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Divyanter e-Magazine August - Sept 2011 दिव्यांतर (ई पत्रिका) अगस्त - सितम्बर २०११

श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर (Shri S.N.Jauhar) Shri Aurobindo Ashram Delhi Branch

हमारी मासिक पत्रिका दिव्यांतर (ई पत्रिका) में पढिये श्री अरविन्द के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘सावित्री’ का हिन्दी गद्य में अनुवाद
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श्रीअरविन्द

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श्रीअरविन्द का जन्म कृष्ण जन्माष्टमी 15 अगस्त, 1872 को कलकत्ते के एक समृद्ध डाक्टर श्री कृष्णधन घोष के यहाँ हुआ था। जब वे सात वर्ष के थे उन्हें शिक्षा के लिये अपने भाइयों के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया गया, वहाँ वे चौदह वर्ष रहे। वहाँ उन्होंने ग्रीक, लेटिन, के अतिरिक्त फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन, स्पेनिश आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया।
श्री कृष्णधन घोष की प्रबल इच्छा थी कि श्रीअरविन्द आई.सी.एस. की प्रतियोगिता में भाग लें और भारत में आकर एक उच्च पद पर सरकार की सेवा करें। अपने पिता की इच्छा का सम्मान करने की दृष्टि से वे आई.सी.एस. की परीक्षा में बैठे और आशातीत अंक प्राप्त करते हुये परीक्षा में सफल हुये। परन्तु श्रीअरविन्द की इसमें रुचि न थी। वे जानबूझकर घुड़सवारी की परीक्षा देने नहीं गये। श्रीअरविन्द ने बहुत बाद में एक दिन अपनी सन्ध्याकालीन वार्ता में बताया कि इस परीक्षा में सम्मलित न होने का कारण अंग्रेजों की नौकरी के प्रति घृणा की भावना थी। जनवरी 1893 में श्रीअरविन्द भारत लौटे।

श्रीअरविन्द ने बम्बई के अपोलोबन्दर में ज्यों ही भारत भूमि में अपना पैर रखा एक अविरल शान्ति ने उन्हें अधिकृत कर लिया था। सयाजी राव गायकवाड़ ने श्रीअरविन्द को बड़ौदा सरकार की नौकरी के लिये चुन लिया। यहाँ उन्हें विभिन्न प्रकार के काम दिये गये। वे कॉलेज में अंग्रेजी और फ्रेन्च के प्रोफेसर भी रहे और प्रशासक भी। यहाँ रहकर उन्होंने गुजराती, मराठी, बंगला तथा संस्कृत आदि भाषाओं का अध्ययन किया। इसके साथ ही भारतीय संस्कृति का गहरा अध्ययन किया तथा लेखन कार्य करते रहे। उन्होंने तेरह वर्ष बड़ौदा रजा की प्रशासकीय और शैक्षिक सेवाओं में लगाये। ये आत्म-प्रशिक्षण, साहित्यिक क्रिया-कलाप और भावी कार्य की तैयारी के वर्ष थे। बड़ौदा में श्रीअरविन्द ने काली के दिर्शन किये और इसी काल में निर्वाण की अनुभूति प्राप्त की। उन्हीं दिनों ‘भवानी मन्दिर’ की योजना तैयार की गयी जिसमें भारत माता के नि:स्वार्थ सेवकों के प्रशिक्षण की बात की गयी थी। श्रीअरविन्द का बड़ौदा प्रवास साधना और विकट आत्म संयम का समय रहा। साहित्य साधना एवं आध्यात्मिक अनुभव का श्रीगणेश बड़ौदा में ही हुआ। श्रीअरविन्द ने बड़ौदा में अपनी आध्यात्मिक और राजनीतिक दोनों ही तैयारियाँ कीं। बड़ौदा निवास में ही श्रीअरविन्द का विवाह 29 वर्ष की अवस्था में भूपालचन्द्र बसु की सुपुत्री मृणाणिनी देवी से हुआ। अपनी पत्नी को भी आरम्भ से ही एक आध्यात्मिक जीवन की ओर ले जाने का इनका अथक प्रयास रहा है।



सन् 1906 में बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई। श्रीअरविन्द को इस महाविद्यालय के प्रिंसिपल पद को सँभालने के लिये आमन्त्रित किया गया, तब श्रीअरविन्द बड़ौदा राज की प्रतिष्ठित नौकरी को छोड़ कर आ गये और कलकत्ता आकर नेशनल कॉलेज के पहले प्रिंसिपल बन गये। वहाँ से भी उन्होंने शीघ्र ही त्याग पत्र दे दिया ताकि स्वाधीनता संग्राम में खुलकर भाग ले सकें।


कलकत्ता आते ही श्रीअरविन्द उस राष्ट्रीय आन्दोलन की आग में निर्भीकता से कूद पड़े जिसमें बंग-भंग के प्रश्न को लेकर सारा बंगाल और उत्तर भारत सुलग रहा था। बंगाल को इस समय ऐसे ही निर्भीक और ओजस्वी राष्ट्रनायक की आवश्यकता थी। श्रीअरविन्द ने खुलकर इस आन्दोलन में भाग लिया और राष्ट्र के आह्वान पर अपनी सारी सेवायें अर्पित कर दीं और लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक और विपिनचन्द्र पाल के साथी के रूप में देश के प्रमुख नेताओं में गिने जाने लगे।


श्रीअरविन्द ने देश को स्वाधीनता संग्राम में भाग लेना सिखाया। श्रीअरविन्द शायद कांग्रेस-मंच से पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले पहले नेता थे। सारा देश जाग उठा और अपनी बलि चढ़ाने के लिये तैयार हो गया।


श्रीअरविन्द राष्ट्रीय दल के कार्यक्रमों में हर प्रकार से सहयोग देते रहे, क्रान्तिकारी कार्यक्रमों को छोड़ दिया और जनमत तैयार करने के लिये विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख या सम्पादकीय लिखते रहे। श्रीअरविन्द ‘वन्दे मातरम्’ का प्रकाशन शुरु किया और वह अपने समय का सबसे लोकप्रिय अखबर बन गया। ‘वन्दे मातरम्’ में उनके सम्पादकीय लेखों ने उन्हें अखिल भारतीय ख्याति दिला दी। उस समय अंग्रेज कहते थे ‘‘ ‘वन्दे मातरम्’ की एक-एक पंक्ति में राजद्रोह भरा है, लेकिन इस चालाकी से छिपाया गया है कि उस पर मुकदमा नहीं चल सकता।’’ तत्कालीन वाइसराय के निजी सचिव ने लिखा था - ‘‘अगर सब क्रान्तिकारी जेल में भर दिये जायें, केवल श्रीअरविन्द ही बाहर रहें तो वह फिर से क्रान्तिकारियों की एक सेना खड़ी कर लेंगे।’’ श्रीअरविन्द ने कांग्रेस की मन्द और प्रभावशून्य नीति में क्रान्ति ला दी, राष्ट्रीय चेतना में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य दिया। देश के लिये एक नया राजनैतिक कार्यक्रम दिया और स्वाधीनता आन्दोलन को एक नयी दिशा दी।


श्रीअरविन्द के लिये भारतवर्ष देश का टुकड़ा, पर्वत, खेत, जंगल, और नदियों का नाम न था। उनके लिये भारत माता एक देवी थी। माँ थी। वे अपनी पत्नी के नाम एक पत्र में लिखते हैं : ‘‘अन्य लोग अपने देश को एक जड़ पदार्थ, खेत, मैदान, जंगल, पर्वत और नदियाँ ही मानते हैं और कुछ नहीं पर मैं इसे अपनी माता मानता हूँ। मैं इसकी भक्ति और पूजा करता हूँ। यदि पुत्र यह देखे कि एक राक्षस उसकी माँ की छाती पर बैठा उसका रक्तपान करने के लिये उद्यत हो तो भला लडक़ा क्या करेगा ? क्या वह तब शान्त मन से भोजन करने बैठ जायगा और अपने स्त्री बच्चों के साथ आनन्द मनायेगा या माँ का उद्धार करने के लिये दौड़ पड़ता है ? मैं जानता हूँ कि मुझमें इस पतित जाति का उद्धार करने की शक्ति है, शारीरिक शक्ति नहीं, तलवार या बन्दूक लेकर मैं युद्ध करने नहीं जा रहा हूँ, वरन् ज्ञान की शक्ति है। क्षत्रिय का बल ही एकमात्र बल नहीं है, ब्रह्म तेज भी है। यह तेज ज्ञान के ऊपर प्रतिष्ठित होता है। यह भाव नया नहीं है, आजकल का नहीं है, इस भाव को लेकर ही मैंने जन्म ग्रहण किया है, यह भाव मेरी नस-नस में भरा है, भगवान् ने इसी महाव्रत को पूरा करने के लिये मुझे पृथ्वी पर भेजा है। चौदह वर्ष की उम्र में इसका बीज अंकुरित होने लगा था, जब 18 वर्ष का हुआ तो जड़ें पक्की हो गईं।’’


सन् 1908 से 1909 तक अंग्रेज सरकार ने श्रीअरविन्द को बन्दी बना कर अलीपुर जेल में रखा। जेल के अन्दर उन्हें ध्यान, धारणा और योगाभयास के लिये पर्याप्त समय मिलने लगा। कारागार उनके लिये तपोवन बन गया, कारागार में उन्हें कृष्ण का अन्तर्दशन हुआ। यहीं उन्हें विवेकानन्द का गीता पर प्रवचन सुनाई पड़ा। यहीं अतीत की बड़ी बड़ी आत्माओं ने इनके साथ सम्पर्क किया। अंग्रेजों की पार्लीमेन्ट ने श्रीअरविन्द के मामले पर कई घंटो तक बहस की, परन्तु श्रीअरविद के विरुद्ध कोई अभियोग सिद्ध न हो सका, इसलिये उन्हें छोड़ दिया गया।


1910 में श्रीअरविन्द को अन्दर से आदेश मिला कि पांडिचेरी चले जाओ। अन्तर्रात्मा की पुकार पर श्रीअरविन्द ने राजनीति क्षेत्र छोड़ दिया और अपने-आपको पूरी तरह आध्यात्मिक लक्ष्य के विकास लिये अर्पित करने के लिये 4 अप्रैल 1910 को पांडिचेरी आ गये। इसके बाद उन्होंने कभी राजनीति में सक्रिय भाग नहीं लिया। चार वर्ष के मौन योग के बाद 1914 में उन्होंने दर्शन संबंधी मासिक पत्र ‘आर्य’ का प्रकाशन शुरू किया जिसके द्वारा उन्होंने मानव जाति के लिये अपने नये सन्देश को प्रकट किया : मानव जाति की दिव्य नियति (दिव्य जीवन), उसकी प्राप्ति का मार्ग (योग-समन्वय), मानव समाज की दिव्य भविष्य की ओर प्रगति (मानव-चक्र), मानव जाति के ऐक्य की चरितार्थता (मानव एकता का आदर्श), भारतीय आध्यात्मिकता और संस्कृति का आन्तरिक अर्थ और प्रतीक (भारतीय संस्कृति का आधार, वेद पर, उपनिषद, गीता-प्रबन्ध) काव्य की प्रकृति और उसका विकास (भावी कविता)। काव्य में उनकी सर्वोत्कृष्ठ कृति है ‘सावित्री’, लगभग चौबीस हजार पंक्तियों की अनुकान्त कविता।


1910 से 1937 तक अंग्रेज गुप्तचर उनके मकान के चारों ओर चक्कर लगाया करते थे। क्योंकि अंगे्रज सरकार का गुप्तचर विभाग यह मानने को तैयार न था कि उन्होने राजनीति में सक्रिय भाग लेना बंद नहीं किया है। तत्कालीन मद्रास के मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचार्य ने यह पहरा हटाया। इस प्रसंग के संदर्भ में 25 अप्रैल, 1914 को दिया हुआ माताजी का वचन उल्लेखनीय हैं -


‘‘श्रीअरविन्द राजनीति से अलग हो गये थे और उनके आश्रम के महत्वपूर्ण नियमों में से एक यह है कि सब प्रकार की राजनीति से अलग रहा जाय। यह बात नहीं है कि श्रीअरविन्द को संसार की गतिविधि में रस नहीं था, बल्कि इसलिये कि आजकल राजनीति एक बहुत निम्न कोटि की और भद्दी चीज है जो पूरी मिथ्यात्व, चालाकी, अन्याय, शक्ति का दुरुपयोग आदि से भरी है। राजनीति में भाग लेने के लिये कपट, धोखेबाजी और बेतहाशा महत्वाकांक्षा पैदा करने की जरूरत है।


‘‘हमारे योग का आधार है सच्चाई, ईमानदारी, अहंकार का निषेध, भागवत कार्य के लिये नि:स्वार्थ आत्म-दान, चरित्र की उदात्तता और ऋजुता। जो लोग इन आधारभूत गुणों को अपने जीवन में नहीं लाते वे श्रीअरविन्द के शिष्य नहीं हैं और इस आश्रम में उनके लिये स्थान नहीं है। इसलिये मैं आश्रम पर किये गये उन मूर्खतापूर्ण और निराधार आक्षेपों का उत्तर देने से इंकार करती हूँ जो विकृत भावना अैर बुरे इरादे से किये जाते हैं।


श्रीअरविन्द हमेशा अपनी मातृभूमि से प्रगाढ़ प्रेम रखते थे, लेकिन वे चाहते थे कि वह महान्, उदात्त, पवित्र हो, संसार में अपने महान् लक्ष्य के अनुरूप हो। उन्हें यह स्वीकार न था कि वह गन्दे, अधम, अपरिष्कृत, अन्धे, स्वार्थपूर्ण और अज्ञान-भरे पूर्वाग्रहों के स्तर पर उतरे। इसीलिये हम उनकी इच्छा के साथ-साथ चलते हुए सत्य, प्रगति और मानव रूपान्तर की ध्वजा ऊंची उठाते हैं, उन सबकी परवाह न करते हुए जो अज्ञान, मूढ़ता, ईष्र्या और दुर्भावना के कारण उसे गन्दा करना या कीचड़ में घसीटना चाहते हैं - उसे ऊंचे से ऊंचा फहराते हैं, ताकि जिन्हें उससे प्रेम हो वे उसे देख सकें और उसके चारों ओर इकट्ठे हो सकें।’’


श्रीअरविंद ने चालीस वर्ष तक पांडिचेरी में रहकर पृथ्वी पर दिव्य जीवन के लिये प्रसार किया, इस दृष्टि को चरितार्थ करने के लिये उन्होंने अथक परिश्रम किया। इस अंधकार, अनिश्चितता और निराशा के युग में श्रीअरविंद प्रकाशवान और उज्जवल भविष्य की आशा और सन्देश लाते हैं।


श्रीअरविंद ने 5 दिसम्बर 1950 में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया, लेकिन उनके दिव्य दर्शन और आदर्श सारे संसार में लोगों को प्रेरित करते आ रहे हैं।


श्रीअरविन्द कौन थे? कौन हैं? इसका उत्तर श्रीमाँ के शब्दों में

‘श्रीअरविन्द Matter (जड़द्रव्य) की आत्मा हैं, पूरी मानवता की अभीप्सा हैं। वे Matter के भीतर के प्रकाश हैं या जड़ द्रव्य के भीतर आत्मा के अवतार हैं। श्रीअरविन्द ने उस परम परमात्मा से अपने आप को अलग किया, निश्चेतना और अज्ञान का बोझा अपनी पीठ पर ढोते हुये सशरीर जड़द्रव्य के भीतर डुबकी लगाई जिससे वह भागवत जीवन की ओर जागृत हो सके। इसके लिये उन्होंनें परम प्रभु से अपनी कृपा को नीचे उतारने के लिये प्रार्थना की है जिससे कि उनका कार्य पृथ्वी में पूरा हो। इसीलिये उनकी पुकार को सुनकर मैं मानव शरीर में जड़द्रव्य में उतरी, इस कष्ट, पीड़ा और मृत्यु के लोक में आई। हम दोनों के सम्मिलन से ही दुनिया भागवत जीवन के चमत्कार को देखेगी। उन्हीं के कारण मैं अवतरित हुई हूँ । उन्होंने जड़द्रव्य की प्रखर अभीप्सा को ऊपर भेजा और उश्रर में भागवत कृपा ऊपर से नीचे अवतरित हुई। कैसी मंगल वेला थी वह धरती के लिये!! यह अत्यधिक प्रगति करने का अवसर है जिसमें सारा विश्व अपनी सश्रा के लक्ष्य की ओर बड़े उत्साह और स्फूर्ति के साथ बढ़ सकता है। हमारी सहायता से भला ऐसी कौन सी चीज़ है जिसे उपलब्ध करना असंभव हो?’


‘It is only because of SriAurobindo that I can accomplish this work (of radiating divine vibration).He invites me, He opens the door and I enter into the depths of Inconscience and I kindle the light to illumine the atoms in the torpor of Inconscience. I put there a bit of force to awaken them and I give divine love so that they may aspire more.’ The Mother


‘यही वह कार्य है (नयी चेतना का बीज बोना) जिसे मैंने किया है यद्यपि इसे कभी किसी ने नहीं जाना, फिर भी यह कार्य बिना श्रीअरविन्द के, आगे नहीं बढ़ सकता था।’


श्रीमाँ ने बताया - ‘इस जगत के इतिहास में श्रीअरविन्द जिस चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं वह कोई उपदेश नहीं है न ही वह कोई रहस्योद्घाटन है, वह तो सीधे भगवान द्वारा संचालित निर्णायक क्रिया; (Action) है।’


यह 'Action' शब्द श्रीअरविन्द की स्थिति को समझने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। श्रीमाँ ने इस शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हुये बताया कि चूंकि श्रीअरविन्द प्रत्यक्ष रूप से जड़द्रव्य पर क्रिया कर रहे हैं (अर्थात् Supreme in matter ) इसलिये 'Action' शब्द का प्रयोग किया गया। यह क्रिया ‘ऊपर भगवान से सीधे नीचे आ रही है और श्रीअरविन्द इस शक्ति व क्रिया का प्रतिनिधित्व कर रहें हैं।’ स्पष्ट है कि श्रीअरविन्द स्वयं ही अतिमानस शक्ति (Supramental Power) के अवतार हैं।


अतयेव श्रीअरविन्द को जानना स्वयं उस सत्य को जानना है जिसे लेकर वे स्वयं धरती पर अवतरित हुये। प्रत्येक अवतार या विभूति उस समय का प्रतीक होता है जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। राम, कृष्ण, बुद्ध, शंकर, चैतन्य और रामकृष्ण आदि ने अपने अपने समय में जिस सत्य का प्रतिनिधित्व किया उसका उन्होंने अपने व्यक्तित्व में अवतरण भी कराया। सत्य इसी प्रकार अभिव्यक्त होता आया है। चन्द्रमा अपनी सारी कलाओं के साथ उदित न होकर प्रति रात एक नई कला का उद्घाटन करता है जब तक कि पूर्णिमा की रात वह पूर्ण चन्द्र नहीं बन जाता। सत्य भी इसी प्रकार धीरे धीरे विकास की क्रिया को अपनाते हुये उद्घाटित होकर एक दिन पूर्ण रूप में उद्घाटित हो पाता है। श्रीअरविन्द इस श्रृंखला में अभी तक के अंतिम प्रकाश स्तंभ हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित अतिमानस सत्य में अभी तक की सारी उद्घाटित कलायें समन्वित हैं इसीलिये उनके योग को सर्वांगीण योग का नाम दिया गया है।


माँ कहती हैं ‘श्रीअरविन्द के बिना मेरा अस्तित्व नहीं, मेरे बिना उनकी अभिव्यक्ति नहीं।’ उनका यह कथन पूरी स्थिति को स्पष्ट कर देता है। बिना ‘सत्’ के ‘चित्’ का अस्तित्व नहीं हो सकता लेकिन ‘चित्’ के बिना संसार में सत् की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। दोनों के मिलन से ही आनन्द ब्रह्म की अनुभूति होती है और सच्चिदानंद के रूप में परिणित करने के लिये परमात्मा सृष्टि को संचालित करता है।


श्रीअरविन्द योग की उपादेयता के बारे में श्रीमाताजी कहती हैं, ‘श्रीअरविन्द हमें यह बतलाने आये थे कि सत्य की खोज के लिये किसी को पृथ्वी छोडऩे की आवश्यकता नहीं, अपनी आत्मा की खोज के लिये किसी को जीवन का परित्याग करने की आवश्यकता नहीं, भगवान से सम्बन्ध स्थापित करने के लिये किसी को संसार छोडऩे की आवश्यकता नहीं, न ही उसे सीमित मान्यताओं के अन्दर रहने की आवश्यकता है। भगवान सर्वत्र हैं, प्रत्येक वस्तु में हैं और यदि वे छिपें हैं तो इसलिये कि हम उन्हें ढूंढ़ निकालने का कष्ट नहीं उठाते।’


अपनी पहली भेंट में श्री माँ ने लिखा - ‘कोई बात नहीं यदि सैकड़ों मानव गहनतम अज्ञान में डूबे हुये हों। वे, जिनके हमने कल दर्शन किये हैं, पृथ्वी पर हैं। उनकी यहाँ उपस्थिति ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि एक दिन आयेगा, जब अंधकार प्रकाश में रूपांतरित हो जायगा, जब भगवान का राज्य पृथ्वी पर सही रूप में प्रतिष्ठापित हो जायगा।’


अपने महानतम काव्य सावित्री में श्रीअरविन्द ने अपनी और श्री माँ की भूमिका को अप्रत्यक्ष रूप में अन्य नामों के माध्यम से दिया है। सावित्री में श्रीअरविन्द की दो भूमिकायें हैं - पृथ्वी की आत्मा सत्यवान के रूप में वे सनातन काल से कभी इस नाम से तो कभी उस नाम से आकर पृथ्वी की चेतना के विकास में अगला चरण जोड़ते रहे हैं; अश्वपति के रूप में उन्होंने ऊपर से विज्ञानमय चेतना का धरती पर अवतरण कराने और पृथ्वी में उसके लिये अभीप्सा पैदा करने के लिये इस युग में अवतार लिया। इसी प्रकार श्रीमाँ की भी दोहरी भूमिका रही है। सनातन सावित्री के रूप में वे भी सत्यवान के साथ पृथ्वी चेतना के विकास में जन्म जन्मान्तरों से यह योग करती रही हैं। वर्तमान में अश्वपति की पुकार के उश्रर में वरदान के रूप में वे अतिमानस शक्ति को ले कर धरती में अवतरित हुईं जिससे यहां अतिमानस की जाति का बीजारोपण हो सके।


God’s Labour नामक अपनी प्रसिद्ध कविता में श्रीअरविन्द ने अप्रत्यक्ष रूप से अपना ही परिचय एक अद्वितीय साधना के साधक के रूप में दिया है।
‘Coercing my Godhead, I have come
Here on the sordid earth
Ignorant labouring, human grown
Twixt the gates of death and birth …….’
श्रीमाँ ने अन्यत्र लिखा - ‘इस पृथ्वी के इतिहास के आरंभ से ही श्रीअरविन्द किसी न किसी रूप में इस या उस नाम से पृथ्वी के महत्वपूर्ण रूपांतरों का संचालन करते रहे हैं।’


‘श्रीअरविन्द परम प्रभु के प्रकाश की सतत धारा (emanation) थे। वे पृथ्वी पर भावी नयी जाति व नये जगत की अभिव्यक्ति सम्बन्धी घोषणा करने के लिये आये थे।’ ‘हृदय की गुहा में नीचे धसते जाओ, धसते जाओ, जगतों के बाद जगतों में, चेतना के बाद दूसरी चेतना में - बिलकुल पेंदी में शुद्ध करने वाली लौ में श्रीअरविन्द का निवास है।’ श्रीमाँ ने आश्चर्य के साथ बताया था - ‘हम दोनों (श्रीअरविन्द और श्रीमाँ) ने परिपूर्ण भागवत जीवन को एक साथ लगातार 30 वर्ष तक पृथ्वी में जिया लेकिन आश्चर्य है कि लोग हम दोनों को यहाँ साथ साथ रहने के दैवी संयोग का, जो एक आश्चर्यमय अवसर था, लाभ नहीं उठा पाये। यह एक चमत्कारी कृपा थी जिसने चैत्य को ताले में तब तक बन्द रक्खा जब तक बाहर की चीज़ें तैय्यार नहीं हो गईं।’


श्रीअरविन्द ने यह कहकर सबको चौंका दिया, 'Humanity is not the last rung of the terrestrial creation. Evolution continues and man will be surpassed. It is for each individual to know whether he wants to participate in the advent of this new species.' विकासवाद के इस सिद्धांत ने परम्परावादी जनमानस को हिला कर रख दिया। अभी तक के योग और दर्शन ने मनुष्य को विधाता की अन्तिम कृति माना पर उसे भी भवसागरी सृष्टि से विदा लेकर स्वर्गीय समाधि में लीन हो जाने का उपदेश दिया था। इसलिये इनके अनुयायियों के लिये चेतना का विकासवादी सिद्धान्त अग्राह्य हो गया। ऐसे लोगों ने श्रीअरविन्द के योग को भारतीय योगविद्या के प्रतिकूल मानकर विरोध किया और सत्य के नये अवतरण को स्वीकारने में आपश्रि की। इसी सन्दर्भ में माताजी ने कहा - ष्विश्व की सनातनता में प्रत्येक अवतार केवल घोषणा करने आता है, वह भविष्य की पूर्णतर उपलब्धि का अग्रणी होता है। फिर भी लोगों में हमेशा भविष्य के अवतारों के विरुद्ध पिछले अवतारों को ही मान्यता देने की प्रवृश्रि होती है। वर्तमान समय में पुन: श्रीअरविन्द संसार में कल के उपलब्धि की घोषणा करते हुये आये हैं और पुन: उनके सन्देश को उन्हीं विरोधों का सामना करना पड़ रहा है जिनका सामना उनके पूर्ववर्तियों को करना पड़ा था। लेकिन आने वाला कल इस बात की सत्यता को प्रमाणित कर देगा कि उन्होंने किस रहस्य का उद्घाटन किया तथा यह भी कि उनका कार्य पूरा होकर रहेगा।’
‘A truth of truths men fear and deny
The light of lights, they refuse
To ignorant Gods they lift their cry
Or a demon altar choose.’


श्रीअरविन्द का जीवन कभी ऊपरी तल पर रहा ही नहीं इसलिये उनके व्यक्तित्व के बारे में श्रीमाँ के सिवाय कोई भी ठीक ठीक नहीं कह सकता। किसी भी आत्मकथाकार को इसीलिये उन्होंने अपने बारे में लिखने की अनुमति नहीं दी। रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं कि उनका जीवन इतना बहुमुखी था कि उसे समेट पाना बहुत कठिन है। उनके व्यक्तित्व में योगी, कवि और दार्शनिक इन तीनों का समन्वय था और सब के सब एक ही लक्ष्य की ओर गतिशील थे इसलिये श्रीअरविन्द का ध्यान करते समय ऐसा भासित होता है मानो हम मानवता के महासूर्य को देख रहे हों। श्रीसुमित्रानन्दन पन्त लिखते हैं कि इस विषमतर मानसिक तथा भौतिक संघर्षों के वैज्ञानिक युग में श्रीअरविन्द नयी जीवनदृष्टि के व्याख्याता के रूप में आविर्भूत हुये। बाल गंगाधर तिलक ने श्रीअरविन्द के राजनीतिक जीवन के बारे में कहा था - आत्मत्याग, ज्ञान और सच्चाई में श्रीअरविन्द के समान और कोई नहीं है। यह तो ईश्वर की कृपा है कि श्रीअरविन्द जैसे लोग राष्ट्रीय कार्य की ओर आकर्षित हुये। पट्टाभि सीता रमैय्या ने कांग्रेस के इतिहास में लिखा - ‘भारत के क्षितिज में श्रीअरविन्द वर्षों तक एक अत्यन्त उज्ज्वल नक्षत्र के समान चमके।’ फ्रांस के नोबल पुरस्कार विजेता रोमारोला ने लिखा है ‘महान ऋषियों की शृंखला का यह अंतिम ऋषि अपने विशाल हाथों में निर्माण का धनुष धारण किये है।’ नोबल पुरस्कार की अन्य विजेता मैडम गैबरीला और मैडम पल्र्स एस. बक लिखती हैं ‘श्रीअरविन्द के हाथों में कविता स्वर्गीय संगीत व अनन्त की चिन्मयता का निर्झर यंत्र बन गई है।’


कवीन्द्र रवीन्द्र ने श्रीअरविन्द की स्तुति में कितने ही छन्द लिखकर अर्पित किये हैं। सुमित्रानन्दन पन्त ने उनकी सावित्री के बारे में लिखा - ‘सावित्री महाकाव्य में श्री अरविन्द ने अपने समस्त दर्शन के योगामृत को प्रकाश और सौन्दर्य के कलश में भर कर विश्व को अमर भेंट के रूप में प्रदान किया है।’
श्रीअरविन्द अपनी सावित्री का अन्तिम संशोधन पूरा करके तुरन्त एकाएक चले गये। भौतिक शरीर छोडऩे के कुछ ही दिन पहले उनके व श्रीमाँ के बीच इस बात पर मंत्रणा हुई थी कि दो में से किसी एक को कार्य को गति देने के लिये शरीर छोडऩा होगा। सुप्रामेण्टल शक्ति पृथ्वी की चेतना में मानवता में परिवर्तन के लिये नहीं ठहर पा रही थी क्योंकि मानव जाति अभी इस के लिये तैयार नहीं थी। दूसरे, सूक्ष्म भौतिक उसके उतरने में अवरोध पैदा कर रहा था। शरीर की अपनी सीमायें हैं इसलिये श्री अरविन्द ने शरीर को छोड़ कर सूक्ष्म शरीर द्वारा सूक्ष्म भौतिक में रहकर काम को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। श्रीमाँ के कथनानुसार ‘श्रीअरविन्द सूक्ष्म भौतिक में अमर हैं। नीचे प्रकाश में छिपे हैं। उनके पास मृदु, पुराणी, अमृता और चन्दूलाल हैं। इन शिष्यों के साथ वे पृथ्वी के लिये चीज़ें तैयार कर रहे हैं। वे एक जीवित शरीर में साकार होंगे।’ उनके जाने के तुरन्त बाद जब श्रीमाँ ने उनसे वापस लौटने का आग्रह किया तो उन्होंने कहा था कि वे उस शरीर में नहीं लौटेंगे, वे अतिमानसिक तरीके से तैयार किये गये अतिमानसिक शरीर (Divine body) में लौटेंगे।