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फकीर के साथ कुछ अविस्मरणीय क्षण

 

डॉ0 के0एन0 वर्मा

‘कोई नेता जी आये हैं। लम्बा कोट चूड़ीदार पायजामा और गाँधी टोपी - एकदम खद्दरधारी। कोई छः फुट लम्बे होंगे। पूछते हैं - कहाँ हैं वर्मा जी?’ माली ने दौड़ते हुये सन्देश दिया।

 

मैं सम्मेलन की तैयारी में व्यस्त था। थोड़ा झुँझलाकर बोला, ‘नेताओं को इसी समय आना था? पूछा नहीं कहाँ से आये हैं? कितने लोग हैं? कार में हैं या पैदल?’

‘अकेले ही पैदल हैं। लगता है सम्मेलन में आये हैं।’ माली ने संकेत दिया।

‘नेता और आश्रम का सम्मेलन! कोई तुक नहीं।’ तब तक वे माँ मन्दिर के दरवाजे तक गेट के भीतर प्रवेश कर चुके थे। पहली पहली मुलाकात थी फिर भी मैंने दौड़कर चरण पकड़ लिया।

‘अच्छा तो आप ही वर्मा जी हैं? सुना यहाँ कोई सम्मेलन होने वाला है लेकिन यह कैसा सम्मेलन है? कोई जंका मंका नहीं। बाजे गाजे भी नहीं। कोई चहल-पहल भी नहीं है। पण्डाल भीड़ और मंच कहाँ है?

‘माँ मन्दिर के पीछे छोटा सा पण्डाल है पिता जी। भीड़ राजनेताओं के पीछे कहीं शहरों में नारे लगा रही होगी।’

तभी माँ मन्दिर के गेट पर कार आकर रुकती है। एक दिव्य मूर्ति उतरती है। किसी तरह अपनी हँसी को रोकते हुये दूर से ही माँ मन्दिर को प्रणाम करती हुई सम्मुख खड़ी हो जाती हैं। ‘ये करुणा जी हैं’ जौहर साहब ने मुस्कुराते हुये उनका परिचय कराया। फिर जोर का ठहाका।

‘मैंने तो सोचा था - वर्मा को सरप्राइज देकर बुद्धू बनाऊँगा पर ये तो समझदार निकले।’ कार को दूर छोड़कर पैदल आने का यही रहस्य था।

यह 12 मार्च 1979 का अखिल भारतीय साधना सम्मेलन था जिसके उद्घाटन के लिये वे सबसे पहली बार माँ मन्दिर आये थे।

 

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यों तो सम्मेलन 4 दिवसीय था पर दिनाँक 14 की शाम को जोर का अंधड़ आया और सामियाना नीचे। श्री जौहर साहब जिन्हें हम प्यार से पिताजी कहते थे, करुणा दीदी के साथ तुरन्त तैयार होकर जाने के लिये कार में बैठ चुके थे। किसी ने मुझे जगाया - ‘जौहर साहब जा रहे हैं।’ मैंने जैसे-तैसे बनियान बदन में डाली और दौड़ते हुये गेट पर पहुँचा। आरजू मिन्नत की कोई सुनवाई नहीं हुई। ‘मैं तो भगवान् का आदेश पाकर ही जा रहा हूँ। उन्होंने पण्डाल गिरा दिया, मतलब सम्मेलन का समापन हो गया, फिर अब काहे को रुकना, पिता जी ने सफाई दी। कार के भीतर मैं पैर छू रहा था तभी उन्होंने इशारा किया। कार का फाटक जल्दी से करुणा दीदी ने बन्द कर लिया। कार चल चुकी थी। मैं कैद हो गया। दोनों की हँसी नहीं रुक पा रही थी। दिन दहाड़े मेरा अपहरण हो गया। केवल आँख में पट्टी नहीं थी।

 

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अब मैं सण्डरसन एण्ड कंपनी के विश्रामगृह सोहावल में था। माँ मन्दिर से कार जो चली तो वहीं जाकर रुकी। सम्मेलन में वे काफी थक चुके थे। विश्राम के लायक उस समय माँ मन्दिर में सुविधा नहीं थी। लम्बे विश्राम के बाद रात के भोजन के समय सम्वाद का पहला सत्र शुरू हुआ। जौहर साहब बोले -

‘मैं आप दोनों भाइयों से बहुत खुश हूँ। माँ के प्रति आपकी तीव्र प्यास को देखकर सोचा कहीं एकान्त में सत्संग हो और मैं माँ के पावन प्रसंगों को सुनाकर आप लोगों की क्षुधा को शांत करूँ। मेरे पास इन प्रसंगों का इतना बड़ा खजाना है कि महीनों, वर्षों तक मैं सुनाता रह सकता हूँ। सचमुच में आज की व्यस्त दुनिया में इन संस्मरणों को सुनने वाले मिलते कहाँ हैं? बहुत दिनों बाद इतनी अभीप्सा वाली आत्माओं को मैंने पाया जिन्हें खजाना लुटाने में मुझे कोई संकोच नहीं।’

हम कभी तो हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते, कभी अभीप्सा की आग में धधकने लगते। इतना आनन्द कि आँखों और बहते नथुनों से भक्ति की धारा बह चलती। जितना ही सुनते उतनी ही प्यास बढ़ती जाती। दो तीन सत्र प्रतिदिन चलते। सुबह नास्ते की मेज पर शाम को चाय के समय और रात्रि को भोजन के बाद। इन संस्मरणों का संकलन श्डल डवजीमतश् में प्रकाशित हो चुका है। शायद इस सत्संग के कारण ही उन्होंने स्नेहवश प्रारंभ के दो शब्द मुझसे लिखने का आग्रह किया। मुझ पर अपार प्रेम और अनुग्रह का यह दस्तावेज मेरी आत्मा को आज भी झकझोर देता है।

 

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दिल्ली वापस जाते ही उन्होंने तार देकर मुझे बुला लिया। मैं बीमार था फिर भी त्रियुगी जी को साथ लेकर पहुँचा। श्रीअरविन्दाश्रम दिल्ली शाखा की यह मेरी पहली यात्रा थी। जिस आत्मीयता के साथ उन्होंने मुझे भेंटा वह मेरे लिये उनकी अगाध सहृदयता का अविस्मरणीय शिलालेख बन चुका है। स्वयं चलकर आश्रम के प्रत्येक विभाग का उन्होंने दिग्दर्शन कराया, विद्यालय में बच्चों को सम्बोधित कराया और एक भव्य आयोजन में दिल्लीवासियों के बीच प्रमुख वक्ता के रूप में सम्मुख कर दिया। बीमारी जब गंभीर रूप लेने लगी तो करुणा दीदी के साथ दिन में कई बार आकर मेरे सिरहाने में बैठते, अपने अर्थपूर्ण चुटकुलों और संस्मरणों से मुझे हँसा हँसाकर जी हल्का करने का प्रयास करते। लौटते समय उन्होंने सुरक्षा कवच का पुष्प दिया जिसका प्रभाव अद्भुत था। मैं ट्रेन में पूरी रात माँ वैदेही के रूप में भगवती को अपने सिरहाने पर बैठे देखा और उनसे बतियाता रहा। सतना स्टेशन पहुँचते-पहुँचते मैं भगवती की इस कृपा में सरावोर होकर नहा चुका था और आँसुओं से मेरी कमीज भीग चुकी थी। मैं महीने भर इस अद्भुत छाँव को अपने चैत्य पटल पर अंकित भाव के साथ अनुभूत कर रोमांचित होता रहा। बीमारी की गंभीर अवस्था में भी मैंने इस सम्बंध में अपने उद्गारों को रोक नहीं पाया और ‘दिल्ली की रामायण’ शीर्षक से कर्मधारा में एक लेख लिखा। यह पुराना लेख मेरी आत्मा की एक धरोहर है।

दिल्ली से लौटकर सीधे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। निदान में पता चला मुझे प्लूरसी है जो अंतिम चरण में चल रही है। फेफड़ों से तीन बोतल पानी निकाला गया। समाचार पाकर पिता जी (जौहर साहब) चिंतित हुये। एक माह तक अस्पताल में जब जीवन और मृत्यु के बीच मैं जूझ रहा था तो लगभग प्रतिदिन लिफाफे में उनका Protection flower आशीर्वाद और शान्ति के रूप में प्राप्त होता रहा। मेरी बीमारी के सामने वे अपनी बीमारी भी भूल गये। सुरक्षा पुष्प के साथ उनका पत्र होता जिसमें लिखा होता - ‘मैं आपकी बीमारी से बहुत चिंतित हूँ और आपके लिये माँ से प्रार्थना करता हूँ। अपने नित्य प्रति की स्थिति के बारे में मुझे अवगत कराना न भूलें। स्नेह सहित मेरे आशीर्वाद।’

अस्पताल से छुट्टी होते ही उन्होंने अपने पास मुझे स्वास्थ्य लाभ के लिये सीधे नैनीताल बुला लिया। उनका सामीप्य किसी भी दवा या चिकित्सा से अधिक प्रभावशील था। उनके पावन प्रसंगों और संस्मरणों का एक और लम्बा दौर चला और महीने भर के भीतर मैं पूर्ण स्वस्थ हो गया। इस बीच उन्होंने लगभग पूरे समय वहाँ अपने साथ अपने ही कमरे में रक्खा। यह शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मेरे मानसिक स्वास्थ्य के भी सुधार का एक अवसर था। वे एक दिन कहने लगे - ‘वर्मा जी आप यहाँ वहाँ लम्बे-लम्बे व्याख्यान देने जाते हो, मोटी-मोटी पुस्तकें लिखते हो, रात-दिन केन्द्र के बाद केन्द्र खोलने में व्यस्त रहते हो और शरीर की परवाह न करके भी माँ के कार्य के लिये योजनाओं की दीवार उठाते रहते हो। मैं सत्तर साल के अनुभव से बताता हूँ कि यह कुछ भी काम नहीं आयेगा। एक व्यक्ति भी साधना के लिये माँ मन्दिर नहीं आयेगा। कोई भी इन पुस्तकों को नहीं पढ़ेगा। इन केन्द्रों में 10 मि0 भी बैठने की भला किसे फुर्सत है? अतएव अपने शरीर का ध्यान रखते हुये अधिक श्रम से बचिये। बिना उसकी इच्छा कुछ भी नहीं हो सकता। माँ की इच्छा और उसके संकेतों की प्रतीक्षा कीजिये। उन्हें ही पढ़िये। इन संकेतों के अनुसार ही कुछ होगा।’

पिता जी के ये वाक्य आज भी मेरे कानों में बार-बार ध्वनित और प्रतिध्वनित होते हैं और इनकी सत्यता प्रमाणित हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि सारे प्रयास व्यर्थ गये। लाखों के सुन्दर-सुन्दर आवास और पुस्तकालय जिज्ञासुओं और साधकों के अभाव में रीते खडे़ हैं। सारी सुविधायें अपनी उपयोगिता तलाश रही हैं। शोध संस्थान को दीमक चट रहे हैं। साधना और सत्संग के नाम पर लोग व्यवसाय और दुकानें ढूँढ़ते हैं। शिक्षा मेकाले का ही नाम रट रही है।

एक दिन वे नीम करोली बाबा के कैंची धाम मुझे ले गये। बहुत अच्छा स्थान है। प्राकृतिक दृश्य मनोरम है। बाबा जी ने बडे़ प्रेम से उनका स्वागत किया। आश्रम की ओर से कुछ बनवाने के लिये थोड़ी नापजोख भी कराई। लौटे तो बारह पत्थर से करुणा दीदी बाजार की ओर चली गईं। हम दोनों वहीं से वननिवास की ओर की चढ़ाई चढ़ने लगे। चढ़ाई में हम दोनों की सांस फूल रही थी। एक-एक कदम हम आगे को खिसका रहे थे कि उन्होंने सहारे के लिये मेरा कंधा पकड़ा। मुझे अतीव आनन्द का अनुभव हुआ और थकान कृतज्ञता में बदल गई। तभी सड़क के किनारे पर 2 ईंटें पड़ी दिख गईं। वे कंधा छोड़कर ईंटों की ओर लपके। उन्हें समेट कर फिर सहारा लेकर आगे चले। ‘देखा आपने? एक ईंटा यहाँ 5 रुपए में पड़ता है। गधों की पीठ पर लादकर इन्हें ऊपर चढ़ाया जाता है, लेकिन ये नमक हराम ईंटे रास्ते में गिराकर सैकड़ों का रोज वारा-न्यारा कर देते हैं, गंभीर होकर वे बोले। थोड़ी दूर में एक और ईंटा पड़ा था। उसे भी भला वे क्यों छोड़ने लगे। तात्पर्य यह कि धीरे-धीरे एक गधे का बोझ उन्होंने समेट लिया। अब मेरी हालत खराब हो गई थी। बड़ी मुश्किल से मंजिल सामने दिखी और पूर्ण योग पूरा हुआ।

 

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उनके जीवन के अंतिम छः वर्षों में ही मुझे उनके सानिध्य का सौभाग्य मिला लेकिन इस थोड़े से समय ने ही मुझे नई दिशा और समर्पण की सही परिभाषा का बोध कराया। प्रारंभिक दो वर्षों के भीतर ही हमने लगभग 200 पत्रों का आदान-प्रदान किया। मैं हमेशा उन्हें ‘पूज्य पिताजी’ शब्द से पत्रों में सम्बोधित किया करता था। एक बार उन्होंने उत्तर में सम्बोधित कर दिया ‘मेरे बनावटी पुत्र (My Artificial son)'। फिर क्या था। मैं सीधे दिल्ली शिकायत लेकर पहुँच गया। देखते ही लगे हँसने, ‘देखो करुणा। The artificial son has come.' शिकायत पर सफाई देते हुये बोले - ‘वैसे तो न आने के लिये आप हजार बहाने बनाते।’ इस रामबाण में बहाने की कोई गुंजाइश न थी ऐसा सोचकर तीर चला दिया।’

थोडे़ ही दिनों में उन्होंने सम्बोधित किया -
दिनांक: 5-9-1981
मेरे शाश्वत पुत्र,

मैं आपके हृदय की छटपटाहट को समझता हूँ. . .
मैं हमेशा शाश्वत काल तक आपके साथ रहूँगा।

स्नेह सहित - एस.एन. जौहर

 

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अपने छः वर्ष के अंतिम समय में वे माँ मन्दिर तीन-चार बार आये। जब भी वे यहाँ आते उनके साथ आधा दर्जन देश-विदेश के भक्त भी होते। कई दिन यहाँ ठहरा करते। सुबह शाम उनके सत्संग के सत्रों में गाँव वाले उन्हें घेर कर बैठ जाते। प्रतिदिन पूरा बोरा भरकर प्रसाद रीवा से मँगाते और सत्संगियों को बाँटते। उनका जीवन गाँव से लेकर देश की राजधानी तक, एक श्रमिक से लेकर सिकन्दर तक और चूने कोयले माटी से लेकर मोती जवाहर और जौहरी तक विस्तृत व तपा हुआ था इसलिये हर तपके के लोगों के साथ घुल मिलकर उन्हें अपना बना लेते थे। इस गाँव के लोगों को उन्होंने इसी विशेषता के कारण भरपूर प्यार बाँटा जिसे लोग आज भी नहीं भुला पा रहे हैं। सितम्बर 1984 में उनका अन्तिम पदार्पण हुआ था। माँ मन्दिर में अखिल भारतीय श्रीअरविन्द शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसका संचालन सुश्री तारा जौहर के सौजन्य से हो रहा था। इस सम्मेलन का उद्घाटन करने के लिये मैंने बार-बार उनसे निवेदन किया था। तब वे नैनीताल में थे। उन दिनों उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था इसलिये आने में असमर्थता प्रकट की। लेकिन सम्मेलन के ठीक दूसरे दिन शाम को जब एकाएक वे माँ मन्दिर में प्रकट हो गये तो सभी को आश्चर्यानन्द हुआ। वे सीधे नैनीताल से इतनी लम्बी यात्रा लेटे-लेटे स्टेशन वैगन में की थी। उठकर बैठ सकने तक की शक्ति उनके शरीर में नहीं थी और लोगों ने टांग कर उन्हें बिस्तर पर लिटाया। पूरी रात वे हिले तक नहीं, एक भी शब्द बोल नहीं सके भोजन पानी लेने का तो प्रश्न ही न था। विश्राम के बाद सुबह उन्होंने एक कप खाली चाय ली। मैंने प्रणाम कर हाल पूछा। ‘ठीक हूँ’ बस इतना ही कहा। मुझे नहीं मालूम था कि ये दो शब्द हमारे साक्षात्कार के अन्तिम शब्द होंगे। कोई नहीं जानता वे कब गाड़ी पर बैठे और माँ मन्दिर में जैसे वे एकाएक प्रकट हुये थे, एकाएक अदृश्य भी हो गये। शाम को 4.30 बजे मैहर से सन्देश मिला कि वे खजुराहो से फ्लाइट लेकर दिल्ली पहुँच रहे होंगे। हममें से कोई कुछ भी नहीं समझ पाया। एक सप्ताह बाद खुर्जा से करुणा दीदी ने समाचार दिया - ‘चाचा जी का वैद्य जी द्वारा सघन उपचार चल रहा है। काफी गंभीर हालत में वे यहाँ पहुँचे।’

यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि प्राणों की जोखिम उठाकर भी वे कैसे मां मन्दिर में उपस्थित हो गये। मेरे बार-बार के पूछने पर उन्होंने इतना ही लिखा कि, ‘मैं अपनी इच्छा से कोई कार्य नहीं करता। मैं स्वयं नहीं जानता कि मुझे वहाँ किसने और क्यों भेजा।’ निश्चित है किसी दैवी आदेश का उन्होंने पालन किया। यह घटना यह दर्शाती है कि मां मन्दिर के साथ उनकी चेतना का कितना प्रगाढ़ सम्बंध था। आज भी जब वे पार्थिव शरीर में नहीं हैं उनकी अनवरत उपस्थिति और मार्गदर्शन का यहाँ जीवन्त बोध होता है।

 

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महासमाधि के एक दिन पूर्व की घटना के सम्बंध में पहले भी लिख चुका हँू। उस दिन लगभग 2-3 बजे दिन को एकाएक ऐसा लगा कि मुझे दिल्ली आना चाहिए। उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा है इसका पता तो मुझे था पर कोई गंभीर बात हुई, इसका पता नहीं था। भीतर से जब एक अजीब बेचैनी होने लगी तो मुझे उसी शाम की गाड़ी से दिल्ली रवाना होना पड़ा। पहुँचने पर पता चला वे एक निजी अस्पताल में मूर्छित अवस्था में कई दिन से चल रहे हैं। चिंता हुई और शीघ्र ही अस्पताल पहुँचा। दर्शन कर चरणों के पास ध्यान में बैठ गया। 10 मिनट के भीतर उन्होंने शरीर छोड़ दिया। सारा कमरा एक घनीभूत चेतना की गहन शान्ति में डूब गया। हम 4 व्यक्ति भी जो उस समय वहाँ उपस्थित थे, उस रहस्यमयी शान्ति में निमग्न हो गये। महाप्रयाण के समय भी सनातन रिश्ते में अपनी पक्की गांठ लगाना वे नहीं भूले। इस चिरन्तन समाधि पर मेरी कृतज्ञता के दो पुष्प।