हूँ।’ (21/7/80) 
बीमारी के बाद भी मेरी अधिक यात्राओं, लेखन कार्यों और भाषणों से वे चिन्तित दिखे और मौन का अभ्यास करने व शक्ति संचित करने की सलाह दी क्योंकि मौन और स्वस्थ शरीर के द्वारा ही भागवत कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। उन्होंने लिखा, ‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आपके अंतर में माँ के कार्य के लिये कैसी आग जल रही है लेकिन यह सब तभी संभव है जब शरीर स्वस्थ हो।’ (22/8/80)

 

(2) पिता और पुत्र के रूप में:

पहली ही मुलाकात में मैंने उन्हें जिस सहजता से पिता के रूप में सम्बोधित कर डाला उन्होंने उसी सहजता से मुझे अपना पुत्र भी मान लिया। शुरू-शुरू में तो वे मुझे ‘केदारनाथ जी’ नाम से सम्बोधित करते थे, बाद में Blessed Atamn] कभी Beloved son और अंतिम दिनों में 'My Eternal son'जैसे आशीर्वचनों से सम्बन्धों को अधिक प्रगाढ़ता प्रदान करने लगे थे। उन्होंने एक बार लिखा, ‘कृपया किसी बात की चिंता न करें। हमारे सम्बन्ध भिन्न स्तर पर हैं।’ (26/12/79) 
‘अब आप पिताजी के ही कार्यों को कर रहे हैं इसलिये मेरे पुत्र कहलाने के अधिकारी हो लेकिन अभी दिल्ली दूर है।’ (23/1/80) 
‘मेरे शाश्वत पुत्र, 
‘मैं जानता हूँ कि आप अभीप्सा में तड़प रहे हैं लेकिन यह भूल रहे हैं कि अब आप सयाने हो गये हैं। आज की दुनिया में सयाने लोग काफी व्यस्त रहते हैं और अपनी दुनिया के अपने ही कार्यों में आकण्ठ डूबे रहते हैं। वे अपने पिता की कभी ख़बर नहीं लेते। तब आप क्यों लेते हो?’ 
‘तिस पर भी मैं आपके साथ सर्वदा ही रहूँगा।’ (5/9/81) 
‘आपके साथ आपके हृदय में मैं सदा निवास करूँगा।’ (13/10/79)

 

(3) पथ-प्रदर्शक के रूप में:

माँ मन्दिर में तीन दिन तक आवास के पश्चात्, 14 मार्च को उन्होंने लगभग मेरा अपहरण ही कर लिया। हुआ ऐसा कि मैं उन्हें उनकी कार तक विदा करने गया और जैसे ही कार के भीतर मैं उनके चरण स्पर्श करने को नीचे झुका कि करुणा दीदी ने झट से कार का दरवाजा बन्द कर लिया और मुझे बन्दी बना लिया। यह सब दोनों की मिली-भगत के तहत एक सुनियोजित ढंग से किया गया। तो यह पूरा का पूरा अपहरण का ही मामला था केवल आँखों में पट्टी नहीं बाँधी गई थी। आधे-अधूरे कपड़ों के साथ किसी अनजाने स्थान की ओर मुझे ले जाया गया और सण्डर्सन कंपनी सोहावल के विश्रामगृह में ही उतारा गया। फिर लगातार तीन दिनों तक श्रीमाँ से सम्बन्धित अपने मधुर संस्मरणों और रोमांचित कर देने वाले आनन्दातिरेकी कथा प्रसंगों द्वारा हमारे हृदयों को सम्मोहित कर अपने रहस्यमय इस बंदीगृह में उन्होंने हमें कैद कर रखा। माँ मन्दिर में ही उन्होंने हमारी बीमारी का सही निदान कर लिया था जिसके उपचार में वे इंजेक्शन पर इंजेक्शन तब तक देते ही रहे जब तक हम दोनों आनन्द विभोर होकर रोने नहीं लग गये और दवा की मात्रा आवश्यक से अधिक नहीं हो गई। हमारे आनन्द के प्याले अमृत-मधु से भरकर उमड़ने लगे। क्या ही स्वर्गिंक आनन्द के क्षण थे ये! तब से हम दोनों साथ-साथ आंतरिक जगत में अपने-अपने मार्गों में यात्रा करते रहे। इस यात्रा में मैं उन्हें निरखता रहा और आवश्यकता पड़ने पर उनके पास पहुँचता भी रहा। अपने प्यार भरे निरंतर चलने वाले पत्र-व्यवहार द्वारा विरोधी शक्तियों के साथ जूझने के लिये वे मुझे सदा प्रोत्साहित और उत्प्रेरित करते रहे। उनके सन्देश पर मई 1979 में अस्पताल से छुट्टी मिलते ही मैं सीधे नैनीताल पहुँच गया। वहाँ उनके साथ लगभग एक माह रहकर स्वास्थ्य लाभ किया साथ ही उनके उस कीमती खजाने से फिर एक बार थोड़ा बहुत हाथ साफ करता रहा जिसे बड़ी जतन से उन्होंने श्रीमाँ की तिजोड़ी से चुरा-चुरा कर जमा कर रखा था। वहीं मैंने Plunderer of the Mother's Treasury' शीर्षक से एक लेख भी लिखा, जो Call Beyond में छपा था। उसी समय मैंने उन्हें अपने ब्रांक्राइटिस के निरंतर चलने वाले रोग तथा अन्य ढेरों बीमारियों से पीड़ित रहते हुये भी कठिनतम श्रम को करते हुये देखा और आश्चर्य करता रहा। 10 बजे दिन तक तो सांस लेना भी उनके लिये बहुत कठिन होता था, लेकिन उसके बाद वे खाट से उठते और दुर्दान्त महामानव की भांति भारी श्रम के कामों में जैसे ईंट-पत्थरों के उठाने, निर्माण कार्य की निगरानी के लिये सीढ़ियों के चढ़ने, पुरानी दीवारों को गिरवाने व नई उठवाने में एक सक्रिय सच्चे कर्मयोगी की भाँति लग जाते। वे कभी तो अपने चुटकुलों से हँसा-हँसा कर पेट फुला देते और कभी माँ के पावन प्रसंगों में डुबाकर रुला देते। 
वन-निवास से लौटने पर भी हम पत्र व्यवहारों और पारस्परिक भेंट मुलाकातों के जरिये एक दूसरे के सम्पर्क में लगातार अगले 5 वर्षों तक बने रहे। वे लगभग प्रति दिन कभी-कभी तो एक दिन में दो-दो पत्र मुझे लिखते। उनका चुम्बकीय क्षेत्र बराबर ही व्यापक होता गया और चाहे जहाँ भी मैं रहूँ, मैं उनसे आकर्षित होता रहा। उन्होंने एक बार लिखा भी कि ‘हम भौतिक रूप से चाहे भले ही दूर-दूर हों पर सूक्ष्म जगत में हम एक हैं।’ ‘भौतिक दूरी के कारण एक दूसरे से दूर होने पर भी हम आत्म-तत्त्व और आत्मिक शक्ति में एक साथ हैं।’ ‘यद्यपि हम चाहते तो यही थे कि हम दोनों एक साथ रहें तथापि न तो यह व्यावहारिक है और न ही ऐसा होना हमारे प्रारब्ध में है। (26/5/80) 
‘मैं हमेशा ही आपको बहुत याद करता हूँ। आपने तो मुझे इतने जोर से पकड़ रखा है कि मैं बाहर निकल नहीं सकता।’ (12/4/80) 
मैं जौहर साहब को अकसर अंतर्दर्शन में देखा करता। वे हमेशा कठिनाइयों में मुझे प्रोत्साहित करते दिखते। उनका पूरा जीवन मेरे लिये प्रेरणा, निष्ठा और सम्पूर्ण समर्पण का ज्ञान प्राप्त करने की खुली पुस्तक रहा। जब भी दिल्ली जाना होता, मैं वहाँ के सारे कार्यक्रमों को छोड़कर उनके सत्संग का लाभ उठाता, अपनी अनुभूतियों को समृद्ध करता और अपनी आत्म चेतना को उन्नत करने का प्रयास करता। मैं उनकी निष्ठा, भागवत कार्यों के प्रति उनकी अद्वितीय लगन, सचाई, निष्काम कर्म की भावना, निर्भीकता और माँ के प्रति भक्तिपूर्ण समर्पण - जैसी चीजों के बारे में अधिक से अधिक सुनना और उनके मुँह से जानना चाहता था। और जितना ही सुनता था उतनी ही भूख बढ़ती थी। उन्हें सुनना और सुनते जाना अभीप्सा के प्रवाह में बहते जाना और आनन्द की दरिया में डुबकी लगाना होता था। 
उनके जीवन में अनेकों घाटियों के उतार-चढ़ाव से जुड़ी अद्भुत पहेलियाँ हैं जिन सभी का अंत उस राजमार्ग में होता है जहाँ से उनकी Fateful Journey माँ के श्रीचरणों में आश्रय पाने को दौड़ लगाती है। यह ऊबड़-खावड़ यात्रा एक सुखान्त उपन्यास के साथ गुनगुनाता काव्य भी है। इसकी ऋचायें हृदय को छूती हैं और भीतर कुछ महक उठता है। उन्हें सुनना एक अनुभूति होती थी। माँ की गोद पर झपट्टा मार कर अधिकार करने वाली अंतर्कथायें सुनते ही सम्मोहन का जादू मन पर छा जाता और हम अनजाने जगतों में खो जाते। यह खोना ही वह जागरण होता जहाँ कल का कोई विहान बाँग दे रहा है। एक बार प्रवेश कर लेने के बाद इस चुम्बकीय क्षेत्र से बाहर निकल पाना संभव नहीं था। एक अबोध, निर्दोष बालक बनकर भगवती के साम्राज्य में अपना झण्डा गाड़ने की कला - नहीं चालाकी - नहीं फकीरी - नहीं पुकार से मिलती-जुलती कोई चीज उस दुर्ग में गड़ी मैंने देखा जिसका नाम जौहर है। उनके दिव्य जीवन के विश्व ज्ञान कोष (Encyclopadea) में ही मैंने समर्पण का जीवन्त अर्थ खोज पाया। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस फकीर विश्वविद्यालय के छिपे पन्ने को एक दिन सारा संसार एक-एक कर खोलेगा, पढे़गा और दाँतों तले उँगली दबायेगा। 
एक बार जब नैनीताल के पास के एक पवित्र स्थल कैंची से हम दोनों वन-निवास वापिस आ रहे थे तो बारह पत्थर की चढ़ाई चढ़ने के लिये उन्होंने मेरे कंधे का सहारा लिया। मैंने गर्व से कंधे को थपथपाया। रास्ते में उन्हें जहाँ-तहाँ कुछ ईंटे बिखरी हुई दिखीं। ये ईंटें उन गधों की पीठ से सरकी ईंटें थीं जो उन्हें लादकर नीचे से वन-निवास पहुँचाते थे। वे मेरा कंधा छोड़कर लगे उन्हें एक-एक कर बिनने। धीरे-धीरे एक गधे का बोझ उन्होंने समेट लिया। दुबारा जब उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा तो दिन में मुझे कई तारे दिखने लगे। अभी-अभी प्लूरसी से ठीक हुआ था इसलिये शरीर में हड्डियाँ ही शेष थीं, माँस और ताकत का खाता अभी-अभी खुल रहा था। उस टेढे़-मेढ़े रास्ते में वन-निवास की मंजिल आगे को भाग रही थी। एक-एक कदम, जिस पर बालि की शिलाधरी थी, उठाना किसी तेनसिंह के श्रम से कम न था। मेरे ऊपर एक सिकन्दर का बोझ और सिकन्दर के ऊपर 'surrender not' के कर्त्तव्य हिमालय का बोझ था - लगा हम ओलम्पिक की विश्व विजयिनी यात्रा में आज निकले हैं। जैसे-तैसे वन-निवास का शिखर सामने दिखा। बस एवरेस्ट पर झण्डा गाड़ने की ही देर थी कि उन्होंने कहा - ‘वर्मा जी बहुत प्यास लगी है, प्राण निकल रहे हैं।’ ऐसा कहते हुये वे एक चट्टान पर धम से बैठ गये।’ पानी लाऊँ? मैंने पूछा। ‘नहीं, आप नहीं जाओ।’ टूटती साँसों को जोड़ते हुये, हम दोनों आखिरी कैम्प से आगे बढे़। एक घण्टे में सौ कदम चलने के कीर्तिमान के साथ हमारा पूर्णयोग पूर्ण हुआ। यह आरोहण मेरे लिये Supramental की चढ़ाई से किसी तरह कम न था। दो फर्लांग की इस यात्रा ने पूर्णयोगी-गीता के कई अध्याय लिख डाले। कर्मयोग का पहला अध्याय मैंने तब पढ़ा जब उन्होंने यह बताते हुये ईंट को उठाया कि एक-एक पैसे को जोड़कर भगवान् का जो कोष वननिवास में तैयार होता है उसे इस प्रकार बर्बाद करने का अर्थ बेईमानी है। इस पाठ को उन्होंने कक्षा के बाहर उदाहरण देकर मुझे पढ़ाया। भक्तियोग का दूसरा अध्याय मैंने तब पढ़ा जब उन्होंने अपने फकीरी की वेदी पर समर्पण का एक विश्वविद्यालय खड़ा करने के लिये एक कार्यक्रम तैयार करने को कहा। ज्ञान योग का तीसरा अध्याय तब समझा जब इस विश्वविद्यालय के ‘मानव संस्थान’ विभाग में पढ़ने के लिये विद्यार्थी के रूप में मेरा उन्होंने चुनाव किया। उन्होंने पढ़ाया कि - 
(1) ‘‘यह संसार दुर्गुणों का घनचक्कर है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति दो विपरीत प्रवाहों के बीच फँस गया है। दोनों प्रवाह एक ही साथ सही और गलत हैं। चेतना की केवल ऊँची वृत्ति ही हमें इनसे उबार सकती है।’’ (28/3/81) 
(2) ‘‘चादर के अनुसार ही प्रत्येक को अपने पैर फैलाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर मुझे ऐसा लिखा और कहा, ‘आप हमेशा ही भागवत कार्य के एक सक्रिय यंत्र रहे हैं लेकिन आपको अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही काम हाथ में लेना चाहिए। इस क्षमता के परे कभी नहीं जाना चाहिए।’’ (14/12/82) 
(3) ‘‘न कोई महत्त्वाकांक्षा, न कार्य योजना, न ही नियोजन - ‘मैंने जो कहा उसे आपने नहीं समझा, शायद उसे समझाया भी नहीं जा सकता। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मुझे न किसी कार्य की प्रेरणा मिली न ही कोई मैंने कभी कार्ययोजना ही बनाई। यह तो कोई और ही व्यक्तित्व होता था जो यह सब मेरे लिये करता रहता था। ठीक यही चीज महात्मा गाँधी के साथ भी थी।’’ (28/11/80) 
‘‘मेरी आदत हमेशा ही विस्तार की तथा अधिक से अधिक काम करने की रही है पर अब तो मुझे बात तक करने की अनुमति नहीं है - अब तो मुझे एक ईंट या घास की पत्ती तक हिलाने की इजाजत नहीं है।’’ (28/11/80) 
‘‘दिल्ली के कनाट सर्कस में मैंने श्रीअरविन्द के साहित्य की दो आकर्षक दुकाने खोलीं, लेकिन उनमें महीने भर में 50 रुपए मूल्य तक की भी पुस्तकें नहीं बिकीं और घाटे में चलने के कारण अंत में उन्हें बंद ही कर देना पड़ा। क्यों? क्योंकि उनमें काम करने वाले कर्मचारी साधक नहीं थे।’ उन्होंने यह भी बताया कि कटनी, सतना और दर्जनों स्थानों में वे श्रीअरविन्द विद्यालय खोलना चाहते थे लेकिन दिव्य साधकों के अभाव में वे ऐसा नहीं कर सके। उस समय भगवान् नहीं चाहता था कि यह कार्य हो। लेकिन अब वही पुस्तकें ‘शब्दा’ में धड़ाधड़ बिक रही हैं और एक ही आश्रम परिशर में आज एक साथ कई विद्यालय चल रहे हैं क्योंकि भगवान् के यंत्र उन्हें चलाने के लिये उपलब्ध हो गये हैं। अतएव ‘काम कीजिए और प्रतीक्षा कीजिए।’ यही काम का तरीका है। योजनायें न बनाइये।’’ 
मध्य प्रदेश में मैंने जो कार्य कभी हाथ में लिया उनके बारे में श्री जौहर साहब की उपरोक्त बातें अक्षरशः सत्य सिद्ध हुईं। अपने युवावस्था के उत्साह भरे दिनों में माँ मंदिर की कितनी ही शाखायें और हर जगह केन्द्र स्थापित करने की मेरी तमन्नायें थीं। चाहता था कि सारे प्रदेश में माँ के केन्द्रों का एक सघन जाल बुन दूँ जिससे दिव्य क्रांति का कार्य तेजी से आगे बढ़ सके। मैं एक स्थान से दूसरे स्थान में जहाँ भी स्थानान्तरित होकर जाता वहीं एक दो केन्द्र खोल देता। पिताजी मेरे इस विस्तार और सक्रियता से तब परिचित थे इसलिये जब उनकी बीमारी में मैं उनसे मिलने के लिये दिल्ली गया तो लगे फटकारने, ‘आप अपनी शक्ति और ऊर्जा का अपव्यय क्यों कर रहे हो? भाषण देने और केवल केन्द्रों के खोल देने मात्र से श्रीअरविन्द योग को लोगों पर थोपा नहीं जा सकता। केन्द्र और शाखाओं को प्रारंभ कर देना तो आसान है पर बाद में उन पर नियंत्रण कर पाना बहुत ही कठिन होता है। धीरे-धीरे ये केन्द्र अपना आध्यात्मिक स्वरूप खो देते हैं और मात्र वैधानिक संस्था बनकर रह जाते हैं।’ (26/12/79) 
‘आपको यह समझ लेना चाहिए कि भागवत कार्य और उनके स्पर्श को लोगों पर न थोपा जा सकता और न उनमें ठूँसा जा सकता। यह सबकुछ मैं अपने दिल्ली आश्रम में रहकर 25 वर्षों के तथा उसके पूर्व के भी 20 वर्षों के अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ। लाखों व्यक्ति जिनमें मेरे भाई-बहन भी सम्मिलित हैं, मेरे सम्पर्क में आते हैं लेकिन उनके भीतर किंचित मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता।’ (18/11/80) 
जिस जीवन को उन्होंने जिया, उसमें कितनी बड़ी सचाई है? मध्य प्रदेश में ही अकेले मैंने लगभग दर्जन भर श्रीअरविन्द केन्द्रों की बडे़ उत्साह के साथ स्थापना की। इनमें से आज एक भी जीवित व सक्रिय नहीं हैं। इससे हमने यह शिक्षा ग्रहण की कि भागवत कार्य को प्रारंभ करने के पूर्व भागवत यंत्रों अर्थात् सही साधकों का निर्माण आवश्यक है। उन्होंने गुरु नित्य चैतन्य यति को भी यह कहते हुये डाँट लगा दी कि ‘विभिन्न देशों के विश्वविद्यालयों में जाकर पढ़ाने का आपका कार्य अवश्य ही आपके अहं और घूमने के शौक का परिचायक है। पर यह मानव प्रकृति ऐसी है कि वह आसानी से अपने कार्यों का तर्क संगत औचित्य प्रस्तुत कर देती है और शास्त्रों के उदाहरणों द्वारा उन्हें सही भी प्रमाणित कर देती है।’ (27/3/79) 
(4) अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखें - उन्होंने लिखा - ‘मैं सबसे महत्वपूर्ण बात जो आपसे कहना चाहता हूँ वह यह है कि हमें अपने को और अपने शरीर को दुरुस्त व स्वस्थ रखना चाहिए। बिना स्वस्थ काया के हम कोई भी कार्य नहीं कर सकते। ऐसा करना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।’ (6/7/79)

 

अंतिम भेंट

उनके महाप्रयाण की अंतिम घड़ी निकट आ रही थी। सौभाग्य - यात्रा अपनी मंजिल पूरी करने को थी। अधिकतर समय अब उनका या तो बिस्तर में कटता या अस्पताल में। जो कुछ भी सामान्य था वह असामान्य हो गया और असामान्य सामान्य। अगस्त 1986 के अंतिम सप्ताह में वे बीमारी से पीड़ित थे, इसका पता तो मुझे था पर बीमार रहना ही अब उनका दैनिक जीवन बन चुका था। इसलिये किसी असामान्य बात की ओर हमारा ध्यान नहीं गया। लेकिन सितम्बर की पहली तारीख को अपरान्ह में 2 बजे के आसपास मेरे भीतर अचानक बेचैनी शुरू हुई जिसका प्रत्यक्ष में कोई कारण नहीं था। वह बढ़ती ही गई। मुझे लगा जैसे कहीं दूर से कोई आवाज आ रही हो। टीस लिये एक मूक सन्देश हवा में तैरने लगा। बेचैनी अब व्याकुलता में बदलने लगी। मैंने ब्रीफकेस उठाया और सीधे रेलवे स्टेशन सतना। 2 सितम्बर को दोपहर बाद श्रीअरविन्दाश्रम दिल्ली पहुँचा, जहाँ मालूम हुआ कि वे एक निजी अस्पताल में बेहोशी हालत में कई दिन से चल रहे हैं। करुणा दीदी मुझे अस्पताल ले गईं। वे कॉमा में थे। चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और वहीं खाट में ही पैर की ओर ध्यान में बैठ गया। 10 मिनट के भीतर उन्होंने प्राण त्याग दिया। 
सारा कमरा सघन शक्ति में डूब गया। एक शिला जैसी ठोस लेकिन निस्तब्ध शांति ने हमें अचल कर दिया। उनकी काया में संचित इस खजाने को, जिसे जितना मिला, अपना लिया। देखते-देखते भगवत्ता की उँगलियों से सँवारी साँसे उसी के मंत्रों में समा गईं।

 

माँ मंदिर के साथ उनका अटूट सम्बन्ध

उनके हृदय में माँ मन्दिर के लिये विशेष स्थान था। अपने पहले ही आगमन पर उन्होंने यहाँ किसी विशिष्ट चीज का अनुभव किया। जीवन के अंतिम वर्षों में उनका यहाँ तीन बार आगमन हुआ और लगभग इतने ही बार टिकट कटाकर उन्हें अपनी यात्रा अस्थगित करनी पड़ी, क्योंकि तब या तो वे बीमार पड़ गये होते या आकस्मिक रूप से कोई आपरेशन अनिवार्य हो गया होता। जब भी वे यहाँ आते, उनके साथ उनका भारी भरकम दल भी साथ आता था। इस दल में कई विदेशी शिष्य भी होते थे। उनकी इच्छा थी कि माँ मंदिर का अपने सम्पूर्ण कार्यों में स्वतंत्र अस्तित्व हो जिससे वह अपने ‘स्व’ को स्वच्छन्दतापूर्वक उत्तमोत्तम ढंग से अभिव्यक्त कर सके, कभी हम चाहते थे कि यह श्रीअरविन्दाश्रम दिल्ली का एक अंग बन जाये पर उनका विचार था कि माँ मंदिर अपनी अलग पहचान व स्वतंत्र सत्ता बनाये रखकर अंतर्निहित संभावनाओं को अपने ही ढंग से विकसित करे। जब ओरोवील के प्रशासन को केन्द्र सरकार ने अपने हाथों ले लिया तो उन्हें इस बात की आशंका हुई कि कहीं श्रीअरविन्द सोसायटी पाण्डिचेरी द्वारा प्रशासित सभी केन्द्रों को भी सरकार अपने हाथों में न ले ले। यदि ऐसा हुआ तो ऐसी सारी संस्थायें संकट में पड़ जाएंगी। इसीलिये उन्होंने लिखा ‘मैं चिंतित हूँ, आप श्रीअरविन्द ग्राम तथा माँ मंदिर को कैसे बचा पायेंगे (7/11/80)। माँ मंदिर का स्वतंत्र अस्तित्व होना चाहिये, इसे किसी भी संस्था के साथ सम्बद्ध नहीं किया जाना चाहिए, यहाँ तक कि दिल्ली आश्रम के साथ भी नहीं। अपने आपको जितना अधिक स्वतंत्र रख सकें, स्वतंत्र रखें। (26/12/79)

उनका यह परामर्श माँ मंदिर को अपनी अलग पहचान बनाने और अपने ढंग से फलने-फूलने में लाभकारी ही नहीं संजीवनी सिद्ध हुआ। उनकी इस दूरदृष्टि के लिये हम कितने कृतज्ञ हैं।

25 सितम्बर 1984 को जौहर साहब का माँ मंदिर में आगमन जो उनका अंतिम आगमन था, सचमुच में एक जौहर ही था। सुश्री ताराजी के सौजन्य से दिनाँक 24 से 30 सितम्बर के बीच यहाँ अखिल भारतीय श्रीअरविन्द विद्यालयों का शिक्षा सम्मेलन आयोजित हुआ था। किसी गाँव में इस प्रकार का वृहत् आयोजन पहली बार किया गया था और इस सबके पीछे तारा जी का कुशल प्रबंधन और संगठनात्मक कौशल काम कर रहा था। इस भव्य सम्मेलन में अकेले दिल्ली से 30 प्रतिनिधियों और उड़ीसा से 43 शिक्षकों सहित विभिन्न प्रदेशों से प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इसका उद्घाटन करने के लिये हमने श्री जौहर साहब से प्रार्थना की थी। उस समय वे नैनीताल में थे। उनका स्वास्थ्य बहुत खराब चल रहा था और बिस्तर से उठ पाने की भी शक्ति नहीं थी। लेकिन उनके अदम्य साहस और इच्छा शक्ति से असंभव भी संभव हो जाता था, इसका हमें पता था, इसलिये हम आने के लिये आग्रह करते रहे। उनका ‘न’ भी बराबर आता रहा। 24 को दिल्ली से आने वाले दल के साथ जब वे नहीं आये तो लगभग तय हो गया कि उनका पहुँच पाना संभव नहीं है। 24 को सम्मेलन प्रारंभ हो गया। 25 की शाम को लगभग 5 बजे उनका स्टेशन बैगन जब माँ मंदिर आ धमका तो हमारे सुखद आश्चर्य का पारावार नहीं था। वे बीमारी की गंभीर अवस्था में ही स्टेशन बैगन में लेटे-लेटे नैनीताल से दिल्ली होते हुये तीन दिन में माँ मंदिर पहुँचे थे। 1200 किलोमीटर की लम्बी यात्रा स्टेशन बैगन में बिना भोजन व विश्राम के!! जब वे पहुँचे तो उनका शरीर पूरी तरह निर्जीव हो चुका था - न उठने की शक्ति थी और न बोलने की। उन्हें स्टेचर में कमरे तक ले जाया गया। बिना हिले-डुले, बिना बोले, बिना अन्न-जल ग्रहण किये वे रातभर पत्थर की तरह लेटे रहे। 27 की सुबह वे लान में कुर्सी पर बैठे चाय पीते दिखे। प्रसन्नता हुई। आकर मैंने चरण स्पर्श किया।

‘कैसे हैं?’ ‘ठीक हूँ।’ ये दो शब्द हमारे बीच के अंतिम सम्वाद सिद्ध होंगे - यह मुझे मालूम नहीं था।

लेकिन जिस प्रकार उनके आगमन ने हमें आश्चर्य चकित किया उसी प्रकार उनके अंतर्धान ने भी हमें चकित किया। चाय पीने के बाद वे कितनी देर गायब हो गये - इसका किसी को पता नहीं चला - यहाँ तक कि उनकी छाया करुणा दीदी को भी नहीं। शाम को लगभग 4.30 बजे मैहर से आये सन्देशवाहक से पता चला कि जौहर साहब खजुराहो से हवाई जहाज पकड़कर दिल्ली चले गये। हम सभी दंग रह गये।

एक सप्ताह बाद हमें पता चला कि बीमारी की गंभीर अवस्था में वे दिल्ली से तुरंत खुर्जा पहुँचे, जहाँ वैद्यराज के निर्देशन में उनका आयुर्वेदिक इलाज शुरू हुआ।

उनके अद्भुत ढंग से प्रकट होने और अदृश्य हो जाने का राज किसी को मालूम नहीं हो पाया। बार-बार के पूछने के बाद उन्होंने इतना ही पत्र में संकेत दिया कि उनका आना-जाना या चलना-फिरना - कुछ भी उनके हाथ में नहीं था सबकुछ एक अदृश्य शक्ति द्वारा संचालित होता था। और कहा - इस बात को समझाया नहीं जा सकता। उन्होंने इसके पूर्व भी लिखा था कि पाण्डिचेरी छोड़कर उनका कहीं भी आना-जाना नहीं होता। श्रीमाँ के शरीर त्याग के बाद अब वहाँ भी जाना संभव नहीं होता। (12/4/80) लेकिन माँ मंदिर के साथ उनका लगाव विशिष्ट था। एक अपवाद था क्योंकि उनके सारे आगमन बाद में ही हुये।

भगवान् के लिये उनका आत्मदान और समर्पण अद्वितीय है। आत्मिक उत्थान के इतिहास में सम्पूर्ण समर्पण का उनका जैसा दूसरा उदाहरण पाना कठिन है। उनकी 'Fateful Journey' स्वयं उनकी फकीरी व नियति का हाल कह देती है - ‘मैं (पाण्डिचेरी में) अपने दिल को खो बैठा लेकिन आत्मा को जीत लिया।’ अपने स्वयं के आलीशान महल के दरवाजे पर माँ की ओर से चौकीदारी करना अपना सौभाग्य माना। और जितना ही उन्होंने आत्मदान किया, उतना ही अधिक कष्ट झेला। उनके असह्य कष्टों और वेदना के अकत्थ्य वरदानों पर पूरा एक वृहद ग्रंथ ही लिखा जा सकता है।

 

उनका चुम्बकीय क्षेत्र

जो भी व्यक्ति जाने-अनजाने उनके विस्तृत प्रभामण्डल या चुम्बकीय क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ, हमेशा के लिये पकड़ा गया। वे दिव्य जीवन की तरंगों और उनके स्पन्दनों के विज्ञान को अच्छी तरह समझते थे और उन्हें जीते थे। वे दूसरों को इन दैवी स्पन्दनों के जाल में तो फँसाते ही थे, वे दूसरों के अदिव्य स्पंदनों से अपनी रक्षा करने का गुर भी जानते थे। वे लोग जो उनके इन दिव्य स्पन्दनों के बारे में अवगत थे अकसर इन्हें घेरे रहते थे, इन्हें स्पर्श करते रहते थे और इनसे लिपट भी जाते थे। मुझे यह सब तब ज्ञात हुआ जब एक संध्याकालीन प्रार्थना में उन्होंने मेरे कान में यह कहते हुये आपसी समझौता किया, ‘मुझसे सटकर बैठिये वरना वे महिलायें आकर झट से मेरे और आपके बीच में बैठ जाएंगी। इन संसारी लोगों के स्पन्दन बहुत बुरे होते हैं; बहुत सारे मेरे कष्ट इन स्पन्दनों के कारण ही मुझे भोगने पड़ते हैं।’

कितनों ही व्यक्तित्व, उदाहरणार्थ, डॉ0 के.आर. श्रीनिवास आयंगर, कुलपति डॉ0 डी.एस. कोठारी, पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री शिवदयाल जी, पूर्व न्यायाधीश श्री रंगराजन, आचार्य कृपलानी, पूर्व वाइस मार्शल श्री सुरेन्द्र जी, स्वामी नित्य चैतन्य यती जैसे कितनी ही हस्तियाँ उनके कुछ क्षणों के सत्संग से प्रेरणा लेने और हँसी-मजाक के बीच अमूल्य स्पन्दनों का स्पर्श पाने के लिये सत्संग में आती रहती थीं। तनिक सी भी ग्रहणशीलता के लोग उनकी ओर बरबस खिंच आते थे, क्योंकि उनका सामीप्य अत्यधिक आकर्षक था। यही लोग बाद में आश्रमवासी हो जाते थे। मेरे मित्र श्री नलिन जी ढोलकिया मेरे साथ पहली बार नैनीताल गये। उनका उद्देश्य तो खाली सैर सपाटा व मनोरंजन ही था। एक दिन सामूहिक प्रार्थना के समय उन्होंने ढोलकिया जी को बडे़ स्नेह से बुलाकर अपने पास बैठ जाने को कहा। उसके बाद उन्हें नित्य प्रति अपने पास बिठाने लग गये। मैं तुरन्त समझ गया - ये गये काम से। वही नलिन जी जो कभी श्रीअरव