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माँ मंदिर श्रीअरविंदग्राम के ३५ वर्ष्

 

माँ मंदिर श्रीअरविंद ग्राम 'Matri Mandir Aurovile' का ही हिंदी रूपान्तर है। यह रूपान्तर हम किसी ने नहीं स्वयं श्रीमाँ ने सन्‌ १९७० में किया। क्यों किया? इसका उत्तर भी हम किसी के पास नहीं है लेकिन यह निर्विवाद है कि ऐसा होना निरा संयोग नहीं है। इसके पीछे कोई रहस्य अवश्य छिपा है जिसे हमारी ऊपर की आँखें अभी तक नहीं देख पाई हैं। रहस्य इसलिए कि कुछ प्रारंभिक बातों में अद्‌भुत समानता है। प्रथम तो यह कि मातृमंदिर और माँ मंदिर दोनों को कई बार सूक्ष्म भौतिक जगत में 1960-1970 के बीच बना हुआ देखा गया और उनकी रूप रेखाएं खींच ली गईं। दोनों का निर्माण आंतरिक प्रदेश के गाँवों में शुरू हुआ जहाँ निपट पिछड़े लोगों की आबादी थी। मंदिरों के प्रारंभिक निर्माण कार्य में स्थानीय लोगों के अद्‌भुत उत्साह, उनकी भागीदारी और सहयोग की मिशाल, मानवीय चेतना के विकास में एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करती है। उसके बाद कठिन संघर्ष् का जो लम्बा काल चला, उसमें भी दोनों के बीच अद्‌भुत समानता है

लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि दोनों की यहाँ कोई तुलना की जा रही है। ओरोवील पूरी मानव चेतना की भावी अभिव्यति है जिस पर सारे संसार की दृष्टि लगी हुई है। वहाँ दुनिया की कितनी ही संस्कृतियाँ, जीवन जीने की शैलियां, भाषएं, कलाकृतियां, विज्ञान की विधाएं, निर्माण कलाएं, वास्तुकलाएं, सामाजिकताएं, रंग और जातियां संगमित होकर अनेकता में एकता की नई सृष्टि का नाभिकेन्द्र बनाने में जुटी हुई हैं। इसके विपरीत ऐसा लगता है कि श्रीअरविन्दग्राम की चेतना अंतर्निहित होती जा रही है। भौतिकता की अंधी दौड़ में जो धूल का बवंडर यहाँ के वातावरण में छाया है उसमें सर्जना की कोई कली ऊपर से नजर नहीं आ रही है। फिर भी भगवती की कृपा अपार है। भीतर ही भीतर बहुत कुछ चल रहा है।

यद्यपि माँ मंदिर जिसका संचालन श्रीअरविंद सोसाइटी महसुवा द्वारा किया जाता है उसका उद्‌घाटन दीपावली 3 नवम्बर 1975 को हुआ। फिर भी उसके अवतरण की आहट बहुत पहले हो चुकी थी। दि. 24.11.1959 को सबसे पहले यहाँ श्रीअरविंद सेवक संघ की स्थापना हुई जिसके साथ ही श्रीअरविंद पुस्तकालय में श्रीअरविंद योग से संबंधित कुछ ग्रंथों का संग्रह किया गया था। फरवरी 1960 में सबसे पहली बार यहाँ के कुछ लोगों को श्रीअरविंदाश्रम पाण्डिचेरी जाकर श्रीमाँ का दर्शन लाभ प्राप्त हुआ। 1964 में इस संघ का नाम परिवर्तित कर श्रीमाँ की स्वीकृति से इसे श्रीअरविंद सोसाइटी नाम दिया गया। 1965 व 66 में पूरे मध्य प्रदेश में भयंकर अकाल के समय माँ की चमत्कारी कृपा ने इस गाँव को मध्य प्रदेश के मानचित्र में ला दिया।

1966 से 1975 के बीच श्रीअरविंद साधना से संबंधित चेतनात्मक रूप से काफी कार्य हुआ। श्रीअरविंद और उनकी साधना के दो खंड हिंदी में प्रकाशित किए गए। इन पुस्तकों के माध्यम से हिंदी भाषी क्षेत्रों में दूरदूर तक गाँवों में श्रीअरविंद का संदेश पहुँचा और सैकड़ों लोग माँ की कृपा से जुड़े। इसी बीच माँ मंदिर सूक्ष्म भौतिक जगत में तीन बार दिखा और आखिर के 1970 के अंतर्दर्शन में उसकी रूपरेखा कागज पर बना ली गई। इसे श्रीमाँ के पास भेज कर यह जानने का प्रयास किया गया कि अंतर्जगत में यह कौन सी चीज है जो इस गाँव की भूमि में बनी दिखती है। श्रीमाँ ने अपनी कलम से इस खाके पर 'माँ मंदिर' लिखकर अपने आशीर्वाद से हमें धन्य कर दिया। 21.09.1970 को ही उन्होंने इस ग्राम महसुवा का नाम बदलकर श्रीअरविंदग्राम कर दिया।

माँ मंदिर का शिलान्यास श्री नवजात जी द्वारा दिनांक 29.03.72 को किया गया। निर्माण कार्य प्रारंभ करने के पूर्व गाँव के 6 प्रमुख कार्यकर्त्ताओं को श्रीमाँ ने दिनांक 28.12.71 को व्यतिगत प्रणाम देकर आनंद से अभिभूत किया। दिनांक 03.11.75 को दीपावली के शुभ पर्व पर माँ मंदिर का उद्‌घाटन श्रीअरविंद के पावन देहांशों के साथ श्री नवजात जी के द्वारा संपन्न हुआ। इसके साथ ही भागवत कृपा का पहला अध्याय पूरा हुआ।

इसके बाद शुरू हुआ श्रीअरविंद ग्राम के विकास योजना पर कार्य जिसे श्रीमाँ ने 23.06.1970 को अपनी पूर्व स्वीकृति प्रदान की थी। दि. 03.09.1973 को श्रीअरविंद सोसाइटी का मध्य प्रदेश फर्म और सोसाइटीज अधिनियम के अंतर्गत पंजीयन हुआ। योजना में सबसे पहला कार्य था सर्वांगीण शिक्षा जिसमें के.जी. कक्षाओं का प्रारंभ 1976 में श्रीमती विद्यावती कोकिल जी द्वारा किया गया, जिसका उद्‌घाटन मध्य प्रदेश शासन के मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह द्वारा दि. 26.12.1982 को हुआ। छात्रावास का उद्‌देश्य बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए उनकी दिनचर्या को अनुशासित ढंग से कुशल शिक्षकों की देखरेख में नियमित करना है। श्रीअरविंद बाल विद्यामंदिर में वर्तमान में हाईस्कूल तक की कक्षाएँ चलती हैं। बच्चों के शारीरिक विकास के लिए बड़े मैदान और विविध प्रकार के खेल उपकरणों व सामग्रियों की यहाँ व्यवस्था की गई है। प्राणिक विकास के लिए संगीत, ड्राइंगपेंटिंग, बागवानी की सुविधाएं हैं। आध्यात्मिक विकास के लिए माँ मंदिर में होने वाली सारी गतिविधियों को विद्यार्थियों के ही सहयोग से संचालित किया जाता है। सारे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उनकी भागीदारी होती है। छात्रावासी बच्चों को आसन और ध्यान का नियमित प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रार्थनाएँ और उनके सत्संगों की व्यवस्था दैनिक गतिविधियों में सम्मिलित की गई है।

साधना शिविरों और सम्मेलनों का आयोजन - दर्शन दिवसों व विशिष्ट अवसरों के अतिरित समयसमय पर आध्यात्मिक सम्मेलनों और शिविरों का आयोजन माँ मंदिर में किया जाता रहा है जिसमें विभिन्न प्रदेशों, श्रीअरविंदाश्रम पांडिचेरी व श्रीअरविंदाश्रम की शाखा दिल्ली से आए साधक विद्वान श्रीअरविंद योग और उसकी प्रासंगिकता के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालते रहे हैं। इन सम्मेलनों का संक्षिप्त विवरण- :

दिनांक                                   सम्मेलन व शिविर

१.     ०३.११.१९७५                     माँ मंदिर का उद्‌घाटन व पवित्र देहांशों की स्थापना - इस शुभ अवसर पर हिन्दी भाषा भाषी क्षेत्रों के साधकों का एक बृहत्‌ सम्मेलन हुआ जिसमें मुख्य अतिथि श्री नवजात जी थे व अध्यक्षता रीवा के महाराजा मार्तण्ड सिंह जू देव ने की।

२.    १२.०३.७९ - १५.०३.१९७९        अखिल भारतीय साधना सम्मेलन - उद्‌घाटन श्री एस.एन. जौहर, अध्यक्ष श्री अरविन्द आश्रम दिल्ली शाखा द्वारा - वे 21 व्यतियों के साथ आये। मुख्य अतिथि - श्री उदार पिण्टो श्रीअरविंदाश्रम पांडिचेरी, श्रीमती विद्यावती कोकिल, सुश्री करुणामयी जी, तारा जौहर, इन्दु पिल्ले, पाराशर जी, छोटे नारायण शर्मा आदि।

3.    १७.१०.८० - १९.१०.१९८०          रीवा संभागीय आध्यात्मिक शिविर।

४.    २१.०३.८१ - २३.०३.१९८१       अखिल भारतीय साधना सम्मेलन - मुख्य अतिथि - श्री चम्पक लाल जी, श्रीअविंदाश्रम पांडिचेरी द्वारा उद्‌घाटन, अन्य अतिथि  कु. तारा जौहर, उनकी संगीत पार्टी तथा १५० अन्य प्रदेशों के लोग सम्मेलन में शामिल हुये।

५.    २४.०४.८५ - ३०.०४.१९८५       गीता ज्ञान यज्ञ  द्वारा आदित्य चैतन्य जी चिन्मय मिशन  स्थानीय शिविर।

६.    २९.०३.८६ - ३१.०३.१९८६       अखिल भारतीय श्रीअरविंद शिक्षा प्रणाली पर कार्यशाला - उद्‌घाटन श्री प्रपाी जी, श्रीअरविंद डिवाइन सोसाइटी भुवनेश्वर द्वारा। विशिष्ट अतिथि श्री एस.एन. जौहर, करुणामयी जी, कु. तारा जौहर, श्री छोटे नारायण शर्मा, उड़ीसा से ३८ शिक्षक साधक व अन्य लोगों ने भाग लिया।

७.    २८.०२.८७ - ३१.०३.१९८७       स्थानीय श्रीअरविंद शिक्षा सम्मेलन - उद्‌घाटन - कु. तारा जौहर, श्रीअरविंदाश्रम दिल्ली।

८.    २१.१०.९४ - २७.१०.१९९४         अखिल भारतीय साधना सम्मेलन - उद्‌घाटन - डॉ. सज्जन सिंह अध्यक्ष श्रीअरविंद सोसाइटी महसुवा द्वारा - ५० व्यति बिहार से तथा ६० अन्य स्थानों से आये।

९.    २९.०२.९६ - ०३.०३.१९९६         अखिल भारतीय साधना शिविर - श्रीअरविंद सोसाइटी महसुवा का रजत जयंती समारोह, उद्‌घाटन - श्री निवारण चन्द्रजी दिल्ली द्वारा, विभिन्न प्रांतों से १४७ व्यतियों ने शिविर में भाग लिया। सुश्री चटर्जी ने 'धरती की तपस्या' नामक नृत्यनाटिका की मनोहारी प्रस्तुति दी जिसमें आसनसोल बंगाल से उनकी पार्टी व आकाशवाणी रीवा ने सहयोग किया।

१०.   १५.०८.९७ - १८.०८.१९९७             अखिल भारतीय साधना शिविर - श्रीअरविंद की १२५वीं वर्ष्गाँठ का आयोजन, उद्‌घाटन - कु. रणबहादुर सिंह, अध्यक्ष चिन्मय मिशन लक्ष्मणपुर द्वारा। विभिन्न प्रातों से १३७ लोगों ने अपनी उपस्थिति दी।

११.   १५.०२.०४ - १७.०२.२००४       अखिल भारतीय साधना शिविर - श्रीमाता जी की १२५वीं वर्ष्गाँठ पर आयोजन। उद्‌घाटन - डॉ. आलोक पाण्डे श्रीअरविन्दाश्रम पाण्डिचेरी व मोहन मिस्त्री (तदैव)। इस शिविर में १५१ व्यतिों ने भागीदारी की जो विभिन्न प्रांतों से आये। इसी वर्ष् श्री एस.एन. जौहर की जन्म शतादी मनाई गई।

१२.   ३१.१०.०५ - ०३.११.२००५       अखिल भारतीय तरुणसंघ का सम्मेलन - उद्‌घाटन - श्री गोविंद सिंह जी, अध्यक्ष श्रीअरविंद सोसाइटी महसुवा द्वारा। इसमें विभिन्न प्रांतोंसे ८७ तरुणों ने हिस्सा लिया।

१३.   ०३.११.०७ - ०५.११.२००७       अखिल भारतीय तरुण संघ का सम्मेलन - उद्‌घाटन द्वारा - श्रीमती सरला नागराज, अध्यक्ष श्रीअरविंद सोसाइटी, अमरावती द्वारा इस अवसर पर २०० साधकों ने विभिन्न प्रान्तों से आकर भागीदारी की।

१४.   १७.१०.०९ - १९.१०.२००९       अखिल भारतीय साधना शिविर - उद्‌घाटन - डॉ. सज्जन सिंह पूर्व अध्यक्ष श्रीअरविंद सोसाइटी, महसुवा द्वारा। इस शिविर में बाहर से आए ३७ साधकों और २६ शिक्षकों ने भाग लिया।

१५.   ०३.११.१० - ०५.११.२०१०       अखिल भारतीय साधना शिविर - उद्‌घाटन - श्री अश्विन भाई कापड़िया, गुजरात, डॉ. जयसिंह, सावित्री भवन ओरोविल और प्रभाकर नूलकर, सोलापुर महाराष्ट्र द्वारा। इस शिविर में बाहर से आए ३७ साधकों और २६ शिक्षकों ने भाग लिया। डॉ. के.एन. वर्मा द्वारा हिन्दी गद्य में अनुवादित श्री अरविन्द के आध्यात्मिक महाकाव्य सावित्री का विमोचन श्री अश्विन भाई कापड़िया, डॉ. जयसिंह और प्रभाकर नूलकर द्वारा किया गया। इस शिविर में देश के विभिन्न प्रान्तों से लगभग ७५ लोगों ने भाग लिया।

राष्ट्रीय एकीकरण शिविर

इन आध्यात्मिक आयोजनों के अतिरित माँ मंदिर में श्रीअरविंद एजुकेशन सोसाइटी श्रीअरविंदाश्रम दिल्ली के तत्वावधान में आयोजित श्रीअरविंद राष्ट्रीय एकीकरण शिविरों का भी इस प्रकार आयोजन किया गया -

प्रथम शिविर             दि. ०१.१०.८७ से १०.१०.१९८७

द्वितीय शिविर            दि. ०१.११.८८ से १०.११.१९८८

तृतीय शिविर             दि. २१.११.८९ से ३०.११.१९८९

चतुर्थ शिविर             दि. २२.१०.९० से ३१.१०.१९९०

पंचम शिविर             दि. २२.१०.९१ से ३१.१०.१९९१

ष्ष्टम शिविर             दि. २२.१०.९२ से ३१.१०.१९९२

सप्तम्‌ शिविर             दि. २२.१०.९३ से ३१.१०.१९९३

इन शिविरों में देश के विभिन्न प्रांतों से कुल १०० शिवरार्थी भाग लेते रहे हैं जिनमें राष्ट्रीय एकता से सम्बंधित राष्ट्रीय गीतों का १० दिन तक प्रशिक्षण दिया जाता रहा है साथ ही विभिन्न प्रांतों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता रहा। इस अद्‌भुत आयोजन में अनेकता में एकता की सजीव झाँकी देखने को मिलती थी। इसके अतिरित देश के विभिन्न भागों में इन आयोजित शिविरों में भाग लेने के लिए माँ मंदिर की ओर से प्रतिनिधि युवक जाते रहे हैं।

अन्य गतिविधियाँ

(क) श्रीअरविंद एजुकेशन सोसाइटी दिल्ली द्वारा आयोजित संगीत प्रशिक्षण शिविरों में भी श्रीअरविंद बाल विद्यामंदिर महसुवा के बच्चे भाग लेकर संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त करते रहे तथा वहाँ के स्टडी कैम्पों और यूथ कैम्पों में यहाँ के शिक्षक व साधक समयसमय पर भाग लेते रहे हैं। फरवरी २००१ में यहाँ के विद्यालय के शिक्षक व विद्यार्थियोंने श्रीअरविंदाश्रम पांडिचेरी का भ्रमण किया।

म्यूजिक वर्कशाप व मूल्य आधारित शिक्षा के शिविरों का श्रीअरविंद एजुकेशन सोसाइटी दिल्ली द्वारा आयोजन

१.    २९.१२.२००३ से १२.१.२००४ तक          इस वर्कशाप में यहाँ के १० छात्रछात्राओं ने भाग लिया।

२.    २२.४.२००५ से २१.५.२००५ तक      इसमें भी १० बच्चों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।

३.    मई २००६                        इसमें ५ बच्चों ने मधुबन में १ माह का प्रशिक्षण लिया।

४.    जून २००८                       इस शिविर में ८ बच्चों ने नैनीताल में १ माह का संगीत प्रशिक्षण प्राप्त किया।

५.    मूल्य आधारित शिक्षा शिविर        यह शिविर मधुबन में आयोजित था जिसमें माँ मंदिर के ५ बच्चों ने भाग लिया।

१.६.२००८ से १०.६.२००८ तक

(ख) माँ मंदिर द्वारा बिहार स्थित जानकी नगर में श्रीअरविंद योग सम्मेलनों का आयोजन - इसमें पूरे बिहार के श्रीअरविंद केंद्रों ने भाग लिया

२१.०३.९५ से २७.०३.१९९५ तक     ७ दिवसीय सम्मेलन

०१.०२.९८ से ०७.०२.१९९८ तक     ६ दिवसीय सम्मेलन

०२.०२.१० से ०५.०२.२०१० तक     ४ दिवसीय सम्मेलन

माँ मंदिर का कार्य दो संस्थाओं द्वारा सम्पादित किया जाता है  श्रीअरविंद सोसाइटी महसुवा जिसका पंजीकरण १९७३ में हुआ व माँ मंदिर जन कल्याण ट्रस्ट श्रीअरविंदग्राम जिसका पंजीकरण मध्य प्रदेश ट्रस्ट ऐट के अंतर्गत्‌ सन्‌ १९८२ में हुआ। दोनों ही संस्थाओं को आयकर की धारा 80 (G) के अंतर्गत आयकर में छूट प्राप्त है। सोसाइटी आश्रम की आध्यात्मिक और शैक्षिक गतिविधियों का संचालन करती है जबकि ट्रस्ट वर्तमान में श्रीअरविंद योग से संबंधित सरल हिंदी में पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन करता है। ये प्रकाशन हिंदी क्षेत्र के लिए उपयोगी सिद्ध हुए हैं। अभी तक के प्रकाशनों की सूची इस तरह है -

१. श्रीअरविन्द श्रीमाँ और उनकी साधना पुष्प - १ पृष्ट सं. ३२४ मूल्य १५०=००

इस खण्ड में श्रीअरविन्द और श्रीमाँ की पूर्ण जीवनी के साथ उनके योग की पूरी रूपरेखा को विस्तार से दृष्टान्तों के माध्यम से समझाया गया है। सारी सामग्री को जो मूल ग्रंथों के कई खण्डों में बिखरी है उसे एक स्थान पर क्रमबद्ध किया गया है। प्रथम संस्करण समाप्त हो जाने के बाद दूसरा संस्करण उपलध है।

२.    श्रीअरविन्द औन उनकी साधना पुष्प - २ पृष्ट सं. २६७ मूल्य १००=००

यह श्रीअरविन्द योग का तुलनात्मक अध्ययन है जिसमें वेद, उपनिष्द, गीता, सांख्य बेदान्त, तंत्र द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैव, अद्वैताद्वैव, पातञ्जलि योग विशिष्ट योग, व दर्शनों के साथ अलग अलग तुलना करते हुए श्रीअरविन्द योग की विशिष्टता और अनिवार्यता को रेखाङ्कित किया गया है।

३.    श्रीअरविन्द श्रीमाँ और उनकी साधना पुष्प - ३ पृष्ट सं. ५३२ मूल्य हार्ड बाउण्ड - ३००=००, पेपर बाउण्ड २५१=००

इस खण्ड में श्रीअरविन्द योग के साधना पक्ष को लिया गया है। साधना को कैसे प्रारंभ करना चाहिए और किस प्रकार आगे बढ़ना चाहिए, किन पुस्तकों को साधना का आधार बनाते हुये चैत्य पुरुष् के जागरण, आरोहण और अवरोहण की क्रिया को संचालित करना चाहिये - जैसी बातों को अनुभूतियों के माध्यम से बहुत रोचक ढंग से समझाया गया है।

४.    श्रीअरविन्द श्री माँ और उनकी साधना पुष्प - ४ पृष्ट सं. ६४६ मूल्य २५०=००

यह खण्ड सावित्री की सरल व्याख्या और उसका गद्य में सारांश है (अनुवाद नहीं) जिसे तीन भागों में लिखा गया है।

सावित्री एक परिचय, सावित्री संक्षेप और सावित्री के विभिन्न विग्रह। ये तीन भाग अलगअलग पुस्तकों में भी प्राप्त है। सावित्री एक परिचय में समझाया गया है कि किस प्रकार सावित्री श्रीअरविन्द का सांगोपांग पूर्ण योग है और साधक किस प्रकार सावित्री के सहारे साधना पथ पर शीघ्र प्रगति करने लगता है। सावित्री संक्षेप में प्रत्येक सर्ग का गद्य में सारांश दिया गया है जिसके सहारे सावित्री को समझने में सहायता मिलती है। सावित्री के विभिन्न विग्रह में सावित्री की सामग्री को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने और जीवन से जुड़े सारे पक्षों की समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने का प्रयास किया गया है। सावित्री पूर्ण जीवन दर्शन है इसे इस व्याख्या द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है। इस खण्ड में ६ अध्याय हैं  'सावित्री एक पीड़ा', 'सावित्री एक सृजन', 'सावित्री एक साधना', 'सावित्री एक प्रकाश', 'सावित्री एक मर्म', 'सावित्री एक क्रान्ति'। प्रत्येक अध्याय अलगअलग पुस्तक के रूप में भी उपलध है। सावित्री की यह सांगोवाम व्याख्या सावित्री के ३ खण्डों में किये गये हिन्दी अनुवाद को समझने के लिए कुंजी का काम करती है। यह अनुवाद अलग से प्रकाशित है।

.    Evolution towards Human Unity - पृष्ट सं. २७३ मूल्य २००=००

सरल अँग्रेजी में लिखी यह पुस्तक श्रीअरविन्द के Ideal of Human Unity, The Human Cycle, The ridle of the world और Life divine के कुछ अंशों का संक्षिप्त विवेचन है साथ ही पश्चिम के दर्जनों इतिहास के दार्शनिकों जैसे ट्वायानबी सोरोकिन, स्पेंगलर वार्डेयाव, हीगल, प्लेटो, अरस्तु, डार्विन, मार्स आदि के विचारों से तुलना है जो चेतना के एक नये आयाम की दिशा की ओर इशारा करती है। चेतना का यह नया आयाम सुप्रामेण्टल है जिसके अवतरण से ही मानव एकत्व का उद्‌देश्य पूरा होगा। इस खोज ने पश्चिम के सारे दार्शनिकों को बौना सिद्ध कर दिया है।

६.    पुष्पाञ्जलि - पृष्ट सं. २३५- मूल्य १००=००

यह श्रीअरविन्द की सावित्री पर आधारित १२५ पदों की पदावली है जिसे सुन्दर संगीत में पिरोया जा सकता है।

७.    आत्माञ्जलि - पृष्ट सं. ५२ - मूल्य ३०=००

यह श्रीअरविन्द योग के साधकों के लिये पुरानी चीजों से हटकर भजनों की एक सुन्दर रचना है। इन भजनों में भतिपूर्ण लय और आनन्द में डुबाने वाला रस है। बच्चों और सयानों के लिए अलगअलग मात्राओं के गीत, भजन और कीर्तनों की रचना की गई है।

८.    माँकृपा - पृष्ट सं. २०४ - मूल्य ७५=००

यह संस्मरणों की उपन्यास जैसी प्रस्तुति है जो माँ की कृपा की सच्ची और सजीव घटनाओं पर आधारित है। माँ अपने बच्चों की सहायता के लिये किस प्रकार कहीं भी, किसी भी क्षण प्रकट हो जाती है। इसका अद्‌भुत आख्यान इस पुस्तक में बड़े रोचक ढंग से किया गया है जिसे पढ़कर हृदय गद्‌गद्‌ हो जाता है।

९.    ध्यान कैसे करें - पृष्ट सं. ४० मूल्य १५=००

यह छोटी सी पुस्तक श्रीअरविन्द योग में ध्यान के विधि की कुंजी है जिसे पढ़ने के बाद साधक को इधर उधर भटकने की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस पुस्तक की बहुत बड़ी मांग है।

१०.   अभीप्सा की आग को कैसे जलायें - पृष्ट सं. ३५ मूल्य १२=००

११.   चैत्य पुरुष् कैसे जगायें - पृष्ट सं. ३२ मूल्य १५=००

चैत्य पुरुष् का जागरण श्रीअरविन्द योग की कुंजी है। इसके जागरण की सरल और प्रेरणास्पद विधियाँ इस पुस्तक में बताई गई हैं जिन्हें पढ़ने पर हृदय प्रफुल्लित हो जाता है और समर्पण की आग धधकने लगती है।

१२.   श्रीअरविन्द श्री माँ और उनका योग - मूल्य १०=०० (प्रश्नोत्तर के रूप में)

१३.   श्रीअरविन्द योग की साधना कैसे करें - मूल्य १०=०० (प्रश्नोत्तर के रूप में)

१४.   भगवती माँ पर अत्यन्त भावपूर्ण भजनों के कैसेट - मू्‌ल्य ५०=०० एवं सी.डी.  मूल्य ७५=००

ये भजन डॉ. के.एन. वर्मा द्वारा लिखे एवं कु. अनुभा भट्‌टाचार्य द्वारा गाये गये हैं।

१५.   शति अवतरण का रहस्य                        मूल्य ३०=००

१६.   सावित्री एक परिचय - पृ. ८६                  मूल्य ५०=००

१७.   सावित्री - संक्षेप पृ. २८६                           मूल्य १००=००

१८.   सावित्री के विभिन्न विग्रह - पृ. १७२                   मूल्य १००=००

१९.   सावित्री एक साधना                                    मूल्य २०=००

२०.   सावित्री एक पीड़ा                               मूल्य २०=००

२१.   सावित्री एक सृजन                               मूल्य २०=००

२२.   सावित्री एक प्यास                                    मूल्य २०=००

२३. सावित्री एक प्रकाश                                       मूल्य २०=००

२४.   सावित्री एक मर्म                                       मूल्य २०=००

२५.   सावित्री एक क्रान्ति                                   मूल्य २०=००

२६.   सावित्री (हिन्दी अनुवाद गद्य में)                 मूल्य ७००=०० अजिल्द

            खण्ड १, २ एवं ३                              मूल्य ८००=०० सजिल्द

२७.   A digest to Sri Aurobindo yoga (प्रेस में)

२८.   सावित्री की अमृत सरितायें  (प्रेस में)

२९.   धरती के आँसू (प्रेस में)  इस पुस्तक में श्रीअरविन्द योग को उपन्यास की शैली में बड़े रोचक ढंग से लिखा गया है।

नोट : श्रीअरविन्द केन्द्रों के लिए २५% डिस्काउन्ट / ५ या अधिक सेट लेने पर पोस्टेज या ट्रेन भाड़ा निशुल्क।

 

मिलने का पता

माँ मन्दिर जन कल्याण ट्रस्ट

श्रीअरविन्द ग्राम, ग्राम व पो.आ.  महसुवा

जिला  रीवा (म.प्र.) 486114

दूरभाष् : 076622999248, मो. : 09229611840, 09229692010, 09424337818